महाभारत — शान्तिपर्व — भाग ८ -राजा की शक्ति पर अंकुश — आत्मपरीक्षण और परामर्श

 महाभारत — शान्तिपर्व — भाग ८ -राजा की शक्ति पर अंकुश — आत्मपरीक्षण और परामर्श

न्याय करने वाले के सामने सबसे बड़ा संकट केवल अपराधी नहीं होता। कई बार उससे बड़ा संकट स्वयं उसकी सत्ता होती है।

जिस व्यक्ति के पास दण्ड देने का अधिकार है, यदि वही अपने निर्णय को अंतिम सत्य मानने लगे, तो न्याय धीरे-धीरे व्यक्तिगत इच्छा में बदल सकता है।

इसीलिए शान्तिपर्व का राजधर्म केवल यह नहीं बताता कि राजा दूसरों पर कैसे शासन करे; वह यह भी पूछता है कि राजा अपने ऊपर कैसे शासन करे।

युधिष्ठिर के लिए यह प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। उसने युद्ध जीता था, लेकिन उस विजय की कीमत इतनी बड़ी थी कि उसके भीतर यह प्रश्न उठ चुका था कि क्या केवल विजय ही धर्म की सिद्धि है।

अब उसे ऐसा राज्य चलाना था जिसमें उसके अपने निर्णय से असंख्य लोगों का जीवन प्रभावित होने वाला था।

इसलिए भीष्म की शिक्षा में राजा की बाहरी शक्ति के साथ उसकी आन्तरिक मर्यादा भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

राजा को किस पर विश्वास करना चाहिए?

युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा था—

केषु विश्वसितव्यं स्याद्राज्ञा कस्यांचिदापदि। कुतो वाऽऽत्मा दृढं रक्ष्यस्तन्मे ब्रूहि पितामह॥

अर्थात्—हे पितामह! राजा को किन लोगों पर विश्वास करना चाहिए? विपत्ति में किस पर भरोसा किया जाए? और राजा को अपने आपको किस प्रकार सुरक्षित रखना चाहिए?

यह प्रश्न केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का प्रश्न नहीं है।

राजा अकेले निर्णय नहीं ले सकता।

उसे मंत्री चाहिए, सेनापति चाहिए, पुरोहित चाहिए, दूत चाहिए, प्रशासक चाहिए और ऐसे लोग भी चाहिए जो उसे अप्रिय सत्य कह सकें।

लेकिन यहीं एक विरोधाभास पैदा होता है।

राजा यदि केवल अपने प्रशंसकों से घिरा रहे तो उसे अपनी भूल दिखाई नहीं देगी।

और यदि वह किसी पर विश्वास ही न करे, तो शासन संदेह और भय का तंत्र बन जाएगा।

इसलिए राजधर्म का स्वस्थ मार्ग विश्वास और विवेक के बीच संतुलन खोजता है।

केवल सहमति देने वाला मंत्री उपयोगी नहीं

शासन में परामर्श का अर्थ यह नहीं कि मंत्री राजा की प्रत्येक बात पर सहमति दें।

यदि राजा ने निर्णय पहले ही कर लिया और मंत्रियों का काम केवल उसकी प्रशंसा करना रह गया, तो वह परामर्श नहीं, औपचारिकता है।

सच्चा परामर्श वह है जिसमें राजा के सामने दूसरे दृष्टिकोण रखने का अवसर हो।

कभी मंत्री कहे कि निर्णय सही है। कभी वह कहे कि इसमें जोखिम है।

और कभी उसे यह कहने का साहस भी हो कि— “राजन्, आपका निर्णय उचित नहीं है।”

राजा यदि ऐसी असहमति को शत्रुता समझने लगे, तो शासन में सत्य बोलने का स्थान समाप्त हो जाता है।

और जहाँ सत्य बोलने का स्थान समाप्त होता है, वहाँ राजा को वास्तविकता देर से दिखाई देती है।

आत्मसुरक्षा का अर्थ केवल शरीर की रक्षा नहीं

युधिष्ठिर के प्रश्न में “आत्मा दृढं रक्ष्यः” का आशय केवल राजा के शारीरिक जीवन की सुरक्षा तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए।

राजा की वास्तविक सुरक्षा उसकी बुद्धि, विवेक और चरित्र की सुरक्षा में भी है।

राजा का शरीर सुरक्षित हो सकता है, लेकिन यदि उसका विवेक लोभ से भ्रष्ट हो गया, उसका निर्णय क्रोध से संचालित होने लगा और उसके चारों ओर केवल चाटुकार रह गए, तो राज्य वास्तव में असुरक्षित हो चुका है।

इस दृष्टि से राजा की सबसे बड़ी सुरक्षा बाहरी किले नहीं, बल्कि उसके भीतर की मर्यादा है।

गुप्त सूचना और शासन

प्राचीन राजव्यवस्था में राजा को अपने राज्य की वास्तविक स्थिति जानने के लिए दूतों और गुप्त सूचनाओं का सहारा लेना पड़ता था।

यह स्वाभाविक भी था। राजा के सामने जो दृश्य प्रस्तुत किया जाता है, वह हमेशा सम्पूर्ण सत्य नहीं होता।

अधिकारी अपने दोष छिपा सकते हैं। स्थानीय शासक अपने अत्याचार छिपा सकते हैं।

व्यापारी करों की वास्तविक स्थिति अलग बता सकते हैं।

प्रजा भय के कारण अपनी कठिनाइयाँ खुलकर न कह सकती है।

इसलिए राजा को शासन की वास्तविक स्थिति जानने के लिए अनेक स्रोतों से सूचना प्राप्त करनी पड़ती थी।

लेकिन यहाँ भी एक गहरी सावधानी आवश्यक है।

सूचना और सत्य एक ही वस्तु नहीं हैं।

सूचना किसी व्यक्ति द्वारा दी गई है; सत्य की परीक्षा राजा को स्वयं करनी है।

यदि राजा हर गुप्त सूचना को सत्य मान ले, तो निर्दोष व्यक्ति भी संदेह का शिकार हो सकता है।

इसलिए गुप्तचर व्यवस्था भी विवेक के अधीन होनी चाहिए।

दण्डनीति और सूचना का सम्बन्ध

यहीं पिछले भाग का दण्डनीति-विचार और अधिक स्पष्ट होता है।

यदि राजा को अपराध की सही जानकारी नहीं है, तो न्यायपूर्ण दण्ड देना कठिन है।

लेकिन यदि राजा सूचना को बिना जाँच स्वीकार करता है, तो दण्ड स्वयं अन्याय का कारण बन सकता है।

अर्थात् न्याय की श्रृंखला में कई स्तर हैं— सूचना → परीक्षण → विचार → निर्णय → दण्ड।

इनमें से किसी एक चरण को हटाने पर न्याय कमजोर हो सकता है।

महाभारत की शासन-दृष्टि को इसी क्रम में देखने पर स्पष्ट होता है कि राजधर्म केवल राजा की शक्ति का वर्णन नहीं है; वह शक्ति के सही उपयोग की प्रक्रिया पर भी विचार करता है।

राजा और आलोचना

राजा के लिए सबसे कठिन व्यक्ति वह नहीं जो उसका विरोध करता है, बल्कि वह हो सकता है जो उसके सामने सत्य बोलता है।

विरोधी राजा की आलोचना अपने स्वार्थ से कर सकता है।

लेकिन अपना हित छोड़कर राजा की भूल दिखाने वाला व्यक्ति राज्य के लिए मूल्यवान हो सकता है।

इसलिए एक स्वस्थ शासन-व्यवस्था में आलोचना को केवल विद्रोह समझना खतरनाक है।

राजा को यह समझना पड़ता है कि—

हर असहमति शत्रुता नहीं होती और हर सहमति निष्ठा नहीं होती।

यह राजनीतिक मनोविज्ञान का अत्यन्त सूक्ष्म सिद्धान्त है।

राजा यदि केवल प्रशंसा सुनना चाहता है, तो धीरे-धीरे उसके आसपास वास्तविकता के स्थान पर उसकी अपनी छवि रह जाती है।

और सत्ता में सबसे खतरनाक भ्रम यही हो सकता है कि शासक अपनी बनाई हुई छवि को ही राज्य की वास्तविक स्थिति समझने लगे।

राजधर्म का एक और आधार — योग्य सहयोगी

शान्तिपर्व में युधिष्ठिर बार-बार शासन के विभिन्न अंगों के विषय में पूछता है। एक स्थान पर वह कोश, दण्ड, दुर्ग, सहायकों, मंत्रियों, ऋत्विजों, पुरोहितों और आचार्यों तक के विषय में प्रश्न करता है।

इससे एक बात स्पष्ट होती है—

राज्य किसी एक व्यक्ति की क्षमता से नहीं चलता।

राजा शासन का केन्द्र हो सकता है, लेकिन शासन स्वयं एक सहयोगी तंत्र है।

अयोग्य व्यक्ति को केवल निजी निकटता के कारण महत्वपूर्ण पद देना राज्य को कमजोर कर सकता है।

इसके विपरीत योग्य व्यक्ति को केवल इसलिए दूर कर देना कि वह राजा से सहमत नहीं है, शासन की बौद्धिक शक्ति को कम कर सकता है। इसलिए योग्य व्यक्ति का चयन भी राजधर्म का हिस्सा है।

राजा का अकेलापन

राजसत्ता का एक विरोधाभास है।

राजा के पास बहुत लोग होते हैं, लेकिन निर्णय के क्षण में वह अकेला हो सकता है।

सैकड़ों लोग सलाह दे सकते हैं; अन्ततः निर्णय राजा को लेना होता है।

यही कारण है कि परामर्श के बाद भी आत्मपरीक्षण आवश्यक है।

राजा को स्वयं से पूछना चाहिए— क्या मेरा निर्णय क्रोध से उत्पन्न हुआ है?

क्या इसमें किसी व्यक्ति के प्रति मेरा निजी राग-द्वेष काम कर रहा है?

क्या मुझे पूरी सूचना प्राप्त है? क्या मैंने विरोधी मत सुना है?

क्या इस निर्णय से राज्य का दीर्घकालिक हित सुरक्षित होगा?

और सबसे कठिन प्रश्न— यदि यह निर्णय मेरे अपने विरुद्ध होता, तो क्या मैं इसे न्यायपूर्ण मानता?

यही प्रश्न राजा को अपने निर्णय का निष्पक्ष परीक्षक बना सकता है।

दण्डनीति का गहरा अर्थ

शान्तिपर्व में दण्ड के महत्व को बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है— 

दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः॥

अर्थात् दण्ड प्रजा को अनुशासित करता है, दण्ड ही उसकी रक्षा करता है; जब सब सो रहे होते हैं, तब भी दण्ड व्यवस्था की रक्षा करता है। बुद्धिमान लोग दण्ड को धर्म की रक्षा करने वाला मानते हैं।

लेकिन इस श्लोक को केवल “कठोर शासन आवश्यक है” के अर्थ में पढ़ना अधूरा होगा।

इसके पीछे एक और प्रश्न है— दण्ड किसके हाथ में है और वह स्वयं किसके अधीन है?

यदि दण्ड धर्म की रक्षा करता है, तो दण्ड देने वाला भी धर्म से मुक्त नहीं हो सकता।

यही शान्तिपर्व की गहरी संतुलन-दृष्टि है। दण्ड आवश्यक है, पर दण्ड मनमाना नहीं।

राजा शक्तिशाली है, पर राजा निरंकुश नहीं। परामर्श आवश्यक है, पर राजा निर्णयहीन नहीं।

सूचना आवश्यक है, पर सूचना स्वयं सत्य नहीं। और न्याय आवश्यक है, पर न्याय केवल दण्ड देने का नाम नहीं।

सत्ता का वास्तविक अनुशासन

यहाँ शान्तिपर्व का राजधर्म अपने अधिक गहरे स्तर पर पहुँचता है।

राज्य की शक्ति को नियंत्रित करने के लिए केवल बाहरी नियम पर्याप्त नहीं हैं। सत्ता के भीतर भी धर्मबुद्धि चाहिए।

इसलिए राजा का आत्मसंयम, योग्य मंत्रियों का चयन, विरोधी मत को सुनना, सूचना की परीक्षा करना और दण्ड को न्याय से जोड़ना—ये सभी अलग-अलग बातें नहीं हैं।

ये एक ही व्यवस्था के अलग-अलग अंग हैं।

जिस प्रकार शरीर में किसी एक अंग की विकृति पूरे शरीर को प्रभावित कर सकती है, उसी प्रकार शासन में किसी एक स्तर का भ्रष्ट होना पूरे राज्य को प्रभावित कर सकता है।

इसीलिए शान्तिपर्व का राजधर्म केवल यह नहीं पूछता कि— “राजा क्या करे?”

वह उससे अधिक कठिन प्रश्न पूछता है—

“राजा को ऐसा क्या करना चाहिए जिससे उसकी शक्ति स्वयं उसके लिए और प्रजा के लिए विनाश का कारण न बन जाए?”

यहीं से राजधर्म का अगला आयाम खुलता है—राजा और अर्थव्यवस्था का सम्बन्ध।

क्योंकि न्याय और सुरक्षा की व्यवस्था के लिए राज्य को धन चाहिए; लेकिन वही धन यदि राजा के निजी उपभोग का साधन बन जाए, तो राजकोष प्रजा की सेवा के बजाय सत्ता की भूख का साधन बन सकता है।

शान्तिपर्व अब इसी कठिन प्रश्न की ओर बढ़ता है—राज्य का धन किसका है और राजा उसका स्वामी है या संरक्षक?

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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