मेरी आँखों में वो सपना अगर ठहर जाता,
ग़ज़ल
मेरी आँखों में वो सपना अगर ठहर जाता,
मैं ज़रा ख़ुद को समझता तो सँवर जाता।
तेरी ख़ामोश निगाहों में था कुछ ऐसा भी,
मैं अगर पढ़ता इशारा तो उधर जाता।
उम्र भर अपने ही साये से बचा फिरता रहा,
एक दिन ख़ुद से जो मिलता तो किधर जाता।
वक़्त ने रोक लिया मुझको कई मोड़ों पर,
मैं अगर लौट के जाता तो बिखर जाता।
जिसको खोने का हमेशा ही रहा डर मुझको,
वो अगर पास में रहता तो मैं मर जाता।
शहर की भीड़ में आवाज़ बहुत थी लेकिन,
एक तेरा नाम जो सुनता तो ठहर जाता।
कुछ पुराने से ख़तों में जो महक बाक़ी थी,
मैं उन्हें खोल के पढ़ता तो निखर जाता।
अब न मंज़िल की तमन्ना है, न रस्ते का गिला,
तू अगर साथ में चलता तो सफ़र जाता।
मैंने हर दर्द को चुपचाप जिया है अब तक,
कोई पूछता जो हालात तो कह जाता।
मुकेश,,,,,,,,
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