महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २२ : प्रकृति और पुरुष — बन्धन आरम्भ कहाँ से होता है?

महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २२ : प्रकृति और पुरुष — बन्धन आरम्भ कहाँ से होता है?

आत्मज्ञान की चर्चा के बाद शान्तिपर्व का प्रश्न स्वाभाविक रूप से और कठिन हो जाता है।

यदि आत्मा साक्षी है, यदि वह स्वयं चेतन है और शरीर, मन तथा बुद्धि उससे भिन्न हैं, तो फिर मनुष्य सुख-दुःख का अनुभव क्यों करता है? कर्म का फल किसे मिलता है? जन्म-मरण का चक्र किसके लिए है? और वह कौन-सी शक्ति है जो चेतन पुरुष को संसार के अनुभवों में बाँध देती है?

याज्ञवल्क्य और जनक के संवाद में यही प्रश्न अत्यन्त गहराई से उठता है।

यहाँ शान्तिपर्व प्रकृति और पुरुष की धारणा सामने रखता है।

प्रकृति और पुरुष — दो भिन्न आधार

याज्ञवल्क्य कहते हैं कि सत्त्व, रजस् और तमस्—ये प्रकृति के गुण हैं। ये सम्पूर्ण प्रकट जगत् में विभिन्न रूपों में कार्य करते हैं। पुरुष इन गुणों के सम्पर्क में आता हुआ दिखाई देता है, लेकिन उसका अपना स्वरूप उनसे भिन्न है।

प्रकृति परिवर्तनशील है। पुरुष चेतन है। प्रकृति में गुणों की गति है। पुरुष में चेतना का प्रकाश है।

प्रकृति से शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धि की व्यवस्था बनती है; पुरुष उन्हें जानने वाला है।

शान्तिपर्व का एक अत्यन्त स्पष्ट कथन है— प्रकृतिः अचेतना राजन् पुरुषः चेतनः स्मृतः।

अर्थात् प्रकृति अचेतन मानी गई है और पुरुष चेतन।

लेकिन यही बात आगे एक और गहरे प्रश्न को जन्म देती है।

यदि दोनों भिन्न हैं, तो उनका सम्बन्ध कैसे हुआ?

जड़ प्रकृति में चेतना का अनुभव कैसे?

यहाँ शान्तिपर्व की विवेचना अत्यन्त सूक्ष्म हो जाती है।

प्रकृति अपने आप में चेतन नहीं है, लेकिन पुरुष के अधिष्ठान में उसकी गतिविधियाँ चेतन अनुभव के रूप में प्रकट होती हैं। जैसे किसी वस्तु पर प्रकाश पड़ने से वह दिखाई देने लगती है, वैसे ही चेतना के सम्पर्क में शरीर-मन की व्यवस्था अनुभव करने योग्य बनती है।

महाभारत में इसे अनेक उपमाओं से समझाया गया है।

याज्ञवल्क्य कहते हैं कि जैसे लाल फूल का प्रतिबिम्ब पारदर्शी स्फटिक में पड़ने पर स्फटिक लाल दिखाई देने लगता है, वैसे ही पुरुष जब प्रकृति के गुणों से सम्बद्ध दिखाई देता है तो उसमें गुणों का आरोप प्रतीत होता है। अपने वास्तविक स्वरूप में वह उन गुणों से परे है।

यह उपमा बहुत महत्वपूर्ण है। स्फटिक वास्तव में लाल नहीं हुआ। लेकिन लाल दिखाई देता है।

इसी प्रकार चेतना वास्तव में प्रकृति के गुणों में परिवर्तित नहीं होती, फिर भी चेतना के कारण प्रकृति की गतिविधियाँ “मैं करता हूँ”, “मैं दुखी हूँ”, “मैं प्रसन्न हूँ” जैसे अनुभवों के रूप में सामने आती हैं।

बन्धन की पहली गाँठ — तादात्म्य

यहीं से बन्धन प्रारम्भ होता है। शरीर में भूख लगी— मन कहता है, “मैं भूखा हूँ।”

शरीर को पीड़ा हुई— मन कहता है, “मैं दुखी हूँ।”

किसी ने प्रशंसा की— अहंकार कहता है, “मैं महान हूँ।”

किसी ने अपमान किया — अहंकार कहता है, “मेरा अपमान हुआ।”

धन मिला— “मैं समृद्ध हूँ।”

धन चला गया— “मैं निर्धन हो गया।”

परिवर्तन शरीर, मन, परिस्थिति और सामाजिक पहचान में हुआ; लेकिन मनुष्य ने उस परिवर्तन को अपने वास्तविक स्वरूप से जोड़ दिया।

इसी को दार्शनिक भाषा में तादात्म्य कहा जा सकता है। यहीं आत्मा और प्रकृति का भेद भूल जाता है।

गुणों की गति और मनुष्य का व्यवहार

शान्तिपर्व में प्रकृति को तीन गुणों—सत्त्व, रजस् और तमस्—से युक्त बताया गया है।

सत्त्व प्रकाश, स्पष्टता और निर्मलता की दिशा में ले जाता है।

रजस् गति, इच्छा, कर्म और आकांक्षा को सक्रिय करता है।

तमस् जड़ता, मोह, प्रमाद और अज्ञान की दिशा में ले जाता है।

मनुष्य के व्यवहार में ये तीनों विभिन्न अनुपातों में कार्य करते हैं।

इसलिए एक ही व्यक्ति कभी अत्यन्त स्पष्ट और शांत होता है, कभी अत्यधिक इच्छाओं से प्रेरित होता है और कभी आलस्य या मोह में डूब जाता है।

शान्तिपर्व का विश्लेषण यह संकेत देता है कि इन अवस्थाओं को ही आत्मा का वास्तविक स्वरूप मान लेना भूल है। गुण प्रकृति के हैं; पुरुष उनका साक्षी है।

इस दृष्टि से आत्मज्ञान का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य के भीतर सत्त्व बढ़े और बात समाप्त हो जाए।

सत्त्व स्वयं प्रकृति का गुण है। अन्तिम मुक्ति तो गुणों के पार जाने में मानी गई है।

कर्म कहाँ प्रवेश करता है?

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आता है।

यदि प्रकृति ही शरीर, मन और इन्द्रियों की गतिविधियाँ उत्पन्न करती है, तो कर्म किस प्रकार बनता है?

महाभारत के एक अन्य प्रसंग में कहा गया है कि जीवात्मा जब अविद्या, कामना और कर्म के परिणामों से शरीर के साथ सम्बद्ध होती है, तब वह जीव के रूप में अनुभव होती है। वहाँ मन को संदेह का और बुद्धि को निश्चय का आधार बताया गया है।

यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण क्रम दिखाई देता है— अविद्या → कामना → कर्म → कर्मफल → पुनः शरीर।

मनुष्य वस्तु को जैसा है वैसा नहीं देखता। उसमें अपनी कल्पना जोड़ता है।

उससे इच्छा उत्पन्न होती है। इच्छा कर्म को प्रेरित करती है।

कर्म परिणाम उत्पन्न करता है। परिणाम फिर नई इच्छाएँ पैदा करते हैं।

इस प्रकार चक्र चलता रहता है।

कर्म आत्मा को बाँधता है या जीव को?

यह प्रश्न बहुत सावधानी से समझना होगा।

यदि आत्मा को शुद्ध साक्षी माना जाए, तो कर्म उसके वास्तविक स्वरूप को बदल नहीं सकता।

लेकिन जब वही चेतना शरीर, मन, अहंकार और कर्म-संस्कारों के साथ अपनी पहचान स्थापित करती है, तब जीव का अनुभव उत्पन्न होता है।

इसलिए “आत्मा कर्म करती है” कहना और “जीव कर्म करता है” कहना दार्शनिक रूप से एक ही बात नहीं है।

महाभारत के मोक्षधर्म में इसी भेद के अनेक रूप मिलते हैं।

एक स्थान पर कहा गया है कि प्रकृति के विकार आत्मा को नहीं जानते, लेकिन आत्मा उन्हें जानती है। आत्मा के शरीर से सम्बद्ध होने पर जीव की स्थिति उत्पन्न होती है।

इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—

कर्म की गति प्रकृति और जीव के स्तर पर है; आत्मा का स्वरूप उससे परे खोजा जाता है।

सांख्य की ओर एक कदम

शान्तिपर्व के इस भाग में सांख्य की शब्दावली स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

याज्ञवल्क्य जनक को प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों की क्रमिक उत्पत्ति बताते हैं—अव्यक्त प्रकृति से महत्, महत् से अहंकार, फिर मन, सूक्ष्म तत्त्व और आगे इन्द्रियों तथा स्थूल जगत् की व्यवस्था।

इसका उद्देश्य केवल सृष्टि की सूची बनाना नहीं है।

इससे यह समझाना है कि जिसे मनुष्य “मैं” समझता है, उसमें अनेक स्तर काम कर रहे हैं।

शरीर अकेला मनुष्य नहीं। इन्द्रियाँ अकेली मनुष्य नहीं। मन अकेला मनुष्य नहीं। बुद्धि भी अकेली मनुष्य नहीं।

इन सबके पीछे उस चेतन सत्ता की खोज है जिसे क्षेत्रज्ञ या पुरुष कहा गया है।

फिर बन्धन किससे?

यहाँ शान्तिपर्व का उत्तर अत्यन्त सूक्ष्म है। प्रकृति स्वयं बन्धन नहीं है।

शरीर होना बन्धन नहीं। मन होना बन्धन नहीं। इन्द्रियाँ होना बन्धन नहीं। 

कर्म करना भी अपने आप में अन्तिम बन्धन नहीं।

बन्धन का मूल है—अज्ञानजनित तादात्म्य।

जब प्रकृति के गुणों की गति को “मैं” मान लिया जाता है, तब पुरुष अपने वास्तविक स्वरूप को भूलता हुआ प्रतीत होता है।

याज्ञवल्क्य इसे स्पष्ट करते हैं—जब पुरुष अज्ञान के कारण बार-बार गुणों से सम्बद्ध होता है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान पाता और मुक्ति से दूर रहता है।

अर्थात् बन्धन बाहर से लगाया हुआ कोई ताला नहीं है। वह पहचान की भूल से निर्मित स्थिति है।

मुक्ति का अर्थ

यदि बन्धन तादात्म्य से बना है, तो मुक्ति संसार को नष्ट करने से नहीं होगी।

मुक्ति होगी—वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में देखने से।

शरीर है—लेकिन मैं केवल शरीर नहीं।

मन है—लेकिन मैं केवल मन नहीं।

विचार हैं—लेकिन मैं प्रत्येक विचार नहीं।

इच्छाएँ हैं—लेकिन मैं प्रत्येक इच्छा का दास नहीं।

कर्म हो रहा है—लेकिन कर्म के पीछे चलने वाले अहंकार को पहचानना सम्भव है।

यही विवेक धीरे-धीरे प्रकृति और पुरुष के भेद को स्पष्ट करता है।

सांख्य की मुक्ति-दृष्टि में इसी भेद का ज्ञान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। याज्ञवल्क्य के संवाद में कहा गया है कि प्रकृति और पुरुष को भिन्न रूप से जानने वाले सांख्यज्ञ मुक्ति प्राप्त करते हैं।

लेकिन यहाँ एक दार्शनिक मतभेद भी है

शान्तिपर्व को पढ़ते समय एक महत्वपूर्ण बात भूलनी नहीं चाहिए।

महाभारत में सांख्य, योग, उपनिषद् और ब्रह्मविद्या की धाराएँ एक ही दार्शनिक भाषा में सीमित नहीं हैं।

एक स्थान पर प्रकृति एक और पुरुष अनेक कहे जाने वाले सांख्य मत का उल्लेख मिलता है; दूसरी ओर ऐसे विचार भी सामने आते हैं जिनमें पुरुष की परम एकता की ओर संकेत है।

इसलिए शान्तिपर्व को बाद के किसी एक व्यवस्थित दर्शन का सरल प्रतिरूप मानना उसके बहुवचनात्मक स्वरूप को छोटा कर देगा।

महाभारत की विशेषता यही है कि वह विचारों को समाप्त नहीं करता—उन्हें संवाद में रखता है।

आत्मा, प्रकृति और मनुष्य

अब तक की यात्रा को एक सूत्र में देखा जा सकता है—

आत्मा चेतन है।
प्रकृति परिवर्तनशील है।
गुण प्रकृति में कार्य करते हैं।
शरीर-मन उसी प्रकृति की व्यवस्था हैं।
अज्ञान से तादात्म्य उत्पन्न होता है।
तादात्म्य से कामना और कर्म की गति बनती है।
कर्म से बन्धन का अनुभव होता है।
विवेक से प्रकृति और पुरुष का भेद स्पष्ट होता है।
भेदज्ञान से मुक्ति की दिशा खुलती है।

लेकिन यहाँ भी एक प्रश्न शेष है।

यदि पुरुष वास्तव में साक्षी है और प्रकृति अपने गुणों के अनुसार कार्य करती है, तो योग का स्थान कहाँ है?

क्या केवल बौद्धिक विवेक पर्याप्त है?

क्या मनुष्य केवल यह जान लेने से मुक्त हो सकता है कि आत्मा प्रकृति से भिन्न है?

या इस ज्ञान को जीवन की प्रत्यक्ष अवस्था बनाने के लिए किसी साधना की आवश्यकता है?

शान्तिपर्व अब इसी प्रश्न की ओर बढ़ता है।

और यहाँ से सांख्य के ज्ञान और योग की साधना आमने-सामने दिखाई देने लगती है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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