महाभारत — द्रोणपर्व — भाग ४८ अभिमन्यु के बाद : शोक से प्रतिज्ञा तक

 महाभारत — द्रोणपर्व — भाग ४८ - अभिमन्यु के बाद : शोक से प्रतिज्ञा तक

अभिमन्यु गिर चुका था।

तेरहवें दिन का सूर्य अस्त होने की ओर बढ़ रहा था। चक्रव्यूह टूट चुका था, लेकिन उसके भीतर जो हुआ था, उसने पाण्डव-शिविर को भीतर तक हिला दिया था।

यह केवल एक योद्धा की मृत्यु नहीं थी।

अभिमन्यु अर्जुन का पुत्र था।सुभद्रा का पुत्र था। कृष्ण का भानजा था।
और पाण्डवों की अगली पीढ़ी की सबसे उज्ज्वल आशा था।

लेकिन महाभारत इस शोक को केवल व्यक्तिगत दुःख के रूप में नहीं रखता।

अभिमन्यु की मृत्यु के बाद युद्ध का स्वर ही बदल जाता है।

अब प्रश्न यह नहीं था कि—कौन युद्ध जीतेगा?

प्रश्न बन गया— अभिमन्यु के साथ जो हुआ, उसका उत्तर क्या होगा?

अर्जुन को अभी कुछ पता नहीं था

अर्जुन उस समय संशप्तकों से युद्ध कर रहा था।

त्रिगर्तों और अन्य योद्धाओं ने उसे मुख्य युद्धभूमि से दूर बाँध रखा था। यह व्यवस्था आकस्मिक नहीं थी। द्रोण की योजना ही ऐसी थी कि अर्जुन को अलग रखा जाए और युधिष्ठिर को पकड़ने का अवसर प्राप्त हो।

लेकिन इस योजना की एक दूसरी परिणति हुई— अर्जुन अपने पुत्र की रक्षा के लिए उपस्थित नहीं था।

यही महाभारत की युद्ध-व्यवस्था की एक बड़ी विडम्बना है।

एक ओर रणनीति सफल होती है।
दूसरी ओर उसी रणनीति के भीतर एक ऐसी घटना घटती है जो आगे पूरे युद्ध की दिशा प्रभावित करती है।

लौटता हुआ अर्जुन

संध्या के समय अर्जुन और कृष्ण शिविर की ओर लौटते हैं।

अर्जुन ने दिन भर युद्ध किया था। वह विजय की सामान्य अपेक्षा के साथ लौट रहा था।

लेकिन शिविर के निकट आते ही उसे कुछ असामान्य दिखाई देता है।

न जयघोष। न शंखध्वनि। न उत्साह।

पाण्डव शिविर में ऐसा मौन था जैसे किसी ने युद्धभूमि की सारी ध्वनि अचानक रोक दी हो।

अर्जुन के मन में प्रश्न उठता है— आज यह मौन क्यों है? वह कृष्ण से पूछता है।

फिर धीरे-धीरे उसे संकेत मिलने लगते हैं। और अन्ततः उसे ज्ञात होता है— अभिमन्यु मारा जा चुका है।

पिता और पुत्र के बीच उपस्थित अनुपस्थिति

यहाँ महाभारत का करुण पक्ष अपने अत्यन्त सूक्ष्म रूप में सामने आता है।

अर्जुन अपने पुत्र को देखने के लिए युद्धभूमि में नहीं था। वह उसके अन्तिम क्षणों का साक्षी नहीं था।

वह उसके पास तब नहीं पहुँचा जब उसका धनुष टूटा। जब उसका रथ नष्ट हुआ।

जब उसके अस्त्र समाप्त हुए। जब उसने रथचक्र उठाया। जब उसने गदा उठाई। और जब अन्ततः वह भूमि पर गिरा।

पिता के लिए सबसे बड़ी पीड़ा कभी-कभी मृत्यु नहीं होती। पीड़ा यह होती है कि—

जिस क्षण प्रिय व्यक्ति को हमारी सबसे अधिक आवश्यकता थी, हम वहाँ उपस्थित नहीं थे।

अर्जुन के भीतर यही शोक धीरे-धीरे क्रोध में परिवर्तित होता है।

युधिष्ठिर का मौन

अर्जुन जब युधिष्ठिर से पूछता है कि अभिमन्यु के साथ क्या हुआ, तब उसे पूरे घटनाक्रम का ज्ञान होता है।

लेकिन यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बात है। युधिष्ठिर स्वयं भी इस घटना को रोक नहीं सके।

अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश कर चुका था। उसके पीछे पाण्डव सेना को प्रवेश करना था।

लेकिन जयद्रथ ने उन्हें रोक दिया। यही वह बिन्दु है जहाँ चौदहवें दिन की कथा का बीज छिपा है।

अभिमन्यु की मृत्यु का कारण केवल चक्रव्यूह नहीं था।

केवल द्रोण नहीं थे। केवल कर्ण नहीं था। केवल दुःशासन-पुत्र नहीं था।

घटनाओं की पूरी श्रृंखला में जयद्रथ की भूमिका निर्णायक थी।

उसने पाण्डवों को अभिमन्यु तक पहुँचने से रोका।

इसलिए अर्जुन के सामने अब एक स्पष्ट लक्ष्य उभरता है— जयद्रथ।

कृष्ण की भूमिका : शोक को दिशा देना

यहाँ कृष्ण का व्यक्तित्व विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है।

अर्जुन के भीतर स्वाभाविक रूप से अनेक भाव उठ सकते थे—

शोक, अपराधबोध, क्रोध, असहायता और प्रतिशोध।

लेकिन कृष्ण उस भावनात्मक विस्फोट को केवल बढ़ाते नहीं हैं। वे उसे दिशा देते हैं।

महाभारत में कृष्ण बार-बार अर्जुन को युद्ध के व्यापक उद्देश्य की ओर लौटाते हैं।

लेकिन इस क्षण अर्जुन पिता है। योद्धा बाद में।

इसलिए उसका निर्णय भावनात्मक है। और वह घोषणा करता है—

“कल सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध करूँगा।” यदि वह ऐसा नहीं कर पाया—

तो अग्नि में प्रवेश करेगा। यही अर्जुन की प्रतिज्ञा है।

प्रतिज्ञा का मनोविज्ञान

यहाँ एक अत्यन्त गहरा प्रश्न उठता है। क्या यह केवल वीरता है?

या शोक की प्रतिक्रिया? या दोनों?

मनुष्य जब अत्यन्त तीव्र दुःख में होता है, तब वह कभी-कभी अपने भीतर की असहायता को किसी निश्चित लक्ष्य में बदल देता है।

अभिमन्यु की मृत्यु एक विशाल और जटिल घटना थी। लेकिन अर्जुन ने उस जटिलता को एक व्यक्ति में केन्द्रित कर दिया—

जयद्रथ।

अब उसका शोक एक लक्ष्य बन गया। युद्ध का अगला दिन इसलिए असाधारण होगा।

क्योंकि अब अर्जुन को केवल जयद्रथ से नहीं लड़ना है। उसे— सूर्यास्त से लड़ना है।

समय स्वयं शत्रु बन गया

यहीं से द्रोणपर्व की युद्ध-रचना और अधिक रोचक हो जाती है।

दुर्योधन और कौरव पक्ष जानते हैं कि अर्जुन ने प्रतिज्ञा कर ली है।

इसका अर्थ स्पष्ट है—

यदि जयद्रथ को सूर्यास्त तक बचा लिया गया, तो अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अग्नि में प्रवेश करेगा।

अर्थात कौरवों के लिए अगले दिन का लक्ष्य केवल पाण्डव सेना से लड़ना नहीं होगा।

उनका वास्तविक लक्ष्य होगा— जयद्रथ को सूर्यास्त तक सुरक्षित रखना।

और अर्जुन का लक्ष्य होगा— किसी भी प्रकार सूर्यास्त से पहले जयद्रथ तक पहुँचना।

युद्ध अब दो सेनाओं के बीच नहीं रह जाता।

यह—

अर्जुन बनाम समय

बन जाता है।

द्रोण की नई रणनीति

द्रोणाचार्य अगले दिन ऐसी व्यूह-रचना करते हैं जिसमें जयद्रथ को अत्यन्त भीतर सुरक्षित रखा जाएगा।

यहाँ द्रोण की भूमिका फिर सामने आती है। तेरहवें दिन उन्होंने चक्रव्यूह बनाया था।

चौदहवें दिन उनका उद्देश्य होगा— अर्जुन की गति को रोकना।

इसलिए अगले दिन का युद्ध केवल शस्त्रबल की परीक्षा नहीं होगा।

यह व्यूहभेदन, गति, समय-प्रबंधन और रणनीति की परीक्षा होगा।

अर्जुन के सामने अनेक स्तर होंगे।

हर स्तर पर कोई न कोई महारथी उसकी गति रोकने का प्रयास करेगा।

और इस पूरी व्यवस्था के केन्द्र में होगा—

जयद्रथ।

जयद्रथ : एक पात्र का अचानक बढ़ा हुआ महत्व

महाभारत में जयद्रथ पहले से उपस्थित है। उसका द्रौपदी-हरण का प्रसंग वनपर्व में आ चुका है।

वह पाण्डवों का शत्रु है।

लेकिन अब उसकी भूमिका अचानक बहुत बड़ी हो जाती है।

क्यों?

क्योंकि महाभारत की कथा में कभी-कभी कोई पात्र स्वयं अपने आकार से नहीं, बल्कि घटना के परिणाम से बड़ा हो जाता है।

अभिमन्यु के चक्रव्यूह में प्रवेश करने के बाद पाण्डवों को भीतर आने से रोकने वाला जयद्रथ था।

अब वही व्यक्ति अर्जुन की प्रतिज्ञा का लक्ष्य बन चुका है।

इस प्रकार— वनपर्व का जयद्रथ → द्रोणपर्व का निर्णायक लक्ष्य बन जाता है।

यहाँ एक और शोध-प्रश्न

क्या अभिमन्यु की मृत्यु केवल जयद्रथ के कारण हुई?

इतिहासात्मक विश्लेषण में ऐसा सरल कारण-निर्धारण उचित नहीं होगा।

घटनाओं की पूरी श्रृंखला थी—

अर्जुन को संशप्तकों द्वारा दूर ले जाना → द्रोण का चक्रव्यूह → अभिमन्यु का प्रवेश → पाण्डवों का पीछे न पहुँच पाना → जयद्रथ द्वारा अवरोध → अभिमन्यु का अकेला पड़ना → क्रमशः उसके अस्त्रों का नष्ट होना → सामूहिक घेराव → अन्ततः गदा-प्रहार।

इसलिए जयद्रथ एक निर्णायक कड़ी है, लेकिन अकेला कारण नहीं।

यही अंतर कथा और शोध के बीच है। कथा कहती है— “जयद्रथ ने अभिमन्यु को मरवाया।”

शोध पूछता है— “कौन-कौन सी परिस्थितियाँ मिलकर उस मृत्यु तक पहुँचीं?”

और यही प्रश्न महाभारत को केवल धार्मिक आख्यान से आगे बढ़ाकर मानव-व्यवहार, रणनीति और सत्ता के अध्ययन का ग्रंथ बनाता है।

चौदहवें दिन की सुबह

रात्रि बीतती है। कौरव पक्ष जयद्रथ की रक्षा की तैयारी करता है।

पाण्डव पक्ष अभिमन्यु की मृत्यु के शोक में है। और अर्जुन ने प्रतिज्ञा कर ली है।

अब पूरा युद्ध एक समय-सीमा में बँध चुका है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक।

इस एक दिन में अर्जुन को—

द्रोण की व्यवस्था भेदनी है, कौरव महारथियों को पार करना है, जयद्रथ तक पहुँचना है, और सूर्यास्त से पहले उसे मारना है।

यदि वह असफल हुआ— तो उसकी प्रतिज्ञा उसके अपने जीवन पर समाप्त होगी।

इस प्रकार महाभारत का अगला दिन एक असाधारण प्रयोग जैसा दिखाई देता है—

क्या एक मनुष्य अपनी प्रतिज्ञा, अपनी गति और अपनी रणनीति से समय को पराजित कर सकता है?

और यहीं से द्रोणपर्व अपने सबसे नाटकीय युद्ध-दिन में प्रवेश करता है।

कठोर परीक्षा

प्रश्न १: क्या अर्जुन की जयद्रथ-वध प्रतिज्ञा न्यायपूर्ण प्रतिक्रिया थी, या शोक से उत्पन्न प्रतिशोध—यह निर्णय पाठक पर छोड़ते हुए, दोनों के समर्थन में कौन-से पाठ-साक्ष्य मिलते हैं?

प्रश्न २: क्या जयद्रथ को अभिमन्यु-वध का “मुख्य दोषी” कहना मूल पाठ की जटिल घटनाओं को सरल बना देता है?

प्रश्न ३: क्या द्रोण की व्यूह-रचना में सैन्य रणनीति और युद्ध-मर्यादा के बीच कोई स्पष्ट तनाव दिखाई देता है?

प्रश्न ४: कृष्ण की भूमिका को यदि “चमत्कार” से अलग करके केवल रणनीतिक दृष्टि से पढ़ें, तो चौदहवें दिन उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान क्या दिखाई देता है?

प्रश्न ५: सूर्यास्त की समय-सीमा युद्ध की रणनीति को किस प्रकार बदल देती है?

अगला प्रसंग अब चौदहवें दिन की युद्ध-रचना और जयद्रथ की सुरक्षा से आरम्भ होगा—जहाँ द्रोणाचार्य अर्जुन के मार्ग में एक के बाद एक रणनीतिक अवरोध खड़े करते हैं।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है