महाभारत — सौप्तिकपर्व — भाग २ : अश्वत्थामा और शिव — प्रतिशोध को मिली दैवी शक्ति

 महाभारत — सौप्तिकपर्व — भाग २ : अश्वत्थामा और शिव — प्रतिशोध को मिली दैवी शक्ति

रात्रि गहरा चुकी थी।

अश्वत्थामा पाण्डव शिविर के द्वार पर खड़ा था। उसके साथ कृपाचार्य और कृतवर्मा थे।

लेकिन शिविर में प्रवेश करने से पहले उसके सामने एक असाधारण बाधा उपस्थित हुई।

वह साधारण सैनिक नहीं था।

महाभारत के वर्णन में वह एक विराट, भयानक और तेजस्वी पुरुष के रूप में दिखाई देता है।

अश्वत्थामा ने उसे रोकने का प्रयास किया।

अस्त्रों की असफलता

अश्वत्थामा ने उस रक्षक पर विभिन्न अस्त्रों का प्रयोग किया। लेकिन उसका कोई प्रभाव नहीं हुआ।

यह प्रसंग सामान्य युद्ध-विज्ञान की सीमा से बाहर है।

इसे आधुनिक वैज्ञानिक घटना के रूप में प्रमाणित करना सम्भव नहीं। मूल आख्यान में इसका उद्देश्य भी केवल युद्ध-कौशल दिखाना नहीं है।

अश्वत्थामा के सामने पहली बार यह स्पष्ट होता है कि— प्रतिशोध की शक्ति केवल बाहरी अस्त्रों से पूरी नहीं होगी।

उसे किसी और शक्ति की आवश्यकता है।

शिव की आराधना

अश्वत्थामा ने महादेव की उपासना की।

महाभारत के सौप्तिकपर्व में शिव का प्रसंग अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

अश्वत्थामा अपने भीतर संचित क्रोध, दुःख और प्रतिशोध को एकाग्र करता है।

तब कथा के अनुसार शिव उसके सामने प्रकट होते हैं और उसे अपनी शक्ति प्रदान करते हैं।

इसके बाद अश्वत्थामा के हाथ में एक दिव्य खड्ग आता है।

अब वह केवल द्रोण का पुत्र नहीं है।

वह उस रात एक ऐसे व्यक्ति में बदल जाता है जिसके भीतर व्यक्तिगत शोक और प्रतिशोध एक हिंसक संकल्प में परिवर्तित हो चुके हैं।

शिव की भूमिका को कैसे समझें?

यहाँ शोध की दृष्टि से तीन स्तर अलग रखना आवश्यक है।

पहला — पाठ का स्तर:
महाभारत अश्वत्थामा को शिव से सम्बद्ध शक्ति प्राप्त करते हुए प्रस्तुत करता है।

दूसरा — धार्मिक स्तर:
शैव परम्परा इस प्रसंग को शिव की दैवी सत्ता और उनके अनुग्रह से जोड़कर देख सकती है।

तीसरा — प्रतीकात्मक स्तर:
एक मनुष्य की सामान्य क्षमता तब असाधारण विनाशकारी शक्ति में बदल जाती है जब उसका पूरा चित्त एक ही लक्ष्य—प्रतिशोध—पर केन्द्रित हो जाए।

इन तीनों स्तरों को मिलाकर एक को दूसरे का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।

शिविर में प्रवेश

शक्ति प्राप्त करने के बाद अश्वत्थामा शिविर में प्रवेश करता है।

कृपाचार्य और कृतवर्मा बाहर रहते हैं। अब भीतर केवल अश्वत्थामा है।

रात्रि में सोया हुआ शिविर। दिन के युद्ध से थके हुए योद्धा।

किसी को यह अनुमान नहीं कि युद्ध समाप्त होने के बाद भी मृत्यु उनके पास पहुँचने वाली है।

अश्वत्थामा धीरे-धीरे शिविर के भीतर बढ़ता है।

धृष्टद्युम्न पहला लक्ष्य

सबसे पहले उसका लक्ष्य बनता है—धृष्टद्युम्न। यही वह व्यक्ति था जिसने द्रोण का वध किया था।

अश्वत्थामा के लिए धृष्टद्युम्न केवल शत्रु नहीं था। वह उसके पिता की मृत्यु का प्रत्यक्ष कारण था।

इसलिए रात्रि का यह आक्रमण व्यापक राजनीतिक युद्ध से हटकर व्यक्तिगत प्रतिशोध का रूप ले चुका था।

अश्वत्थामा धृष्टद्युम्न को सोते हुए पकड़ता है। धृष्टद्युम्न जागता है और प्रतिरोध करने का प्रयास करता है।

लेकिन अश्वत्थामा उसे अवसर नहीं देता। वह उसे पैरों से पकड़कर घसीटता है और अन्ततः उसकी हत्या कर देता है।

यह हत्या युद्धभूमि में नहीं हुई।

यही बात इस प्रसंग को कुरुक्षेत्र के सामान्य युद्ध से अलग करती है।

प्रतिशोध की सीमा टूटती है

धृष्टद्युम्न की मृत्यु के बाद अश्वत्थामा रुकता नहीं।

वह पाण्डव पक्ष के सोए हुए योद्धाओं पर आक्रमण करता है।

शिविर में भगदड़ मच जाती है।

रात्रि, अन्धकार, भय और अचानक हुए आक्रमण के कारण सोते हुए योद्धाओं को संगठित प्रतिरोध का अवसर नहीं मिलता।

कई योद्धा मारे जाते हैं।

और अब कथा उस सबसे दुखद घटना की ओर बढ़ती है जिसके कारण सौप्तिकपर्व भारतीय स्मृति में इतना गहरा अंकित है—

द्रौपदी के पाँच पुत्रों—उपपाण्डवों—की हत्या।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य आगे सामने आएगा। अश्वत्थामा उन्हें पाण्डव समझकर मारता है।

अर्थात् प्रतिशोध की अग्नि में उसका लक्ष्य और वास्तविक व्यक्ति के बीच का भेद भी समाप्त हो चुका था।

युद्ध की दिशा बदल गई

कुरुक्षेत्र में दिन के समय योद्धा एक-दूसरे के सामने लड़ते थे।

यहाँ रात में सोए हुए लोगों की हत्या हो रही है। इसलिए सौप्तिकपर्व केवल युद्ध की अगली कड़ी नहीं है।

यह युद्ध-नीति से युद्धोत्तर प्रतिशोध में संक्रमण है।

और इसी बिन्दु पर महाभारत का प्रश्न और गहरा हो जाता है—

जब युद्ध समाप्त हो जाए, तब प्रतिशोध को कौन रोकता है?

अगले भाग में हम पाण्डव शिविर के इस रात्रि-संहार को मूल कथा के क्रम में आगे बढ़ाएँगे और देखेंगे कि अश्वत्थामा के हाथों वास्तव में कौन-कौन मारे गए तथा पाँच उपपाण्डवों की हत्या कैसे हुई।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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