महाभारत — वनपर्व — हिमालय और गन्धमादन : पाण्डवों की यात्रा और एक रहस्यमय पर्वतीय भूगोल
महाभारत — वनपर्व — हिमालय और गन्धमादन : पाण्डवों की यात्रा और एक रहस्यमय पर्वतीय भूगोल
प्रयाग और गंगा-यमुना क्षेत्र के तीर्थों के बाद पाण्डवों की यात्रा धीरे-धीरे हिमालय की ओर बढ़ती है।
मैदान पीछे छूटते जाते हैं। भूमि ऊँची होती जाती है। नदियाँ अधिक तीव्र होती जाती हैं।
वन घने होते जाते हैं।
और जैसे-जैसे पाण्डव हिमालय के भीतर प्रवेश करते हैं, महाभारत की कथा में प्राकृतिक भूगोल और पौराणिक भूगोल एक-दूसरे के बहुत निकट आते जाते हैं।
यहीं से हमारी यात्रा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव आता है— गन्धमादन पर्वत
पाण्डवों का मार्ग
अब तक की यात्रा को हमारे शोध-नक्शे में इस प्रकार रखा जा सकता है—
यहाँ से आगे हमें विशेष सावधानी रखनी होगी, क्योंकि महाभारत में वर्णित प्राचीन स्थानों की आधुनिक पहचान हर जगह निश्चित नहीं है।
गन्धमादन आखिर है कहाँ?
यही हमारे लिए एक महत्वपूर्ण शोध-प्रश्न है।
आज जब हम उत्तराखण्ड के हिमालय में Valley of Flowers देखते हैं, तो उसकी असाधारण पुष्प-संपदा और प्राकृतिक सुंदरता के कारण स्वाभाविक रूप से मन में प्रश्न उठता है— क्या यही महाभारत का गन्धमादन हो सकता है?
इसी प्रकार पास के हेमकुण्ड साहिब और बदरीनाथ क्षेत्र की धार्मिक महत्ता भी इस प्रश्न को और रोचक बना देती है।
लेकिन शोध की दृष्टि से हमें यहाँ लोकप्रिय धारणा और प्रमाणित तथ्य के बीच अंतर करना होगा।
गन्धमादन को सीधे वर्तमान Valley of Flowers या Hemkund Sahib कहना प्रमाणित नहीं है।
फिर संबंध कहाँ है?
महाभारत में गन्धमादन का वर्णन एक विस्तृत हिमालयी पर्वतीय प्रदेश के रूप में मिलता है।
वहाँ— पर्वत हैं, वन हैं, झीलें हैं, झरने हैं, अनेक प्रकार के पुष्प हैं, दुर्लभ वनस्पतियाँ हैं, वन्य जीव हैं, सिद्ध और चारण हैं, किन्नर हैं, यक्ष हैं।
और इसी व्यापक हिमालयी क्षेत्र में बदरिकाश्रम और नर-नारायण की परंपरा भी आती है।
इसलिए अधिक सावधान निष्कर्ष यह होगा कि—
गन्धमादन की परंपरा उत्तराखण्ड के ऊपरी हिमालय और बदरी क्षेत्र से किसी रूप में संबंधित हो सकती है, लेकिन किसी एक वर्तमान घाटी को उसका निश्चित आधुनिक रूप मानना अभी प्रमाणित नहीं है।
यह अंतर हमारे पूरे शोध के लिए महत्वपूर्ण है।
गन्धमादन—एक पर्वत या एक पर्वतीय प्रदेश?
यह प्रश्न भी खुला रखना चाहिए।
महाभारत में गन्धमादन कभी एक विशिष्ट पर्वत के रूप में दिखाई देता है, तो कहीं उसका वर्णन इतने व्यापक पौराणिक भूगोल में आता है कि वह एक बड़े पर्वतीय संसार का हिस्सा प्रतीत होता है।
इसलिए संभव है कि अलग-अलग कालों और कथा-परंपराओं में “गन्धमादन” नाम का अर्थ बदलता रहा हो।
हम इसे निश्चित सिद्धांत नहीं कहेंगे। लेकिन यह संभावना शोध के योग्य है।
पाण्डव वहाँ क्या करते हैं?
यहाँ कथा फिर रोचक हो जाती है। पाण्डव गन्धमादन क्षेत्र में पहुँचते हैं और वहाँ केवल दर्शन करके वापस नहीं लौटते।
वे पर्वतीय आश्रमों में ठहरते हैं। ऋषियों से मिलते हैं। पुरानी कथाएँ सुनते हैं।
वन और पर्वतीय प्रदेश का अनुभव करते हैं।
अर्थात् तीर्थयात्रा अब एक प्रकार की चलती हुई शिक्षा-यात्रा बन चुकी है।
लोमश ऋषि उनके मार्गदर्शक हैं। वे प्रत्येक स्थान को केवल दिखाते नहीं— उसके पीछे छिपी कथा भी बताते हैं।
यहाँ कथा और प्रकृति एक हो जाती हैं
गन्धमादन के वर्णन को पढ़ते समय आधुनिक पाठक को एक विचित्र अनुभव होता है।
एक ओर हमें वास्तविक प्रकृति जैसी चीजें दिखाई देती हैं— पर्वत, झील, वनस्पति, पशु, जलधाराएँ।
दूसरी ओर उसी दृश्य में— यक्ष, किन्नर, सिद्ध, चारण और दिव्य प्राणी भी दिखाई देने लगते हैं।
यही महाभारत के पौराणिक भूगोल की विशेषता है।
उसके लिए प्रकृति और अलौकिकता दो अलग-अलग संसार नहीं हैं। वे एक ही कथा-भूमि में रहते हैं।
क्या इसमें कोई प्राकृतिक आधार हो सकता है?
यहाँ विज्ञान का प्रवेश बहुत सावधानी से करना होगा।
हम यह नहीं कह सकते कि—
“महाभारत में वर्णित हर यक्ष वास्तव में कोई वैज्ञानिक रूप से अज्ञात जीव था।”
इसका प्रमाण नहीं है। लेकिन हम यह प्रश्न पूछ सकते हैं—
क्या अत्यंत दुर्गम हिमालय, उसकी असाधारण जैव-विविधता और वहाँ रहने वाले स्थानीय समुदायों ने बाद में यक्ष, किन्नर और अन्य पर्वतीय लोक-परंपराओं के निर्माण में भूमिका निभाई होगी?
यह एक मानवशास्त्रीय संभावना है।
ऐसी संभावना की जाँच लोककथाओं, पुरातत्त्व, भाषाविज्ञान और प्राचीन साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन से करनी होगी।
गन्धमादन और फूलों की घाटी
अब उस प्रश्न पर वापस आते हैं जिससे हमने शुरुआत की थी।
Valley of Flowers अपनी असाधारण पुष्प-संपदा के लिए प्रसिद्ध है।
महाभारत में भी गन्धमादन के साथ अत्यंत सुंदर पुष्पों और वनस्पतियों का विस्तृत वर्णन आता है।
इस समानता के कारण दोनों को जोड़ने की कल्पना स्वाभाविक है।
लेकिन— समानता प्रमाण नहीं है।
किसी स्थान पर फूल अधिक होना यह सिद्ध नहीं करता कि वही महाभारत का गन्धमादन था।
इसलिए हमारी शोध-पद्धति कहेगी—
Valley of Flowers को गन्धमादन का संभावित सांस्कृतिक-स्मृति क्षेत्र मानकर विचार किया जा सकता है, लेकिन वर्तमान प्रमाणों के आधार पर दोनों को समान घोषित नहीं किया जा सकता।
यही तटस्थ निष्कर्ष है।
हेमकुण्ड साहिब के संदर्भ में
इसी प्रकार हेमकुण्ड साहिब भी उसी व्यापक हिमालयी क्षेत्र में स्थित है।
लेकिन उसे महाभारत के गन्धमादन के साथ सीधे जोड़ना ऐतिहासिक रूप से सिद्ध नहीं है।
यहाँ हमें तीन अलग परंपराएँ दिखाई देती हैं— महाभारत का गन्धमादन बदरिकाश्रम की प्राचीन परंपरा
इन तीनों का आधुनिक भूगोल में निकट होना अपने आप में एक रोचक तथ्य है।
लेकिन तीनों को एक ही ऐतिहासिक घटना या स्थान मान लेना उचित नहीं होगा।
फिर भी एक बड़ी बात सामने आती है
यहाँ महाभारत का भूगोल हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
क्योंकि पाण्डवों की कथा हमें ऐसे स्थानों से गुजार रही है जिन्हें भारतीय स्मृति ने हजारों वर्षों तक अलग-अलग रूपों में पवित्र माना।
कहीं— नदी तीर्थ बनी। कहीं— पर्वत तीर्थ बना। कहीं— आश्रम तीर्थ बना। और कहीं— कथा स्वयं तीर्थ बन गई। गन्धमादन इस प्रक्रिया का उत्कृष्ट उदाहरण है।
अब कथा में भीम फिर आगे आते हैं
गन्धमादन के इस पर्वतीय संसार में पाण्डवों का जीवन कुछ समय के लिए ठहरता है।
लेकिन द्रौपदी के हाथ एक दिन एक अद्भुत सुगंध वाला सौगन्धिक पुष्प आता है।
उसकी सुगंध उसे आकर्षित करती है।
वह भीम से कहती है कि यदि संभव हो तो ऐसे और पुष्प लाएँ।
भीम निकल पड़ते हैं।
और यही छोटी-सी इच्छा उन्हें गन्धमादन के और भीतर ले जाती है।
अब उनका सामना केवल पर्वत और वन से नहीं होगा।
कथा उन्हें— यक्षों, कुबेर और फिर एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक प्रसंग तक ले जाएगी।
यात्रा का नया मानचित्र
अब हमारे शोध-मानचित्र में यह चरण जुड़ गया है— प्रयाग- गंगा का ऊपरी क्षेत्र-कनखल-हिमालय-गन्धमादन-बदरिकाश्रम क्षेत्र-सौगन्धिक वन-कुबेर का प्रदेश लेकिन फिर से स्पष्ट कर दें—
इन प्राचीन नामों को आधुनिक नक्शे पर जोड़ते समय सभी पहचानें समान रूप से निश्चित नहीं हैं।
जहाँ प्रमाण होगा, वहाँ हम निश्चित भाषा इस्तेमाल करेंगे।
जहाँ केवल परंपरा होगी, वहाँ “परंपरा में माना जाता है” कहेंगे।
और जहाँ केवल संभावना होगी, वहाँ उसे संभावना ही रखेंगे।
अब कथा आगे बढ़ती है
भीम सौगन्धिक पुष्प की खोज में आगे निकल चुके हैं।
लेकिन उन्हें पता नहीं कि उनकी यह यात्रा उन्हें फिर एक ऐसे पात्र तक ले जाएगी जो पहले ही हमारे सामने आ चुका है— हनुमान।
इस बार प्रश्न केवल भीम की शक्ति का नहीं होगा।
हम देखेंगे कि महाभारत ने भीम और हनुमान को एक ही वायु-परंपरा में रखकर क्या साहित्यिक और दार्शनिक संरचना बनाई है।
और उसके बाद— सौगन्धिक पुष्प → यक्ष → कुबेर → गन्धमादन
के पूरे प्रसंग को एक साथ समझेंगे।
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