महाभारत - एक विचार : महाभारत के देव, नाग और चमत्कार — प्रतीक, मनोविज्ञान या वास्तविक सत्ता?

 एक विचार : महाभारत के देव, नाग और चमत्कार — प्रतीक, मनोविज्ञान या वास्तविक सत्ता?

महाभारत में देव हैं, नाग हैं, गंधर्व हैं, यक्ष हैं, राक्षस हैं, सिद्ध हैं, अप्सराएँ हैं। वे केवल सजावटी पात्र नहीं हैं। वे कथा में सक्रिय भूमिका निभाते हैं—किसी को वर मिलता है, किसी को शाप, कोई दिव्य अस्त्र प्राप्त करता है, कोई असाधारण शक्ति दिखाता है, कोई मनुष्य और देव के बीच सेतु बनता है।

आधुनिक पाठक के सामने स्वाभाविक प्रश्न आता है— 

क्या ये वास्तव में अस्तित्व रखने वाली सत्ताएँ थीं, या मनुष्य की कल्पना ने प्रकृति और मनोविज्ञान को इन रूपों में व्यक्त किया?

इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर है—हमारे पास सभी श्रेणियों के लिए एक जैसा प्रमाण नहीं है।

पहला स्तर : इन्हें केवल “काल्पनिक” कह देना उचित नहीं

आधुनिक इतिहास-पद्धति में किसी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए प्रमाण चाहिए।

पुरातत्त्व, अभिलेख, समकालीन दस्तावेज, स्वतंत्र साक्ष्य आदि से यदि किसी दावे की पुष्टि होती है तो उसका ऐतिहासिक स्तर मजबूत होता है।

देवताओं, नागों, गंधर्वों या राक्षसों के महाभारतीय रूप में अस्तित्व का ऐसा स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है जिसे आधुनिक इतिहास निर्विवाद प्रमाण मान सके।

इसलिए शोध में यह कहना उचित नहीं होगा कि— 

“महाभारत ने जिन देवों और नागों का वर्णन किया है, वे निश्चित रूप से भौतिक संसार में उसी रूप में रहते थे।”

लेकिन इसका उलटा भी उतना ही असावधान होगा—  “इसलिए वे केवल कल्पना थे।”  प्रमाण का अभाव = असत्य का प्रमाण नहीं।

यहाँ विज्ञान की सीमा और उसके दावे की सीमा दोनों समझनी होंगी।

दूसरा स्तर : प्रतीकात्मक अर्थ

यहाँ महाभारत अत्यंत समृद्ध हो जाता है। उदाहरण के लिए नाग को देखें।

सर्प मनुष्य के लिए प्राचीन काल से ही भय, विष, शक्ति, गुप्तता, पुनरुत्थान और पृथ्वीगत रहस्य का प्रतीक रहा है।

इसलिए नाग को पढ़ने का एक स्तर यह हो सकता है— 

नाग = ऐसी शक्ति जो आकर्षक भी है और भयावह भी; जीवनदायिनी भी हो सकती है और विषैली भी।

इसी तरह—

राक्षस को केवल सींग-दाँत वाला प्राणी मानने के बजाय हम उसे मनुष्य की हिंस्र, भोगप्रधान अथवा असंयमित वृत्ति के प्रतीक के रूप में पढ़ सकते हैं।

गंधर्व कला, संगीत, सौंदर्य और सूक्ष्म आकर्षण की दुनिया का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।

यक्ष प्रकृति, संपदा और रहस्यमय संरक्षण से जुड़े प्रतीक के रूप में पढ़े जा सकते हैं।

लेकिन यहाँ भी सावधानी आवश्यक है।

हमें यह नहीं कहना चाहिए— “राक्षस का अर्थ केवल क्रोध है।”

बल्कि— 

“राक्षस को क्रोध, हिंसा और असंयम की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।”

यह छोटा-सा “भी” बहुत महत्वपूर्ण है। 

तीसरा स्तर : मनोवैज्ञानिक व्याख्या

यह हमारे शोध के लिए शायद सबसे उपयोगी स्तर है।

मनुष्य अपने भीतर की शक्तियों को अक्सर बाहरी पात्रों और घटनाओं के रूप में देखता है।

महाभारत में यह संभावना अनेक जगह दिखाई देती है।

उदाहरण के लिए—

अर्जुन का मोह केवल एक व्यक्तिगत भावना नहीं रह जाता। वह युद्ध के मैदान में मनुष्य की नैतिक चेतना का संकट बन जाता है।

दुर्योधन को केवल “बुरा व्यक्ति” कहना पर्याप्त नहीं। उसके भीतर ईर्ष्या, असुरक्षा, अधिकार-बोध, प्रतिस्पर्धा और अपमान-बोध काम करते हैं।

कर्ण में पहचान, अस्वीकार, निष्ठा और आत्मसम्मान का संघर्ष दिखाई देता है। 

इसी पद्धति को हम देव–नाग–राक्षस आदि पर भी सावधानी से लागू कर सकते हैं।

लेकिन यहाँ एक खतरा है।

यदि हम हर देवता को किसी मानसिक वृत्ति का प्रतीक बना दें, तो महाभारत का अपना धार्मिक और पौराणिक संसार नष्ट हो जाएगा।

इसलिए बेहतर पद्धति होगी— 

ऐतिहासिक अस्तित्व → पौराणिक अर्थ → प्रतीकात्मक अर्थ → मनोवैज्ञानिक अर्थ इन चारों को अलग-अलग जाँचना।

लेकिन क्या वास्तव में ऐसी सत्ताएँ ब्रह्मांड में हो सकती हैं?

यह प्रश्न विज्ञान से अधिक व्यापक है।

आधुनिक विज्ञान ने ब्रह्मांड के बारे में जितना जाना है, वह अत्यंत विशाल है—लेकिन वह यह दावा नहीं करता कि अस्तित्व की हर सम्भव सत्ता का पूर्ण मानचित्र हमारे पास है।

इसलिए दो बातें अलग करनी होंगी।

वैज्ञानिक स्थिति - देव, नाग, गंधर्व आदि के अस्तित्व का प्रमाणित वैज्ञानिक साक्ष्य हमारे पास नहीं है।

दार्शनिक स्थिति - क्या हमारी वर्तमान ज्ञान-सीमा से परे किसी प्रकार की चेतन सत्ता का अस्तित्व तार्किक रूप से असम्भव है?

यह विज्ञान द्वारा सिद्ध निषेध नहीं है।

लेकिन— “विज्ञान ने सिद्ध नहीं किया” से “अवश्य अस्तित्व है” भी सिद्ध नहीं होता।

यही शोध की सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक ईमानदारी होगी।

भारतीय दर्शन यहाँ एक अलग रास्ता देता है

भारतीय परंपराओं में लोकों और विभिन्न प्रकार की सत्ताओं की कल्पना केवल महाभारत तक सीमित नहीं है।

बौद्ध, जैन और ब्राह्मणीय साहित्य—तीनों में मनुष्य से परे विभिन्न प्रकार के प्राणियों और लोकों की चर्चा मिलती है।

अर्थात् प्राचीन भारतीय मनुष्य के लिए मानव-जगत ही सम्पूर्ण अस्तित्व नहीं था।

यह दृष्टि आधुनिक भौतिकवादी दृष्टिकोण से अलग है।

लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि इन परंपराओं में वर्णित सभी लोकों और सत्ताओं को आधुनिक भौतिक विज्ञान के “physical entities” की श्रेणी में रखना उचित नहीं।

उनकी अस्तित्वमीमांसा अलग हो सकती है।

“अस्तित्व” का अर्थ क्या है?

यहीं हमारे शोध में एक बहुत गहरा दार्शनिक प्रश्न उठ सकता है।

किसी वस्तु के अस्तित्व का अर्थ केवल यह है कि— “क्या उसे हाथ से छुआ जा सकता है?”

यदि ऐसा है तो स्वप्न, विचार, स्मृति, प्रेम, भय, चेतना—इन सबके अस्तित्व की समस्या पैदा हो जाएगी।

लेकिन यदि हम अस्तित्व के स्तरों को स्वीकार करें— 

भौतिक अस्तित्व, जैविक अस्तित्व, मनोवैज्ञानिक अस्तित्व, सांस्कृतिक अस्तित्व, प्रतीकात्मक अस्तित्व

आध्यात्मिक/पारलौकिक अस्तित्व

तो प्रश्न अधिक सूक्ष्म हो जाता है। नाग का वास्तविक साँप होना एक प्रश्न है। नाग का सांस्कृतिक अस्तित्व दूसरा।

नाग का मनोवैज्ञानिक प्रभाव तीसरा। और नाग का आध्यात्मिक अर्थ चौथा। इन चारों को एक ही प्रमाण से नहीं जाँचा जा सकता।

महाभारत के लिए यह दृष्टि विशेष उपयोगी क्यों है?

क्योंकि महाभारत स्वयं संसार को केवल मानव पात्रों तक सीमित नहीं करता।

यदि हम उसके देव–नाग–गंधर्व–राक्षस आदि को काटकर निकाल दें, तो हम महाभारत की मूल कल्पना को ही छोटा कर देंगे।

लेकिन यदि हम उन्हें आधुनिक अर्थ में शाब्दिक जीववैज्ञानिक प्रजातियाँ घोषित कर दें, तो हम भी उतनी ही बड़ी गलती करेंगे।

इसलिए हमारा शोध कह सकता है: 

महाभारत का अलौकिक संसार उसके कथात्मक संसार का वास्तविक अंग है; लेकिन उसके अस्तित्व की प्रकृति का निर्धारण आधुनिक ऐतिहासिक प्रमाणों से सीधे नहीं किया जा सकता।

यह संतुलित स्थिति है।

और यहाँ “चमत्कार” को नए ढंग से पढ़ा जा सकता है

महाभारत में चमत्कार केवल पाठक को रोमांचित करने के लिए नहीं आते। 

कई बार चमत्कार कथा में किसी सीमा-भंग का संकेत बनता है।

मनुष्य और देव के बीच सीमा टूटती है।

मानव और नाग के बीच संपर्क होता है।

ऋषि और राजा के बीच असाधारण शक्ति-संबंध बनता है।

शाप भविष्य को प्रभावित करता है।

वरदान किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल देता है।

इसलिए चमत्कार को हम इस प्रश्न से भी पढ़ सकते हैं— महाभारत के संसार में मनुष्य की शक्ति की सीमा कहाँ समाप्त होती है?

यह प्रश्न केवल धर्म का नहीं, मानव-अस्तित्व का प्रश्न है।

नागयज्ञ के संदर्भ में हमारी नई परिकल्पना

अब पहले पूछे गए आपके प्रश्न पर लौटें।

यदि नाग को केवल साँप मानें—तो नागयज्ञ एक अद्भुत पौराणिक कथा है।

यदि नाग को ऐतिहासिक समुदाय का संभावित स्मृतिरूप मानें—तो यह सामाजिक-राजनीतिक स्मृति का प्रश्न बनता है।

यदि नाग को प्रतीक मानें—तो यह छिपी शक्ति और विष की कथा बनती है।

यदि नाग को मनोवैज्ञानिक रूपक मानें—तो यह मनुष्य के भीतर की प्रतिशोधात्मक और विषैली प्रवृत्तियों का रूपक बन सकती है।

और यदि योगिक परंपरा के आलोक में देखें—तो नाग-कुण्डलिनी की एक अतिरिक्त व्याख्या सम्भव हो जाती है।

एक ही कथा—कई संभावित अर्थ।

लेकिन इनमें से किसी एक को मूल और बाकी को झूठ घोषित करना उचित नहीं होगा, जब तक पाठ और स्वतंत्र प्रमाण उस निष्कर्ष को मजबूर न करें।

हमारे शोध की प्रस्तावित पद्धति

मुझे लगता है कि अब हमारे पूरे महाभारत शोध में एक विशेष “चार कसौटियों” की पद्धति रखनी चाहिए:

① पाठ क्या कहता है?

मूल संस्कृत पाठ में वास्तव में क्या है?

② परंपरा ने इसे कैसे समझा?

प्राचीन टीका, आख्यान और भारतीय व्याख्या क्या कहती है?

③ इतिहास/विज्ञान क्या प्रमाणित करता है?

किस बात के स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध हैं?

④ आधुनिक प्रतीकात्मक व्याख्या क्या खोलती है?

मनोविज्ञान, दर्शन और चेतना-अध्ययन से कौन-से नए अर्थ निकलते हैं?

और अंत में एक पाँचवीं कसौटी— 

⑤ क्या हम प्रमाण से अधिक दावा तो नहीं कर रहे?

यह पाँचवीं कसौटी हमारे शोध को सबसे अधिक बचाएगी।

मेरी राय

मेरी दृष्टि में महाभारत के देव, नाग, गंधर्व और राक्षसों को केवल मानसिक प्रवृत्तियों में बदल देना उतना ही अधूरा है जितना उन्हें बिना प्रमाण आधुनिक भौतिक प्राणी घोषित कर देना।

हमें उन्हें “अस्तित्व के प्रश्न” के रूप में पढ़ना चाहिए।

संभव है कुछ आख्यानों के पीछे वास्तविक ऐतिहासिक समुदायों की स्मृतियाँ हों।

संभव है कुछ प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण हुआ हो।

संभव है कुछ कथाएँ मनुष्य की सामूहिक मनोवैज्ञानिक संरचनाओं को व्यक्त करती हों।

संभव है उनमें आध्यात्मिक अनुभवों की स्मृति भी सुरक्षित हो।

और यह भी संभव है कि प्राचीन भारतीय “अस्तित्व” की धारणा हमारी आधुनिक “भौतिक वस्तु” की धारणा से कहीं व्यापक रही हो।

लेकिन शोधकर्ता का धर्म यह नहीं कि वह हर संभावना को सत्य घोषित कर दे।

उसका धर्म है—

जहाँ प्रमाण है वहाँ प्रमाण बोले,
जहाँ संभावना है वहाँ संभावना कही जाए,
और जहाँ रहस्य है वहाँ रहस्य को भी ईमानदारी से रहने दिया जाए।

यही शायद महाभारत को पढ़ने का सबसे परिपक्व तरीका है।

और जनमेजय का नागयज्ञ इस पद्धति का पहला उत्कृष्ट उदाहरण बन सकता है—क्योंकि उसी एक प्रसंग में इतिहास, मिथक, मनोविज्ञान, प्रतीक, धर्म और अस्तित्वमीमांसा—सभी के लिए प्रश्न उपस्थित हो जाते हैं।

मुकेश श्रीवास्तव 

आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र 

(इस ब्लॉग के लेखों  के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है )

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