सभापर्व — आख्यान : द्यूत की ओर बढ़ती सभा
सभापर्व — आख्यान : द्यूत की ओर बढ़ती सभा
द्यूत अचानक नहीं आया
राजसूय समाप्त हो चुका है। शिशुपाल मारा जा चुका है। दूर-दूर के राजा युधिष्ठिर की सार्वभौम प्रतिष्ठा स्वीकार करके लौट चुके हैं। पाण्डवों की समृद्धि अपने चरम पर है।
लेकिन इसी समय एक दूसरा दृश्य जन्म लेता है। दुर्योधन उस अद्भुत सभा में ठहरता है।
वही मायासभा, जिसे मय दानव ने बनाया था—जहाँ जल भूमि दिखाई देता है और भूमि जल जैसी प्रतीत हो सकती है; जहाँ वास्तु स्वयं दृष्टि को भ्रमित करता है।
दुर्योधन इस वैभव को देखता है। और उसके भीतर एक भावना जन्म लेती है— ईर्ष्या।
वह केवल यह नहीं देख रहा कि पाण्डव समृद्ध हैं।
वह यह देख रहा है कि—
जिस राजकीय वैभव को वह अपने पिता के राज्य और कुरुवंश का स्वाभाविक अधिकार समझता था, वह अब पाण्डवों के पास है।
महाभारत के वर्णन में दुर्योधन की पीड़ा इतनी तीव्र है कि वह अपनी मानसिक स्थिति धृतराष्ट्र के सामने जाकर बताता है। वह युधिष्ठिर की संपत्ति, राजाओं की उपस्थिति और सभा की भव्यता का वर्णन करता है।
यहीं से द्यूत की भूमिका तैयार होती है।
दुर्योधन और शकुनि का संवाद
दुर्योधन अपने मामा शकुनि से कहता है कि वह पाण्डवों की समृद्धि देखकर जल रहा है।
यहाँ शकुनि का उत्तर बहुत महत्वपूर्ण है। वह युद्ध का प्रस्ताव नहीं करता।
वह कहता है— युधिष्ठिर को युद्ध में हराना संभव नहीं।
क्यों? क्योंकि उसके पास— भीम है, अर्जुन है, नकुल-सहदेव हैं, कृष्ण हैं, द्रुपद और पांचाल हैं, और अनेक राजा उसके साथ हैं।
लेकिन युधिष्ठिर की एक कमजोरी है— द्यूत।
शकुनि स्वयं अपने कौशल का दावा करता है।
वह कहता है कि वह द्यूत में इतना कुशल है कि प्रत्येक पासे के परिणाम को समझता है और छल के द्वारा युधिष्ठिर को पराजित कर सकता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है। द्यूत का वास्तविक आविष्कार किसका है?
दुर्योधन इच्छा रखता है। शकुनि उपाय देता है।
इसलिए द्यूत की योजना को केवल “शकुनि की चाल” कहना भी अधूरा है।
शकुनि रणनीतिकार है। दुर्योधन प्रेरक है।
और आगे हमें तीसरा व्यक्ति मिलेगा— धृतराष्ट्र, जिसके बिना यह योजना राजकीय रूप नहीं ले सकती थी।
धृतराष्ट्र के सामने प्रस्ताव
दुर्योधन सीधे पिता से यह नहीं कहता कि— “मुझे पाण्डवों का राज्य चाहिए।”
वह अपनी पीड़ा का वर्णन करता है।
शकुनि फिर प्रस्ताव रखता है कि द्यूत के माध्यम से युधिष्ठिर को हराया जा सकता है।
धृतराष्ट्र इस योजना से पूरी तरह अनजान नहीं हैं।
और यहीं से सभापर्व का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न शुरू होता है—
राजा यदि अपराध स्वयं न करे, लेकिन अपराध को होने दे, तो उसकी जिम्मेदारी क्या होगी?
महाभारत इसका उत्तर धीरे-धीरे देगा।
विदुर का प्रवेश — पहली चेतावनी
धृतराष्ट्र विदुर को बुलाते हैं।
विदुर पाण्डवों को बुलाने के लिए भेजे जाते हैं।
लेकिन विदुर इस योजना से प्रसन्न नहीं हैं।
यहाँ विदुर का चरित्र फिर उसी रूप में आता है जैसा हमने पहले सभापर्व में देखा था—
वह राजपरिवार का सदस्य है, पर राजा की इच्छा का अंध समर्थक नहीं।
वह समझता है कि द्यूत केवल खेल नहीं होगा।
उसके पीछे— ईर्ष्या है, सत्ता की इच्छा है, शकुनि का कौशल है, और दोनों परिवारों के बीच पहले से मौजूद तनाव है।
इसलिए द्यूतसभा शुरू होने से पहले ही महाभारत पाठक को संकेत दे देता है— यह खेल सामान्य खेल नहीं है।
युधिष्ठिर को निमंत्रण
विदुर इन्द्रप्रस्थ पहुँचते हैं। वह युधिष्ठिर को धृतराष्ट्र का निमंत्रण बताते हैं।
युधिष्ठिर समझते हैं कि उन्हें द्यूत के लिए बुलाया जा रहा है।
यहाँ महाभारत युधिष्ठिर को एक अत्यन्त जटिल स्थिति में रखता है।
एक ओर— वह द्यूत को अच्छा नहीं मानते।
दूसरी ओर— धृतराष्ट्र ने बुलाया है।
तीसरी ओर— क्षत्रिय राजा को चुनौती स्वीकार करने की परम्परा का प्रश्न है।
युधिष्ठिर का संकट यहीं है।
वे जानते हैं कि खेल उनके लिए विनाशकारी हो सकता है, फिर भी वे जाते हैं। बाद में दूसरे द्यूत के समय वह स्वयं कहते हैं कि उन्हें पता था कि यह विनाशकारी है, फिर भी ज्येष्ठ राजा के आदेश और द्यूत की चुनौती को वे अस्वीकार नहीं कर सके।
यहाँ से युधिष्ठिर का चरित्र महाभारत के सबसे जटिल चरित्रों में से एक बन जाता है।
युधिष्ठिर की यात्रा : एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक संकेत
यहाँ हमें कथा को जल्दी पार नहीं करना चाहिए।
युधिष्ठिर द्यूत खेलने के लिए इसलिए नहीं जा रहे कि— “आज खूब जुआ खेलेंगे।”
उनके सामने धर्म, राजकीय मर्यादा और अपनी कमजोरी तीनों खड़े हैं।
लेकिन इसी में उनकी त्रासदी छिपी है। वह जानते हैं कि खतरा है। फिर भी जाते हैं।
वह जानते हैं कि शकुनि कुशल है।
फिर भी बैठते हैं।
वह जानते हैं कि द्यूत छल से खेला जा सकता है।
फिर भी खेलते हैं।
इसलिए युधिष्ठिर को केवल “जुआरी” कहना महाभारत के चरित्र को बहुत छोटा कर देता है।
और उन्हें पूर्णतः निर्दोष कहना भी उतना ही गलत होगा।
सभा में प्रवेश
पाण्डव हस्तिनापुर पहुँचते हैं। राजसभा सज चुकी है। धृतराष्ट्र उपस्थित हैं।
भीष्म हैं। द्रोण हैं। कृप हैं। विदुर हैं। कर्ण है। दुर्योधन है। शकुनि है।
अनेक राजा और कुरुवंश के प्रमुख लोग उपस्थित हैं।
और इसी सभा में वह खेल शुरू होने वाला है जो आगे चलकर—
एक परिवार को युद्ध की ओर ले जाएगा।
यहाँ सभापर्व का स्थापत्य फिर अर्थपूर्ण हो जाता है।
पहले सभा में क्या हुआ था?
राजसूय। अग्रपूजा। राजाओं का सम्मान। शिशुपाल-वध।
अब उसी सभा में क्या होने वाला है?
धन की बाजी। राज्य की बाजी। मनुष्यों की बाजी। और अंततः— स्त्री की प्रतिष्ठा की परीक्षा।
खेल कौन खेलेगा?
यहाँ भी एक महत्वपूर्ण बात। युधिष्ठिर के सामने दुर्योधन स्वयं पासे नहीं फेंकता।
शकुनि खेलता है। दुर्योधन केवल अपनी ओर से बैठा है।
इससे द्यूत का स्वरूप और स्पष्ट होता है। युधिष्ठिर बनाम दुर्योधन का प्रत्यक्ष संघर्ष नहीं है।
बल्कि— युधिष्ठिर बनाम शकुनि और उसके पीछे— पाण्डव बनाम दुर्योधन की राजनीतिक योजना।
खेल प्रारम्भ करने से पहले युधिष्ठिर की आपत्ति
युधिष्ठिर द्यूत के छलपूर्ण स्वरूप पर प्रश्न उठाते हैं।
वह द्यूत और युद्ध की तुलना करते हैं।
उनका तर्क है कि युद्ध में वीरता और प्रत्यक्ष शक्ति की परीक्षा हो सकती है, लेकिन छल से द्यूत खेलना उचित नहीं।
वह द्यूत में कपट को दोषपूर्ण बताते हैं। यह छोटा-सा संवाद बहुत महत्वपूर्ण है।
क्योंकि अब एक प्रश्न उठता है—
यदि युधिष्ठिर पहले ही जानते हैं कि छलपूर्ण द्यूत अनुचित है, तो वह फिर क्यों खेलते हैं?
यही उनकी त्रासदी है।
शकुनि का पहला मनोवैज्ञानिक प्रहार
शकुनि बार-बार युधिष्ठिर को उकसाता है— दाँव लगाइए।
युधिष्ठिर अपनी संपत्ति बताते हैं। शकुनि पासा फेंकता है।
और बार-बार घोषणा करता है— “जितम्।” — मैंने जीत लिया।
यह क्रम धीरे-धीरे चलता है।
पहले धन। फिर पशुधन। फिर संपत्ति। फिर आभूषण। फिर अन्य राजकीय वस्तुएँ।
हर बार युधिष्ठिर हारते जाते हैं।
लेकिन अभी तक इसे केवल आर्थिक नुकसान कहा जा सकता है।
अगले चरण में खेल का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा।
संपत्ति से मनुष्य तक
युधिष्ठिर के सामने अब प्रश्न है— क्या अभी कुछ बचा है?
शकुनि और दुर्योधन की रणनीति यही है कि युधिष्ठिर को उस स्थिति तक पहुँचा दिया जाए जहाँ वह धन नहीं, अपने संबंधों को दाँव पर लगाना शुरू कर दें।
और यहीं से महाभारत का अत्यन्त असाधारण वर्णन आता है।
नकुल को दाँव पर लगाने का दृश्य
शकुनि पूछता है— अब क्या दाँव पर लगाओगे?
युधिष्ठिर नकुल का नाम लेते हैं। लेकिन केवल नाम नहीं लेते।
वह नकुल का वर्णन करते हैं— उसकी सुंदरता, उसकी युवावस्था, उसकी वीरता, उसकी प्रियता। फिर भी उसे—
“धन” की तरह दाँव पर रखते हैं। शकुनि पासा फेंकता है।
और— नकुल हार जाता है। यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक परिवर्तन होता है।
अब दाँव वस्तुओं का नहीं रहा। मनुष्य वस्तु बन गया।
सहदेव
इसके बाद सहदेव।
युधिष्ठिर स्वयं स्वीकार करते हैं कि सहदेव— धर्म का ज्ञाता है, विद्वान है, प्रिय है।
फिर भी वह उसे दाँव पर लगा देते हैं। शकुनि फिर पासा फेंकता है। और सहदेव भी हार जाता है।
यहाँ महाभारत का वर्णन विशेष रूप से मार्मिक है।
युधिष्ठिर को मालूम है कि सहदेव प्रिय है।
फिर भी द्यूत का तंत्र उसे उस सीमा से आगे ले जाता है जहाँ प्रेम और निर्णय अलग हो जाते हैं।
अर्जुन
अब शकुनि कहता है— भीम और अर्जुन अभी बचे हैं।
युधिष्ठिर अर्जुन का वर्णन करते हैं— वह महान धनुर्धर है, युद्ध में अनुपम है, पाण्डवों की शक्ति का आधार है।
फिर वही वाक्य— उसे भी दाँव पर लगाया जाता है।
पासा गिरता है। अर्जुन भी हार जाता है।
यहाँ महाभारत का वर्णन केवल घटना नहीं बता रहा। वह पाठक को धीरे-धीरे यह दिखा रहा है कि—
जिस अर्जुन ने दिग्विजय में राजाओं को जीता था, वह अब एक पासे के परिणाम से “जीता हुआ” घोषित किया जा रहा है।
यह सभापर्व की विडम्बना है।
भीम
अब केवल भीम बचते हैं। युधिष्ठिर भीम का वर्णन करते हैं— अपार बल, युद्ध में अद्वितीय, गदायुद्ध में श्रेष्ठ, सेना का आधार। फिर कहते हैं— मैं भीम को दाँव पर लगाता हूँ।
शकुनि पासा फेंकता है। और— भीम भी हार जाता है।
लोकप्रिय पाठों में इस समय सभा की प्रतिक्रिया, शकुनि की विजय-घोषणा और पाण्डवों की स्थिति का अत्यन्त नाटकीय वर्णन मिलता है। यह क्रम हमें Gita Press परम्परा में भी मिलता है।
अब युधिष्ठिर अकेले हैं
यह द्यूत का शायद सबसे भयावह क्षण है।
युधिष्ठिर ने— धन खोया, पशुधन खोया, राजकीय संपत्ति खोई, नकुल खोया, सहदेव खोया, अर्जुन खोया, भीम खोया।
अब शकुनि पूछता है— “और क्या बचा है?”
युधिष्ठिर उत्तर देते हैं— “मैं।” वह स्वयं को दाँव पर लगाते हैं। पासा फेंका जाता है। और— युधिष्ठिर स्वयं भी हार जाते हैं।
यहाँ द्यूत का पहला महान नैतिक संकट
अब एक क्षण के लिए रुकना चाहिए। युधिष्ठिर स्वयं हार चुके हैं।
अर्थात् अब पाठ के अनुसार वह स्वयं विजेता के अधिकार में हैं।
और तभी शकुनि कहता है— एक चीज अभी भी बची है। द्रौपदी।
यहीं से पूरा द्यूत— राजनीतिक षड्यंत्र से धर्म-संकट में बदल जाता है।
द्रौपदी का वर्णन — एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पाठीय बिंदु
यहाँ महाभारत द्रौपदी को केवल— “पत्नी” कहकर दाँव पर नहीं रखता।
युधिष्ठिर उसका विस्तृत वर्णन करते हैं।
उसकी— देह-सौष्ठव, केश, मुख, कमल जैसी आँखें, सुगंध, सौंदर्य, मधुर वाणी, गृह-व्यवस्था, सेवा-भाव, जागने-सोने का क्रम, सभी के प्रति उसकी देखभाल, का वर्णन आता है।
यह वर्णन हमारे लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
क्योंकि युधिष्ठिर स्वयं उस स्त्री के गुणों को गिनाकर कहते हैं कि—
उसे दाँव पर लगाना अत्यन्त अनुचित/दुःखद है—फिर भी वह उसे दाँव पर लगाते हैं।
यहीं महाभारत युधिष्ठिर को सबसे कठोर नैतिक संकट में डाल देता है।
द्रौपदी को दाँव पर लगाने का क्षण
अब वह पासा फेंका जाता है। शकुनि घोषणा करता है— द्रौपदी जीत ली गयी।
और यहीं से अगला दृश्य आरम्भ होता है— दुर्योधन द्रौपदी को सभा में बुलाने का आदेश देता है।
लेकिन द्रौपदी उस समय सभा में नहीं है। वह अपने कक्ष में है।
उसे बताया जाता है— तुम द्यूत में हार गयी हो। सभा में आओ।
और यहीं से महाभारत का शायद सबसे शक्तिशाली प्रश्न जन्म लेता है।
द्रौपदी पूछती है— “पहले राजा ने स्वयं को हारा था या मुझे?”
इस पहले भाग का शोध-निष्कर्ष
यहाँ अभी हम द्रौपदी के प्रश्न और सभा-विवाद में प्रवेश नहीं करेंगे; उसे अगले खण्ड में उसी विस्तार से पढ़ेंगे।
अभी तक हमें केवल इतना स्पष्ट दिखाई देता है—
द्यूत की पहली परत
ईर्ष्या → योजना → राजकीय अनुमति → निमंत्रण → खेल → संपत्ति → मनुष्य → स्वयं राजा → पत्नी
अर्थात् द्यूत का क्रम केवल हार का क्रम नहीं है।
यह— संपत्ति के वस्तुकरण से मनुष्य के वस्तुकरण तक की यात्रा है।
और सबसे महत्वपूर्ण विडम्बना यह है कि जिस युधिष्ठिर ने राजसूय में अनेक राजाओं से अधिपत्य स्वीकार कराया था, वही युधिष्ठिर अब अपनी ही सभा में क्रमशः—
धन → राज्य → भाई → स्वयं → द्रौपदी हारते जाते हैं।
इसीलिए द्यूत को सभापर्व का केवल एक “जुआ प्रसंग” कहना उसके महाकाव्यात्मक अर्थ को बहुत छोटा कर देता है।
आगे का आख्यान
अब हम सीधे “द्रौपदी को सभा में बुलाया जाना” से आगे बढ़ेंगे—और वहाँ महाभारत का पूरा दृश्य रखेंगे:
द्रौपदी का दूत से संवाद → दूसरा दूत → दुर्योधन का आदेश → दुःशासन द्वारा द्रौपदी को घसीटकर लाना → सभा में द्रौपदी का प्रश्न → युधिष्ठिर का मौन → भीष्म का उत्तर → विकर्ण का विरोध → कर्ण का प्रत्युत्तर → दुर्योधन की प्रतिक्रिया।
यही द्यूत आख्यान का सबसे महत्वपूर्ण भाग है, और इसे हम कथा के आनंद और शोध—दोनों को साथ रखते हुए विस्तार से पढ़ेंगे।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है )
Comments
Post a Comment