महाभारत — शान्तिपर्व — भाग १९ : वैराग्य — छोड़ना वस्तुओं को नहीं, आसक्ति को
महाभारत — शान्तिपर्व — भाग १९ : वैराग्य — छोड़ना वस्तुओं को नहीं, आसक्ति को
आश्रमधर्म ने जीवन की एक यात्रा हमारे सामने रखी—शिक्षा से गृहस्थ दायित्व तक, दायित्व से निवृत्ति तक और निवृत्ति से आत्मबोध तक।
लेकिन यहाँ एक कठिन प्रश्न उठता है।
यदि मनुष्य को अंततः वैराग्य की ओर जाना है, तो वैराग्य वास्तव में है क्या?
क्या घर छोड़ देना वैराग्य है?
क्या धन छोड़ देना वैराग्य है?
क्या राजपाट छोड़ देना वैराग्य है?
क्या जंगल में चले जाना वैराग्य है?
या इन सबके रहते हुए भी मनुष्य भीतर से उनसे स्वतंत्र हो सकता है?
शान्तिपर्व का मोक्षधर्म इसी प्रश्न को बहुत गहराई से देखता है।
त्याग और वैराग्य एक नहीं
त्याग का अर्थ हो सकता है—किसी वस्तु या अधिकार को छोड़ देना।
वैराग्य उससे अधिक गहरा है।
वैराग्य का अर्थ है—वस्तु के प्रति वह मानसिक पकड़ समाप्त होना जिसके कारण वस्तु हमारे सुख-दुःख को नियंत्रित करने लगे।
किसी व्यक्ति के पास बहुत धन हो और फिर भी धन उसके मन पर शासन न करे—यह वैराग्य की दिशा हो सकती है।
दूसरा व्यक्ति निर्धन हो, लेकिन पूरे दिन धन की इच्छा में जलता रहे—तो केवल निर्धनता उसे विरक्त नहीं बना देती।
इसलिए वैराग्य का निर्णय बाहरी संपत्ति से नहीं, मन की निर्भरता से होता है।
“मेरा” की गाँठ
मनुष्य का संसार वस्तुओं से जितना नहीं बना है, उतना “मेरा” से बना है।
यह मेरा घर है।
यह मेरा परिवार है।
यह मेरा पद है।
यह मेरा धन है।
यह मेरी प्रतिष्ठा है।
यह मेरी उपलब्धि है।
यहाँ तक कि—
यह मेरा विचार है।
जब कोई व्यक्ति मेरी वस्तु को छूता है तो मुझे दुःख होता है।
जब कोई मेरी प्रशंसा करता है तो मुझे सुख होता है।
जब कोई मेरी प्रतिष्ठा को चुनौती देता है तो क्रोध उत्पन्न होता है।
इससे स्पष्ट होता है कि वस्तु अकेली बन्धन नहीं है।
उससे जुड़ा हुआ अहंकार और स्वामित्व-बोध बन्धन को मजबूत करता है।
वैराग्य संसार से घृणा नहीं
वैराग्य को संसार-विरोध समझना एक बड़ी भूल होगी।
यदि संसार बुरा है, तो मनुष्य उसके भीतर जन्म क्यों लेता है?
यदि परिवार बुरा है, तो दायित्व क्यों दिए गए हैं?
यदि धन बुरा है, तो राजधर्म में राजकोष और आर्थिक व्यवस्था की इतनी चर्चा क्यों?
महाभारत संसार को नष्ट करने की शिक्षा नहीं देता।
वह मनुष्य को संसार के साथ अपने संबंध को समझने की शिक्षा देता है।
संसार में रहो, लेकिन संसार को अपने भीतर का स्वामी मत बनने दो।
यही वैराग्य का अधिक सूक्ष्म अर्थ है।
राजा और वैराग्य
युधिष्ठिर के लिए यह शिक्षा अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
राजा को राज्य छोड़ देना समाधान नहीं।
उसे राज्य चलाना है।
उसे सेना रखनी है।
उसे राजकोष संभालना है।
उसे न्याय करना है।
उसे प्रजा की रक्षा करनी है।
फिर भी उसे यह समझना होगा कि राज्य उसकी निजी सम्पत्ति नहीं है।
वह उसका दायित्व है।
यही परिवर्तन राजधर्म को मोक्षधर्म से जोड़ देता है।
राजा यदि राज्य को अपना समझता है तो सत्ता उसके अहंकार को बढ़ाती है।
यदि राज्य को दायित्व समझता है तो वही सत्ता सेवा का साधन बन सकती है।
आसक्ति और उत्तरदायित्व
यहाँ एक सूक्ष्म अंतर है।
आसक्ति का अभाव उत्तरदायित्व का अभाव नहीं है।
यदि पिता अपने पुत्र से आसक्त न हो, इसका अर्थ यह नहीं कि वह उसकी देखभाल न करे।
यदि राजा राज्य से आसक्त न हो, इसका अर्थ यह नहीं कि वह प्रजा के प्रति उदासीन हो जाए।
यदि मनुष्य धन के प्रति विरक्त हो, इसका अर्थ यह नहीं कि वह धन का दुरुपयोग करे।
वास्तविक वैराग्य में कर्तव्य रहता है, स्वामित्व का अहंकार घटता है।
यही बात इसे पलायन से अलग करती है।
सुख और दुःख की समानता
आसक्ति की पहचान तब होती है जब बाहरी परिस्थिति बदलती है।
जिस वस्तु से अत्यधिक सुख जुड़ा है, उसके चले जाने पर अत्यधिक दुःख आता है।
जिस व्यक्ति से अहंकार जुड़ा है, उसकी आलोचना असहनीय हो जाती है।
जिस पद से पहचान जुड़ी है, पद के चले जाने पर व्यक्ति स्वयं को शून्य अनुभव कर सकता है।
वैराग्य का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य को सुख या दुःख का अनुभव ही न हो।
अर्थ यह है कि सुख और दुःख उसकी चेतना पर पूर्ण अधिकार न कर लें।
यही मानसिक स्वतंत्रता की शुरुआत है।
इन्द्रियों का प्रश्न
वैराग्य की अगली परीक्षा इन्द्रियों के स्तर पर होती है।
देखना, सुनना, स्वाद लेना, स्पर्श करना और सुगन्ध अनुभव करना—ये इन्द्रियाँ संसार से संबंध स्थापित करती हैं।
समस्या इन्द्रियों के अस्तित्व में नहीं है।
समस्या तब होती है जब मन हर अनुभव के पीछे भागने लगता है।
एक इच्छा पूरी होती है, फिर दूसरी उत्पन्न होती है।
दूसरी पूरी होती है, फिर तीसरी।
इस प्रकार मनुष्य वस्तुओं को नहीं, अपनी ही इच्छाओं को पूरा करने में जीवन लगा देता है।
वैराग्य इस दौड़ को पहचानना है।
इच्छा का स्वभाव
इच्छा स्वयं में शत्रु नहीं।
भोजन की इच्छा शरीर को जीवित रखती है।
ज्ञान की इच्छा विकास का कारण बन सकती है।
न्याय की इच्छा समाज को बदल सकती है।
लेकिन जब इच्छा की सीमा समाप्त हो जाती है और “और अधिक” ही जीवन का नियम बन जाता है, तब वही इच्छा बन्धन बनती है।
इसलिए प्रश्न इच्छा को समाप्त करने का नहीं है।
प्रश्न है—
क्या इच्छा मेरे नियंत्रण में है या मैं इच्छा के नियंत्रण में हूँ?
यहीं से वैराग्य आत्मसंयम से जुड़ता है।
वैराग्य और ज्ञान
वैराग्य केवल इच्छाओं को दबाने से उत्पन्न नहीं होता।
यदि भीतर से मन वस्तु चाहता है और बाहर से व्यक्ति स्वयं को रोकता रहता है, तो संघर्ष बना रहेगा।
स्थायी वैराग्य के लिए दृष्टि बदलनी होगी।
मनुष्य को समझना होगा कि जिन वस्तुओं को वह स्थायी सुख का स्रोत समझ रहा है, वे स्वयं परिवर्तनशील हैं।
धन आता है और जाता है।
यश आता है और जाता है।
शरीर बदलता है।
सम्बन्ध बदलते हैं।
राज्य बदलते हैं।
पीढ़ियाँ बदलती हैं।
जो बदल रहा है उसे स्थायी आधार मानने से असुरक्षा उत्पन्न होगी।
यहीं से वैराग्य का दार्शनिक आधार बनता है।
मृत्यु — वैराग्य का सबसे कठोर शिक्षक
महाभारत बार-बार मृत्यु को सामने लाता है।
क्योंकि मृत्यु मनुष्य के सभी स्वामित्व-बोध की अंतिम परीक्षा है।
जिस शरीर को मनुष्य “मैं” कहता है, वही एक दिन उसके नियंत्रण से बाहर हो जाता है।
जिस धन को वह “मेरा” कहता है, वह पीछे रह जाता है।
जिस पद पर वह गर्व करता है, वह किसी और को मिल जाता है।
जिस घर को वह स्थायी समझता है, उसमें दूसरे लोग रहने लगते हैं।
इसलिए मृत्यु का स्मरण निराशा पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि अस्थिर को स्थिर मानने की भूल से बचाने के लिए है।
क्या वैरागी संसार से भागता है?
नहीं।
वास्तविक प्रश्न यह है कि वह संसार को किस दृष्टि से देखता है।
संसार उसके लिए उपभोग की वस्तु नहीं, अनुभव और साधना का क्षेत्र बन सकता है।
वह कर्म करता है, लेकिन कर्मफल को अपनी सम्पूर्ण पहचान नहीं बनाता।
वह संबंध निभाता है, लेकिन संबंधों में स्वयं को खोता नहीं।
वह धन का उपयोग करता है, लेकिन धन को स्वयं का मूल्य नहीं मानता।
वह सम्मान स्वीकार करता है, लेकिन सम्मान के बिना अपने अस्तित्व को अधूरा नहीं मानता।
यही भीतर की स्वतंत्रता है।
युधिष्ठिर के लिए वैराग्य का अर्थ
युधिष्ठिर ने युद्ध में अपने प्रियजनों को खोया है।
यदि वे केवल शोक में डूब जाएँ तो राज्य का दायित्व पूरा नहीं होगा।
यदि वे शोक को पूरी तरह दबा दें तो भीतर की पीड़ा अनसुलझी रह जाएगी।
वैराग्य यहाँ एक तीसरा मार्ग प्रस्तुत करता है—
शोक को देखना, लेकिन उसमें डूबकर अपनी सम्पूर्ण चेतना को न खो देना।
युद्ध हुआ।
मृत्यु हुई।
हानि हुई।
अब इन घटनाओं से सीखकर जीवन को धर्म की दिशा में ले जाना है।
यही वैराग्य को निष्क्रियता से अलग करता है।
वैराग्य का अंतिम अर्थ
वैराग्य वस्तुओं के विरुद्ध युद्ध नहीं है।
वह अपने भीतर की उस पकड़ को पहचानना है जो कहती है—
“इसके बिना मैं नहीं हूँ।”
जब मनुष्य समझता है कि वस्तुएँ उपयोग की हैं, पहचान की नहीं; संबंध प्रेम के हैं, स्वामित्व के नहीं; धन साधन है, अस्तित्व नहीं; पद दायित्व है, अहंकार नहीं—तब वैराग्य जन्म लेता है।
और जब “मेरा” की पकड़ ढीली होती है, तब एक नया प्रश्न उठता है—
यदि मैं शरीर, पद, धन, परिवार और विचारों से अलग होकर भी अपने अस्तित्व को अनुभव कर सकता हूँ, तो वह “मैं” वास्तव में कौन है?
यहीं से मोक्षधर्म का अगला और अधिक गहरा चरण प्रारम्भ होता है।
अब चर्चा आत्मा पर होगी—उस आत्मा पर जिसे महाभारत कभी शरीर से भिन्न, कभी साक्षी और कभी परम सत्य की खोज के केंद्र के रूप में प्रस्तुत करता है।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
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