महाभारत — स्त्रीपर्व - भाग–४ : कर्ण के बाद — विजय का अर्थ बदल जाता है
महाभारत — स्त्रीपर्व - भाग–४ : कर्ण के बाद — विजय का अर्थ बदल जाता है
कुन्ती ने जब कर्ण के जन्म का रहस्य बताया, तब पाण्डवों के लिए कुरुक्षेत्र की पूरी कथा जैसे दूसरी बार घटित हुई।
युद्ध वही था। मृत्यु वही थी। कर्ण वही था।
लेकिन संबंध की जानकारी बदलते ही घटनाओं का अर्थ बदल गया।
यही महाभारत की कथा-दृष्टि की एक बड़ी विशेषता है—घटना केवल अपने बाहरी रूप से नहीं बनती; उसका अर्थ उस ज्ञान से भी बनता है जिसके साथ हम उसे देखते हैं।
युधिष्ठिर के सामने एक नया शोक
युधिष्ठिर को यह जानकर अत्यन्त दुःख हुआ कि कर्ण उनका ज्येष्ठ भाई था।
लेकिन उनका दुःख केवल भ्रातृ-वियोग का नहीं था।
उनके सामने यह प्रश्न भी था कि इतने वर्षों तक यह सत्य छिपा क्यों रहा।
कर्ण और पाण्डवों के बीच जो संघर्ष हुआ, उसमें अब एक नया आयाम जुड़ गया था।
कर्ण ने पाण्डवों का विरोध किया। पाण्डवों ने कर्ण का।
दुर्योधन और कर्ण की मित्रता ने इस संघर्ष को और गहरा किया।
लेकिन अब मृत्यु के बाद पता चला कि इन सबके पीछे एक ही माता की संतानें थीं।
महाभारत यहाँ मनुष्य की एक कठिन सीमा को सामने रखता है—
हम जिस व्यक्ति को देखते हैं, उसके बारे में उपलब्ध जानकारी के आधार पर ही निर्णय करते हैं; लेकिन सत्य का कोई छिपा हुआ पक्ष सामने आ जाए तो वही निर्णय एक नई दृष्टि से दिखाई देने लगता है।
क्या कर्ण को पहले सत्य बता देना चाहिए था?
यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है। कुन्ती ने कर्ण को जन्म दिया।
उन्होंने उसे त्याग दिया। बाद में उन्होंने उससे भेंट भी की।
लेकिन उन्होंने पाण्डवों के सामने उसका जन्म-सत्य युद्ध से पहले प्रकट नहीं किया।
यहाँ महाभारत किसी एक सरल नैतिक निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता।
कुन्ती के सामने सामाजिक परिस्थितियाँ थीं।
कर्ण के सामने अपनी पहचान और दुर्योधन के प्रति कृतज्ञता थी।
पाण्डवों के सामने अपने अधिकार और अपमानों का इतिहास था।
कृष्ण के सामने युद्ध रोकने और धर्म-संतुलन स्थापित करने का प्रयास था।
इसलिए कर्ण की कथा किसी एक व्यक्ति के निर्णय से नहीं बनी।
अनेक निर्णयों ने मिलकर वह परिस्थिति बनाई जिसमें अंततः भाई भाई के विरुद्ध खड़े हुए।
कर्ण का निर्णय भी महत्त्वपूर्ण था
कर्ण को जब कृष्ण ने उसका जन्म बताया, तब उसके सामने विकल्प था।
वह पाण्डवों की ओर जा सकता था। लेकिन उसने दुर्योधन को नहीं छोड़ा।
इस तथ्य को भी कथा से हटाया नहीं जा सकता।
यदि केवल कुन्ती के मौन को दोष का कारण माना जाए, तो कर्ण के अपने निर्णयों का महत्त्व कम हो जाएगा।
कर्ण जानता था कि दुर्योधन उसके जीवन का वह व्यक्ति था जिसने उसे सार्वजनिक रूप से सम्मान दिया था।
इसलिए उसने उस संबंध को निभाने का निर्णय लिया।
यह निर्णय नैतिक रूप से सरल नहीं है, क्योंकि दुर्योधन के अनेक कर्मों से कर्ण स्वयं भी जुड़ा रहा।
लेकिन कृतज्ञता और धर्म के बीच उसका संघर्ष उसके चरित्र का एक केंद्रीय तत्व है।
महाभारत में धर्म कभी अकेला नहीं चलता
युधिष्ठिर का धर्म। भीष्म का धर्म। द्रोण का धर्म। कर्ण की कृतज्ञता। अर्जुन का क्षात्रधर्म। कृष्ण की नीति। द्रौपदी का न्याय। गान्धारी का मातृधर्म। कुन्ती का मातृत्व।
इन सबके बीच महाभारत कोई सरल रेखा नहीं खींचता।
यही कारण है कि महाभारत को केवल “धर्म की विजय” की कथा कह देना उसके भीतर उपस्थित जटिलता को कम कर देता है।
युद्ध के बाद भी प्रश्न समाप्त नहीं होते। बल्कि कई प्रश्न पहली बार स्पष्ट दिखाई देते हैं।
मृतकों के प्रति अन्तिम कर्तव्य
कर्ण के रहस्य के बाद कथा फिर मृतकों की ओर लौटती है।
अब प्रश्न है— इन मृत योद्धाओं का अंतिम संस्कार कौन करेगा?
युद्ध में जो व्यक्ति एक-दूसरे के शत्रु थे, मृत्यु के बाद उनके प्रति कर्तव्य बदल जाता है।
जीवन में युद्ध था। मृत्यु में संस्कार है।
यहीं महाभारत एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाता है—
शत्रु की मृत्यु के बाद शत्रुता का क्या अर्थ रह जाता है?
धर्मशास्त्रीय दृष्टि से मृत व्यक्ति के प्रति अन्त्येष्टि और जलदान जैसे कर्तव्य अपनी अलग महत्ता रखते हैं।
इसलिए युद्ध के बाद पाण्डवों और धृतराष्ट्र-पक्ष के बीच संबंधों का एक नया चरण आरम्भ होता है।
जल के सामने समाप्त हो जाते हैं भेद
नदी के तट पर जब मृतकों के लिए जल अर्पित किया जाता है, तब युद्ध की सारी राजनीतिक पहचान पीछे छूट जाती है।
राजा। महारथी। सैनिक। पुत्र। भाई। मित्र। शत्रु।
सब मृत्यु के सामने एक ही स्थिति में हैं।
यहाँ महाभारत की दृष्टि लगभग उपनिषद् जैसी हो जाती है—
शरीर का भेद जीवन तक है; मृत्यु के सामने वह भेद टिकता नहीं।
लेकिन महाभारत शरीर के नश्वर होने की बात केवल दार्शनिक सिद्धान्त के रूप में नहीं कहता।
वह हमें मृत शरीरों के बीच खड़ा करके उसका अनुभव कराता है।
स्त्रीपर्व का केंद्रीय परिवर्तन
युद्ध के पहले प्रश्न था— किसका अधिकार?
युद्ध के दौरान प्रश्न था— कौन विजयी होगा?
युद्ध के बाद प्रश्न है— इस विजय की मानवीय कीमत क्या थी?
और कर्ण के रहस्य के बाद एक और प्रश्न जुड़ जाता है— क्या हम जिनसे लड़ते हैं, उन्हें वास्तव में जानते भी हैं?
यही कारण है कि स्त्रीपर्व महाभारत के युद्ध का केवल उपसंहार नहीं है।
यह युद्ध की नैतिक पुनर्परीक्षा है।
अगला प्रसंग
अब कथा धृतराष्ट्र के भीतर के तूफान की ओर बढ़ेगी।
वे पाण्डवों से मिलेंगे।
बाहर से यह एक शोकाकुल पिता और विजयी भतीजों का मिलन होगा।
लेकिन भीतर धृतराष्ट्र के मन में दुर्योधन की मृत्यु, अपने पुत्रों का विनाश और पाण्डवों के प्रति वर्षों से संचित भाव एक साथ उपस्थित होंगे।
यहीं भीम और धृतराष्ट्र के आलिंगन का अत्यन्त सूक्ष्म और नाटकीय प्रसंग सामने आता है—जहाँ कृष्ण की दूरदर्शिता एक छोटे से हस्तक्षेप के माध्यम से एक और संभावित मृत्यु को रोकती है।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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