महाभारत — वनपर्व — प्रयाग से हिमालय की ओर : गंगा के साथ पाण्डवों की यात्रा
महाभारत — वनपर्व — प्रयाग से हिमालय की ओर : गंगा के साथ पाण्डवों की यात्रा
प्रयाग में गंगा और यमुना के संगम पर स्नान, तप और तीर्थ-विधि पूरी करने के बाद पाण्डवों की यात्रा आगे बढ़ती है। अब कथा का भूगोल बदलने लगता है।
मैदान पीछे छूटते हैं और यात्रा धीरे-धीरे गंगा के ऊपरी प्रदेश और हिमालय की ओर बढ़ती है।
लेकिन इस यात्रा को केवल तीर्थों की सूची की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। यहाँ पहली बार हमें दिखाई देता है कि तीर्थयात्रा एक वास्तविक कठिन यात्रा भी थी।
पाण्डवों का मार्ग
अब तक के मार्ग को महाभारत के क्रम के अनुसार इस प्रकार रख सकते हैं—
काम्यक वन → पुष्कर → जम्बूमार्ग → तण्डुलिकाश्रम → अगस्त्य-सरोवर → अन्य तीर्थ → प्रयाग → गंगा–यमुना क्षेत्र → गंगा के ऊपरी प्रदेश → कनखल → हिमालय की ओर
यह आधुनिक सड़क का GPS-नक्शा नहीं है। प्राचीन स्थानों की पहचान आज के भूगोल से जोड़ते समय कुछ स्थानों पर विद्वानों में मतभेद भी हैं। इसलिए जहाँ पहचान निश्चित नहीं है, वहाँ हम उसे निश्चित तथ्य की तरह नहीं लिखेंगे।
कनखल — जहाँ गंगा तीर्थ बन जाती है
गंगा के ऊपरी क्षेत्र में पहुँचकर पाण्डव कनखल आते हैं।
कनखल को वर्तमान हरिद्वार क्षेत्र से जोड़ा जाता है।
यह स्थान आगे चलकर भारतीय तीर्थ-परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध हुआ।
महाभारत में भी कनखल का तीर्थ के रूप में उल्लेख मिलता है और गंगा से इसका संबंध स्पष्ट है।
यहाँ फिर हमारे सामने वही प्रश्न आता है— नदी तो वही है, लेकिन अलग-अलग स्थान उसके अलग-अलग धार्मिक अर्थ कैसे बन जाते हैं?
गंगा का एक नया रूप
हमने गंगा को पहले भी देखा था। भीष्म की माता के रूप में।
फिर उसे देखा— तीर्थ के रूप में।
अब हिमालय के निकट पहुँचकर गंगा का एक और रूप सामने आता है— उद्गम और तपस्या की नदी।
अर्थात् महाभारत में गंगा केवल एक पात्र नहीं है।
वह कथा के साथ-साथ भूगोल भी है और तीर्थ-स्मृति भी।
पाण्डवों की यात्रा कठिन होने लगती है
मैदानी तीर्थों की अपेक्षा हिमालय का मार्ग स्वाभाविक रूप से कठिन था।
ऊँचाई बढ़ती है। पगडंडियाँ संकरी होती हैं। नदियाँ और पर्वतीय धाराएँ रास्ता रोकती हैं।
ठंड और दुर्गमता बढ़ती है।
और महाभारत के इस भाग की एक महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि लोमश ऋषि पाण्डवों को केवल कथा नहीं सुनाते, बल्कि मार्ग की कठिनाइयों के बारे में भी सावधान करते हैं।
यह छोटा-सा विवरण हमारे लिए बहुत मूल्यवान है।
क्योंकि इससे पता चलता है कि तीर्थयात्रा की कल्पना में भौतिक भूगोल का अनुभव भी मौजूद था।
हिमालय के भीतर प्रवेश
अब पाण्डव उस प्रदेश में पहुँचते हैं जहाँ सामान्य मनुष्य के लिए पहुँचना आसान नहीं।
यहाँ अनेक स्थानों को ऋषियों की तपस्थली के रूप में बताया जाता है।
वन घने हैं। नदियाँ तीव्र हैं। पर्वत विशाल हैं।
और प्रत्येक प्राकृतिक स्थान के साथ कोई न कोई पुरानी स्मृति जुड़ी हुई है।
महाभारत जैसे कह रहा हो— भारत का इतिहास केवल नगरों में नहीं, उसकी नदियों और पर्वतों में भी सुरक्षित है।
यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण कथा आती है
हिमालय की यात्रा के दौरान पाण्डव गंगा के उद्गम और उससे संबंधित पवित्र स्थलों की ओर बढ़ते हैं।
इसी क्षेत्र में आगे चलकर उन्हें ऐसे तीर्थ मिलते हैं जिनका संबंध—
भागीरथ, गंगा-अवतरण और देव-ऋषि परंपरा से है।
यहाँ हमें एक बात स्पष्ट रखनी होगी।
गंगा के पृथ्वी पर आने की प्रसिद्ध कथा का विस्तृत रूप विभिन्न ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में मिलता है।
इसलिए हम अभी उसे पूरी तरह नहीं खोलेंगे।
क्योंकि आगे जब भागीरथ और गंगा का प्रसंग सामने आएगा, तब उसे स्वतंत्र रूप से शोधना अधिक उचित होगा।
पाण्डवों की यात्रा का एक नया उद्देश्य
अब तक तीर्थयात्रा में पाण्डव मुख्यतः— स्नान, व्रत, दान, तप और तीर्थ-दर्शन करते आए थे।
लेकिन हिमालय में पहुँचते-पहुँचते एक दूसरा उद्देश्य दिखाई देता है—
पुरानी ऋषि-स्मृतियों को सुनना।
लोमश ऋषि किसी स्थान पर पहुँचते हैं तो कहते हैं—
“यहाँ अमुक ऋषि ने तप किया था।”
“यहाँ अमुक राजा आया था।”
“यहाँ अमुक घटना घटी थी।”
इस प्रकार यात्रा स्वयं एक चलता हुआ इतिहास-पाठ बन जाती है।
तीर्थ और कथा का संबंध
यहाँ हमारी शोध-पद्धति का एक बहुत महत्वपूर्ण सूत्र सामने आता है।
किसी स्थान को पवित्र बनाने के लिए केवल प्राकृतिक विशेषता पर्याप्त नहीं थी।
उस स्थान के साथ एक कथा जुड़ती थी।
फिर कथा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाया जाता था।
फिर तीर्थयात्री वहाँ जाकर उसी कथा को पुनः स्मरण करता था।
इस प्रकार— स्थान → कथा → स्मृति → तीर्थ → पुनः यात्रा का चक्र बनता है।
यही कारण है कि महाभारत की तीर्थयात्रा में आख्यान स्वयं तीर्थ का हिस्सा बन जाते हैं।
अब एक नया पात्र-समूह सामने आता है — नाग
हिमालय और गंगा के ऊपरी क्षेत्रों की ओर बढ़ते हुए पाण्डवों की यात्रा हमें फिर नाग-परंपरा की ओर ले जाती है।
यह हमारे लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। क्योंकि महाभारत के आरम्भ में हमने— जनमेजय का नागयज्ञ देखा था। वहाँ नाग एक विशाल कथात्मक शक्ति थे।
अब तीर्थयात्रा के दौरान नागों से जुड़े पवित्र स्थलों का उल्लेख मिलता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हम तुरन्त यह निष्कर्ष निकाल लें कि “सभी नाग अलौकिक सर्प थे।”
बल्कि हमें देखना होगा कि—
नाग-परंपरा किन भौगोलिक क्षेत्रों से जुड़ी हुई है, किन जलस्रोतों और पर्वतीय क्षेत्रों से उसका संबंध है, और महाभारत ने उसे अपनी व्यापक कथा में कैसे समाहित किया है।
यह आगे एक स्वतंत्र शोध-विषय बनेगा।
पाण्डवों का अगला चरण
हिमालय की ओर यात्रा करते हुए अब वे उन क्षेत्रों में पहुँचते हैं जहाँ सामान्य तीर्थयात्री के लिए जाना कठिन है।
यहीं अर्जुन के पूर्वगमन की भूमिका तैयार होती है।
अर्जुन पहले ही दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए अलग साधना पर गया था।
अब पाण्डवों की तीर्थयात्रा उस क्षेत्र में पहुँचती है जहाँ अर्जुन की तपस्या और शिव से उसके मिलन की स्मृति से कथा जुड़ती है।
और यहीं से हमारा अगला बड़ा आख्यान शुरू होगा—
अर्जुन और किरात — शिव का वनवासी रूप
यह केवल एक चमत्कारी कथा नहीं है। इसमें—
अर्जुन का अहंकार, शिकार, धनुर्विद्या, तपस्या, शिव की परीक्षा और दिव्यास्त्र की प्राप्ति एक साथ आते हैं।
इसलिए इसे हम केवल दो-तीन पंक्तियों में नहीं छोड़ेंगे।
लेकिन पहले पाण्डवों का मार्ग पूरा करेंगे ताकि पाठक को यह स्पष्ट रहे कि कथा कहाँ से कहाँ पहुँची।
अब तक का तीर्थ-मार्ग
काम्यक वन
→ पुष्कर→ जम्बूमार्ग→ तण्डुलिकाश्रम→ अगस्त्य-सरोवर→ अनेक तीर्थ→ गया→ गंगा-यमुना क्षेत्र→ प्रयाग
→ गंगा के ऊपरी क्षेत्र→ कनखल→ हिमालयऔर अब—हिमालय → अर्जुन की तपस्या → किरात रूप में शिव → किरातार्जुनीय प्रसंगकी ओर कथा बढ़ती है।
एक शोध-सूत्र
यहाँ से हमारी तीर्थयात्रा केवल “कहाँ गए?” का प्रश्न नहीं रहेगी।
हम तीन चीजें साथ-साथ देखेंगे—
पाण्डव कहाँ गए?
वहाँ उन्होंने क्या किया?
उस स्थान की कथा महाभारत में क्यों रखी गई?
और चौथा प्रश्न हमेशा खुला रहेगा— क्या उस स्थान की धार्मिक स्मृति के पीछे कोई वास्तविक भूगोल, सामाजिक इतिहास या प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा दिखाई देती है?
इसी पद्धति से अगला भाग अर्जुन–शिव / किरातार्जुनीय प्रसंग को कथा के रूप में आगे बढ़ाएगा और फिर उसका तार्किक तथा ऐतिहासिक विवेचन करेगा।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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