महाभारत — शान्तिपर्व - भाग–१ : युद्ध के बाद धर्म की खोज
महाभारत — शान्तिपर्व - भाग–१ : युद्ध के बाद धर्म की खोज
कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका था।
अठारह अक्षौहिणी सेनाओं के संघर्ष के बाद रणभूमि शांत थी। परन्तु इस शांति के भीतर एक ऐसा प्रश्न जन्म ले चुका था जिसका उत्तर किसी अस्त्र से नहीं दिया जा सकता था।
अब राज्य कैसे चलेगा?
युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बनने वाले थे। उनके सामने सिंहासन था, लेकिन उस सिंहासन तक पहुँचने वाली राह रक्त से भरी हुई थी।
यही कारण था कि विजय के बाद भी उनके भीतर संतोष नहीं था।
उन्होंने युद्ध किया था—अपने अधिकार, अपने परिवार और धर्म की स्थापना के लिए। कृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में कर्म का बोध कराया था। परन्तु युद्ध समाप्त होने के बाद वही कर्म अपने परिणाम के रूप में युधिष्ठिर के सामने खड़ा था।
अब उन्हें केवल यह नहीं जानना था कि युद्ध में क्या करना चाहिए था।
उन्हें यह जानना था कि युद्ध के बाद क्या करना चाहिए।
यही शान्तिपर्व का आरम्भिक प्रश्न है।
युधिष्ठिर के मन में राज्य और धर्म के बीच गहरा संबंध दिखाई देने लगा। यदि राजा का व्यक्तिगत आचरण ही राज्य की दिशा निर्धारित करता है, तो राजा के लिए धर्म का ज्ञान केवल व्यक्तिगत मुक्ति का विषय नहीं रह जाता; वह सम्पूर्ण समाज के जीवन का आधार बन जाता है।
इसीलिए पाण्डव श्रीकृष्ण सहित कुरुक्षेत्र की ओर जाते हैं।
वहाँ भीष्म अभी शरशय्या पर स्थित हैं।
वे मृत्यु को स्वीकार करने की स्थिति में हैं, लेकिन उनका ज्ञान अभी जीवित है।
युधिष्ठिर उनके सामने पहुँचते हैं।
यह दृश्य महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण संक्रमणों में से एक है।
कुछ समय पहले यही दोनों पक्ष एक-दूसरे के विरुद्ध युद्ध कर रहे थे।
अब वही युधिष्ठिर उस व्यक्ति के सामने शिष्य की तरह उपस्थित हैं जिसने उनके विरुद्ध कौरव सेना का सेनापतित्व किया था।
भीष्म के पास अब न हस्तिनापुर का सिंहासन है, न सेना, न राजनीतिक शक्ति।
लेकिन उनके पास वह वस्तु है जिसकी आवश्यकता युधिष्ठिर को सबसे अधिक है— अनुभव।
और महाभारत यहाँ एक गहरी स्थापना करता है—
शस्त्र से प्राप्त विजय क्षणिक हो सकती है, परन्तु ज्ञान से प्राप्त व्यवस्था ही स्थायी हो सकती है।
युधिष्ठिर भीष्म से धर्म के विषय में प्रश्न करते हैं।
धर्म क्या है?
राजा का धर्म क्या है?
प्रजा के प्रति राजा का दायित्व क्या है?
न्याय किस आधार पर स्थापित हो?
संकट में मनुष्य किसका अनुसरण करे?
और जब अलग-अलग धर्म परस्पर टकराते दिखाई दें, तब निर्णय का आधार क्या हो?
भीष्म इन प्रश्नों का उत्तर एक ही वाक्य में नहीं देते।
उनके उत्तरों से शान्तिपर्व का विशाल विमर्श खुलता है।
सबसे पहले सामने आता है— राजधर्म।
क्योंकि युधिष्ठिर का तत्काल प्रश्न व्यक्तिगत मोक्ष नहीं, शासन है।
राजा स्वयं अकेला व्यक्ति नहीं होता। उसके निर्णय का प्रभाव असंख्य लोगों पर पड़ता है। इसलिए राजधर्म में केवल राजा की इच्छा का स्थान नहीं हो सकता।
राजा को प्रजा की रक्षा करनी है, न्याय स्थापित करना है, अपराध और अराजकता को नियंत्रित करना है, योग्य लोगों को उत्तरदायित्व देना है और राज्य की व्यवस्था को स्थिर रखना है।
लेकिन भीष्म की शिक्षा केवल सत्ता प्राप्त करने की तकनीक नहीं है।
वह बार-बार राजा के भीतर के मनुष्य की ओर लौटती है।
यदि राजा स्वयं लोभ, क्रोध, अहंकार और पक्षपात से संचालित हो, तो बाहरी व्यवस्था कितनी भी मजबूत क्यों न हो, वह अंततः असंतुलित हो जाएगी।
इस प्रकार शान्तिपर्व में राज्य की समस्या धीरे-धीरे राजा के अन्तःकरण की समस्या बन जाती है।
यहीं महाभारत का युद्धोत्तर दर्शन अपनी नई दिशा ग्रहण करता है।
कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सामने प्रश्न था— कर्म करूँ या न करूँ?
शान्तिपर्व में युधिष्ठिर के सामने प्रश्न है— कर्म करने के बाद प्राप्त सत्ता का उपयोग किस प्रकार करूँ?
यह अन्तर अत्यंत महत्वपूर्ण है। गीता ने युद्धभूमि में कर्म की आवश्यकता पर विचार किया था।
शान्तिपर्व अब उसी कर्म के सामाजिक और राजनीतिक परिणामों पर विचार करता है।
इसलिए शान्तिपर्व को केवल युद्ध के बाद की कथा मानना पर्याप्त नहीं होगा।
यह महाभारत का एक विशाल राजनीतिक, नैतिक और दार्शनिक विमर्श है।
और इस विमर्श का प्रवेश-द्वार है—एक शोकाकुल राजा और मृत्यु की प्रतीक्षा करता हुआ एक वृद्ध योद्धा।
कुरुक्षेत्र में अब कोई युद्ध नहीं है।
लेकिन प्रश्नों का एक नया युद्ध आरम्भ हो चुका है।
बाहरी युद्ध समाप्त हुआ।
अब मनुष्य के भीतर और समाज की व्यवस्था में धर्म की परीक्षा आरम्भ हुई।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
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