महाभारत — स्त्रीपर्व - भाग–६ : गान्धारी की दृष्टि — शोक, क्रोध और धर्म का प्रश्न
महाभारत — स्त्रीपर्व - भाग–६ : गान्धारी की दृष्टि — शोक, क्रोध और धर्म का प्रश्न
पाण्डव गान्धारी के सामने खड़े थे।
युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन गान्धारी के लिए युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ था।
उनके सामने उनके सौ पुत्रों का विनाश था।
दुर्योधन, दुःशासन, विकर्ण और उनके अन्य पुत्र—सब मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे।
एक माता की दृष्टि से देखें तो यह सम्पूर्ण संसार के नष्ट हो जाने जैसा था।
लेकिन गान्धारी केवल माता नहीं थीं।
वे उस कुरुवंश की रानी भी थीं, जिसके भीतर यह युद्ध जन्मा था।
इसलिए उनका शोक केवल निजी शोक नहीं था।
उसमें पूरे राजवंश की विफलता का बोध भी था।
युधिष्ठिर सबसे पहले सामने आते हैं
पाण्डवों में युधिष्ठिर आगे बढ़ते हैं। उनके भीतर अपराधबोध था।
वे जानते थे कि युद्ध में कौरवों का विनाश हुआ है, लेकिन वे यह भी जानते थे कि उस विनाश की कीमत पाण्डवों ने भी चुकाई है।
युधिष्ठिर गान्धारी के सामने सिर झुकाते हैं। यहीं महाभारत एक अत्यन्त सूक्ष्म दृश्य रचता है।
गान्धारी की आँखों पर पट्टी बँधी है।
फिर भी उनके भीतर ऐसी तीव्र भावावस्था है कि कथा में उनकी दृष्टि की शक्ति एक प्रतीकात्मक रूप ग्रहण करती है।
कहा गया है कि उनकी दृष्टि युधिष्ठिर के पैरों के नाखूनों पर पड़ी और वे काले पड़ गये।
इसे महाभारत की कथात्मक संरचना में तप, संयम और संचित शक्ति से उत्पन्न दृष्टि-प्रभाव के रूप में पढ़ा जा सकता है।
यहाँ आधुनिक विज्ञान का कोई सीधा प्रमाण जोड़ना उचित नहीं होगा।
लेकिन प्रतीकात्मक अर्थ स्पष्ट है—
क्रोध और शोक से भरी हुई दृष्टि भी मनुष्य पर प्रभाव डाल सकती है।
गान्धारी का क्रोध
गान्धारी का क्रोध पाण्डवों के प्रति था। लेकिन यह क्रोध सरल नहीं था।
वे जानती थीं कि दुर्योधन निर्दोष नहीं था।
उन्होंने अपने पुत्र के स्वभाव और उसके कर्मों को देखा था।
फिर भी मातृत्व किसी न्यायालय की तरह कार्य नहीं करता।
माता के लिए पुत्र का अपराध और पुत्र की मृत्यु दो अलग-अलग सत्य हो सकते हैं।
यही कारण है कि गान्धारी के भीतर दो भाव एक साथ उपस्थित हैं—
पुत्र के कर्मों का ज्ञान और पुत्र की मृत्यु का असहनीय शोक।
महाभारत इन दोनों में से किसी एक को हटाता नहीं।
भीम के प्रति गान्धारी
गान्धारी को विशेष रूप से भीम के प्रति पीड़ा थी।
दुःशासन का वध और दुर्योधन की जाँघ पर प्रहार—दोनों घटनाएँ उनके मन में थीं।
भीम ने युद्ध के नियमों की सीमाओं को भी कुछ स्थानों पर पार किया था।
विशेषतः दुर्योधन के साथ गदा-युद्ध में जाँघ पर प्रहार युद्ध-नियमों के संदर्भ में विवादास्पद था।
कृष्ण ने उस निर्णायक क्षण में भीम को संकेत दिया था।
इसलिए गान्धारी की दृष्टि में केवल दुर्योधन का अपराध नहीं था।
वह यह भी देख रही थीं कि युद्ध में धर्म और अधर्म की रेखाएँ कितनी जटिल हो गई थीं।
यही महाभारत का कठिन प्रश्न है
यदि दुर्योधन ने अधर्म किया था,
तो क्या उसे पराजित करने के लिए अधर्म का सहारा लिया जा सकता है?
यदि शत्रु ने नियम तोड़े,
तो क्या उसके विरुद्ध नियम तोड़ना धर्म बन जाता है?
और यदि युद्ध में धर्म की रक्षा के लिए कुछ ऐसे उपाय किए जाएँ जो सामान्य परिस्थितियों में अनुचित माने जाएँ, तो उनके नैतिक मूल्यांकन का आधार क्या होगा?
महाभारत इन प्रश्नों को खुला रखता है।
यही कारण है कि कृष्ण की भूमिका भी सरल नहीं रहती।
गान्धारी की दृष्टि कृष्ण की ओर
अब गान्धारी का ध्यान कृष्ण की ओर जाता है।
यहाँ कथा अपने सबसे महत्वपूर्ण बिंदु पर पहुँचती है। गान्धारी के लिए कृष्ण केवल पाण्डवों के मित्र नहीं हैं।
वे ऐसी शक्ति हैं जो परिस्थितियों को प्रभावित कर सकती थी। उन्होंने शान्ति का प्रयास किया था।
उन्होंने दुर्योधन को समझाया था। उन्होंने पाण्डवों को भी मार्गदर्शन दिया था।
फिर भी युद्ध हुआ। और अब पूरा कुरुवंश नष्ट पड़ा था।
गान्धारी के भीतर प्रश्न उठता है—
यदि कृष्ण युद्ध को रोकने में समर्थ थे, तो उन्होंने इसे इस सीमा तक क्यों पहुँचने दिया?
यह प्रश्न कृष्ण के चरित्र को एक नई रोशनी में देखने के लिए बाध्य करता है।
कृष्ण का उत्तर केवल तर्क नहीं है
कृष्ण जानते थे कि दुर्योधन शान्ति स्वीकार नहीं करेगा।
वे यह भी जानते थे कि पाण्डवों के साथ वर्षों से अन्याय हुआ है।
उन्होंने युद्ध रोकने के लिए प्रस्ताव रखा था।
लेकिन किसी भी शान्ति-प्रस्ताव की सफलता दोनों पक्षों की सहमति पर निर्भर करती है।
इसलिए कृष्ण को सम्पूर्ण युद्ध का एकमात्र कारण मानना घटनाक्रम को अत्यधिक सरल बना देगा।
फिर भी गान्धारी का प्रश्न अपनी जगह बना रहता है। क्योंकि वे परिणाम के सामने खड़ी हैं।
और परिणाम अत्यन्त भयानक है।
शाप की ओर बढ़ता हुआ संवाद
यहीं से गान्धारी का शोक धीरे-धीरे शाप में परिवर्तित होता है।
उनका कथन यादवों के भविष्य से जुड़ता है। यह महाभारत की संरचना में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
कुरुक्षेत्र में कुरुवंश का विनाश हुआ। लेकिन कथा यहाँ समाप्त नहीं होती।
महाभारत जैसे कहता है—
एक महान युद्ध समाप्त हो जाने से हिंसा की संस्कृति समाप्त नहीं होती।
यदि शक्ति, अहंकार, प्रतिशोध और आंतरिक संघर्ष जीवित रहें, तो अगला विनाश किसी दूसरी भूमि पर जन्म ले सकता है।
यही कारण है कि गान्धारी का शाप आगे चलकर मौसलपर्व की घटनाओं से जुड़ता है।
शाप को कैसे समझें?
शाप को तीन स्तरों पर पढ़ा जा सकता है।
कथात्मक स्तर पर — यह महाभारत की भविष्य की घटनाओं का कारण बनता है।
धार्मिक स्तर पर — तपस्विनी और पतिव्रता गान्धारी के वचन को असाधारण शक्ति प्राप्त होती है।
प्रतीकात्मक स्तर पर — यह युद्ध के बाद जन्मी नैतिक प्रतिक्रिया है; जिसने विनाश देखा है, वह भविष्य के लिए चेतावनी बन जाती है।
इन तीनों स्तरों को साथ रखकर पढ़ना महाभारत को अधिक व्यापक रूप से समझने में सहायता करता है।
स्त्रीपर्व अब केवल शोकपर्व नहीं रहा
आरम्भ में हमने देखा— मृत शरीर। विधवाएँ। माताओं का विलाप। पुत्रों की मृत्यु।
फिर कर्ण का रहस्य सामने आया। अब गान्धारी का क्रोध और कृष्ण के प्रति प्रश्न सामने है।
अर्थात् स्त्रीपर्व धीरे-धीरे हमें इस निष्कर्ष की ओर ले जा रहा है कि—
युद्ध का वास्तविक अंत युद्धभूमि में नहीं होता।
वह तब समाप्त होता है जब उसके कारण उत्पन्न शोक, क्रोध, अपराधबोध और प्रतिशोध की अगली पीढ़ी भी समाप्त हो जाए।
महाभारत में ऐसा तुरंत नहीं होता।
इसलिए कथा आगे बढ़ती है।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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