महाभारत — भीष्मपर्व भाग — अर्जुन विषाद : कमजोरी, करुणा या नैतिक संकट?
महाभारत — भीष्मपर्व
भाग — अर्जुन विषाद : कमजोरी, करुणा या नैतिक संकट?
अर्जुन ने जब अपने लोगों को देखा
कृष्ण ने रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कर दिया।
अर्जुन ने सामने देखा। वहाँ केवल कौरव सेना नहीं थी।
वहाँ उसके अपने लोग थे।
भीष्म—जिन्हें उसने बचपन से पितामह माना था।
द्रोण—उसके गुरु।
कृपाचार्य। भाई। चचेरे भाई। मामा।श्वसुर।
मित्र।
संबंधी।
और उन सबके पीछे था उसका अपना कुरुवंश।
युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन के सामने एक असाधारण स्थिति उत्पन्न हुई—
जिसे वह युद्धभूमि समझकर आया था, वह अचानक संबंधों का मैदान बन गई।
यहीं से अर्जुन का विषाद आरंभ होता है।
अर्जुन की पहली प्रतिक्रिया—शरीर बोलने लगता है
अर्जुन कृष्ण से कहता है— दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।
“हे कृष्ण! अपने इन स्वजनों को युद्ध के लिए उपस्थित देखकर…”
इसके बाद उसके शरीर में परिवर्तन होने लगते हैं—
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥
उसके अंग शिथिल हो रहे हैं। मुख सूख रहा है। शरीर काँप रहा है। रोमांच हो रहा है।
फिर वह कहता है— गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते। गाण्डीव हाथ से छूट रहा है।
त्वचा जल रही है। और— न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः।
“मैं खड़ा रहने में समर्थ नहीं हूँ; मेरा मन जैसे भ्रमित हो रहा है।”
यहाँ गीता पहली बार मनुष्य के संकट को केवल विचार के रूप में नहीं, बल्कि शरीर–मन की संयुक्त अवस्था के रूप में सामने रखती है।
क्या यह केवल डर है?
यदि अर्जुन केवल डर गया होता तो समस्या सरल होती।
वह कह सकता था— “मुझे मृत्यु से भय लग रहा है।”
लेकिन अर्जुन ऐसा नहीं कहता। वह अपने संकट के कारणों को समझाने लगता है।
वह कहता है— मैं अपने ही लोगों को मारकर क्या करूँगा?
यही बात निर्णायक है।
उसका प्रश्न अपने जीवन की सुरक्षा नहीं है।
उसका प्रश्न है— क्या अपने ही संबंधियों की हत्या करके प्राप्त राज्य और सुख सार्थक होंगे?
इसलिए अर्जुन का संकट केवल भय नहीं है।
उसमें नैतिक मूल्यांकन उपस्थित है।
अर्जुन युद्ध के परिणाम को वर्तमान से आगे देखता है
अर्जुन केवल यह नहीं सोच रहा— “मैं इन्हें मार दूँगा।”
वह आगे की पूरी सामाजिक परिणति की कल्पना करने लगता है।
वह कहता है कि कुल के विनाश से— कुलधर्म नष्ट होगा। कुलधर्म नष्ट होने पर— अधर्म बढ़ेगा।
अधर्म बढ़ने पर— कुल की सामाजिक व्यवस्था टूटेगी। स्त्रियों की स्थिति प्रभावित होगी।
वर्णसंकरता की बात आती है। पूर्वजों के लिए किए जाने वाले कर्मों के नष्ट होने की चिंता सामने आती है।
और अंततः वह कहता है—
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
“हाय! हम कितना बड़ा पाप करने के लिए तैयार हो गए हैं।”
यहाँ अर्जुन का संकट व्यक्तिगत भावुकता से सामाजिक और नैतिक प्रश्न में बदल जाता है।
“कुलधर्म” को कैसे समझें?
यहाँ आधुनिक पाठक को सावधान रहना चाहिए।
अर्जुन जिस कुलधर्म की बात करता है, वह आधुनिक अर्थ में केवल “परिवार की परंपरा” नहीं है।
प्राचीन महाभारतीय समाज में परिवार, वंश, संस्कार, उत्तराधिकार, धार्मिक कर्म और सामाजिक दायित्व परस्पर जुड़े हुए थे।
इसलिए अर्जुन को भय है कि युद्ध केवल व्यक्तियों को नहीं मारेगा।
यह— एक सामाजिक संरचना को तोड़ देगा।
यानी अर्जुन का प्रश्न है— क्या किसी राजनीतिक विजय की कीमत सामाजिक और नैतिक विघटन हो सकती है?
यह प्रश्न आज भी राजनीतिक दर्शन का महत्वपूर्ण प्रश्न है।
अर्जुन का सबसे कठिन तर्क
अर्जुन आगे एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कहता है—
यदि मुझे मारने वाले भी मुझे मारना चाहें, तब भी मैं उन्हें मारना नहीं चाहता।
वह युद्ध से हटने को तैयार है।
यहाँ अर्जुन एक मूल नैतिक सिद्धांत की ओर बढ़ता है—
क्या अन्याय का उत्तर अन्याय से देना उचित है?
लेकिन यहीं समस्या भी है।
यदि सामने वाला अन्याय कर रहा है, तो क्या उसका प्रतिरोध न करना धर्म है?
या अन्याय को रोकना ही धर्म है?
यही वह प्रश्न है जिसका समाधान अर्जुन स्वयं नहीं कर पा रहा।
अर्जुन के भीतर दो धर्म टकरा रहे हैं
यही प्रथम अध्याय की सबसे महत्वपूर्ण खोज है।
अर्जुन के सामने एक ही धर्म नहीं है।
कम-से-कम दो नैतिक दायित्व टकरा रहे हैं।
पहला— क्षत्रिय का युद्धधर्म। अन्याय के विरुद्ध युद्ध करना। अपने अधिकार और राज्य की रक्षा करना।
दूसरा— स्वजन के प्रति धर्म। -
गुरु, पितामह, बंधु और संबंधियों की हत्या न करना।
अर्जुन किसी एक को आसानी से चुन नहीं पा रहा।
इसलिए उसका संकट केवल— “मैं युद्ध करूँ या नहीं?”
नहीं है। असल प्रश्न है— “दो धर्मों में जब संघर्ष हो जाए तो श्रेष्ठ धर्म कौन-सा है?”
यहीं से गीता का दर्शन जन्म लेता है।
यही कारण है कि अर्जुन कृष्ण के सामने झुकता है
प्रथम अध्याय के अंत में अर्जुन की स्थिति निर्णायक हो जाती है।
वह कहता है— न योत्स्य इति गोविन्द। “हे गोविन्द! मैं युद्ध नहीं करूँगा।”
फिर— विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः।
धनुष-बाण छोड़कर वह रथ में बैठ जाता है।
यह दृश्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अर्जुन अभी कोई दार्शनिक निष्कर्ष नहीं निकाल पाया।
वह केवल इतना जानता है कि— उसकी वर्तमान बुद्धि इस परिस्थिति का समाधान नहीं कर पा रही।
और यही स्थिति दूसरे अध्याय की शुरुआत बनती है।
“विषाद” क्यों?
गीता का पहला अध्याय केवल “अर्जुन की हार” नहीं है।
उसका नाम है—
अर्जुनविषादयोग।
यहाँ “विषाद” केवल दुख नहीं है।
वह ऐसी मानसिक अवस्था है जिसमें मनुष्य की पुरानी निश्चितताएँ टूट जाती हैं।
अर्जुन युद्ध के लिए तैयार होकर आया था।
उसे अपने कर्तव्य का ज्ञान था।
लेकिन जैसे ही वास्तविक परिस्थिति उसके सामने आई—
उसकी सारी निश्चितताएँ टूट गईं। यही विषाद है।
मनुष्य कहता है—
“मैं जानता था कि मुझे क्या करना है; लेकिन जब वास्तविक जीवन मेरे सामने आया तो मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूँ।”
क्या विषाद “योग” हो सकता है?
यह गीता की भाषा का अत्यंत रोचक पक्ष है।
विषाद + योग।
विषाद सामान्यतः विघटन है। योग सामान्यतः संयोजन।
तो फिर विषादयोग क्यों? क्योंकि यहाँ विषाद केवल व्यक्ति को तोड़ता नहीं।
वह उसे— अपने भीतर देखने के लिए विवश करता है।
अर्जुन अब पहली बार स्वयं से पूछता है— मैं कौन हूँ?
मेरा कर्तव्य क्या है?
मेरे कर्म का परिणाम क्या होगा?
धर्म क्या है?
क्या संबंध धर्म से ऊपर हैं?
क्या शरीर की मृत्यु ही अंतिम सत्य है?
क्या युद्ध से हट जाना वास्तव में अहिंसा है?
क्या युद्ध करना वास्तव में धर्म है?
इन प्रश्नों के कारण उसका विषाद धीरे-धीरे ज्ञान की खोज का द्वार बनता है।
लेकिन क्या अर्जुन सही है?
यहाँ हमें बहुत सावधान रहना होगा।
गीता के प्रथम अध्याय को पढ़ते समय दो अतियाँ संभव हैं।
पहली अति - अर्जुन की करुणा को पूर्णतः सही मान लेना।
तब प्रश्न उठेगा—
यदि वह सही है तो कृष्ण उसे युद्ध की ओर क्यों ले जाते हैं?
दूसरी अति
अर्जुन की करुणा को केवल कायरता कह देना।
तब प्रश्न उठेगा—
यदि वह केवल कायर है तो वह कुलधर्म, पाप, सामाजिक विनाश और नैतिक परिणामों पर इतनी गंभीर चर्चा क्यों करता है?
इसलिए दोनों निष्कर्ष अधूरे हैं।
अर्जुन की समस्या में— करुणा भी है। मोह भी है। भय भी है। नैतिक विवेक भी है।
और—
कर्तव्य के विषय में भ्रम भी है।
गीता का अगला अध्याय इन्हीं तत्वों को अलग-अलग करने का प्रयास करता है।
अर्जुन का संकट आधुनिक मनुष्य के लिए भी महत्वपूर्ण क्यों है?
क्योंकि यह परिस्थिति केवल युद्धभूमि की नहीं है।
मनुष्य के जीवन में बार-बार ऐसी स्थितियाँ आती हैं जहाँ—
एक ओर व्यक्तिगत संबंध होते हैं,
दूसरी ओर कर्तव्य। एक ओर करुणा, दूसरी ओर न्याय।
एक ओर तत्काल सुख, दूसरी ओर दीर्घकालिक दायित्व।
एक ओर अहिंसा, दूसरी ओर अन्याय का प्रतिरोध।
एक ओर अपनी भावनाएँ, दूसरी ओर व्यापक व्यवस्था।
अर्जुन की समस्या इसलिए सार्वभौमिक बन जाती है।
वह युद्ध से पहले मनुष्य के निर्णय-संकट का प्रतिनिधि बन जाता है।
यहाँ महाभारत और गीता का अंतर स्पष्ट होता है
महाभारत ने अब तक हमें घटनाएँ दीं।
द्यूत हुआ। वनवास हुआ। अपमान हुआ। युद्ध की तैयारी हुई। शांति का प्रयास हुआ।
कृष्ण हस्तिनापुर गए। समझौता असफल हुआ। सेनाएँ एकत्र हुईं।
अब अर्जुन के सामने सब कुछ वास्तविक है।
लेकिन गीता यहाँ एक नया स्तर खोलती है।
महाभारत पूछता है— “क्या हुआ?”
गीता पूछती है— “ऐसी परिस्थिति में मनुष्य को क्या करना चाहिए?”
यही महाभारत और भगवद्गीता के संबंध को समझने की कुंजी है।
गीता महाभारत से बाहर की कोई अलग दार्शनिक दुनिया नहीं है।
वह महाभारत की सबसे कठिन परिस्थिति के भीतर से निकलने वाला दार्शनिक उत्तर-संवाद है।
और अब आता है निर्णायक वाक्य
प्रथम अध्याय समाप्त होता है। अर्जुन शोक से अभिभूत है।
उसका धनुष नीचे है। वह युद्ध से पीछे हटने की घोषणा कर चुका है।
अब कृष्ण बोलेंगे। लेकिन कृष्ण का पहला उत्तर युद्ध का आदेश नहीं होगा।
वे पहले अर्जुन की मानसिक स्थिति को संबोधित करेंगे।
दूसरे अध्याय के प्रारंभ में वे कहते हैं— कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
“इस विषम समय में यह मोह तुम्हें कहाँ से घेर गया?”
और फिर— क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ।
“हे पार्थ! इस दुर्बलता को मत प्राप्त हो।” यहाँ से हमारी अगली यात्रा शुरू होगी।
लेकिन ध्यान रहे— कृष्ण अभी केवल “बहादुर बनो” नहीं कह रहे।
वे अर्जुन के संकट की जड़ पर प्रहार कर रहे हैं।
हमारे शोध की अगली दिशा
अब तक हमने अर्जुन के संकट को तीन स्तरों पर देखा है—
शारीरिक स्तर — काँपना, मुख सूखना, गाण्डीव का गिरना।
मनोवैज्ञानिक स्तर — मोह, करुणा, भय, भ्रम।
नैतिक स्तर — कुलधर्म, पाप, कर्तव्य, संबंध और न्याय का संघर्ष।
अब दूसरा अध्याय इस संकट को चौथे स्तर पर ले जाएगा—
दार्शनिक स्तर। वहीं कृष्ण पूछेंगे—
तुम वास्तव में किसके लिए शोक कर रहे हो?
क्या मृत्यु वही है जो तुम्हें दिखाई दे रही है?
क्या शरीर और देही एक ही हैं?
क्या ज्ञानी जीवित या मृत किसी के लिए उसी प्रकार शोक करता है?
और यहीं से गीता में सांख्य, आत्मा, देह–देही, कर्म, बुद्धि और आगे चलकर कर्मयोग का क्रम खुलना शुरू होगा।
इसलिए अध्याय 1 को समाप्त करते हुए एक बात स्पष्ट होनी चाहिए—
गीता का पहला प्रश्न “युद्ध करो” नहीं है।
पहला प्रश्न है—
“जब मनुष्य की भावनाएँ, संबंध और कर्तव्य एक-दूसरे से टकराएँ, तब सही निर्णय का आधार क्या होगा?”
यही प्रश्न अर्जुन को कृष्ण के सामने शिष्य बनाता है।
अब हमारी कथा कहाँ पहुँची?
कुरुक्षेत्र → धृतराष्ट्र का प्रश्न → संजय की दृष्टि → दोनों सेनाओं का आमना-सामना → कृष्ण सारथी → अर्जुन का रथ दोनों सेनाओं के बीच → स्वजनों का दर्शन → शारीरिक प्रतिक्रिया → करुणा और मोह → कुलधर्म और पाप का प्रश्न → कर्तव्य बनाम संबंध → अर्जुन का युद्ध से हटना → विषादयोग → अब कृष्ण का प्रथम उत्तर और गीता का दार्शनिक प्रवेश
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