महाभारत — उद्योगपर्व — शांति का अंतिम प्रयास

 महाभारत — उद्योगपर्व — शांति का अंतिम प्रयास

विराटनगर में पाण्डवों की पहचान प्रकट हो चुकी है।

तेरह वर्ष की शर्त पूरी हो गई। अब उनके सामने एक सीधा प्रश्न है— क्या उन्हें उनका राज्य वापस मिलेगा?

पाण्डवों की ओर से अब तत्काल युद्ध की घोषणा नहीं होती।

पहले प्रयास होता है— संधि का। यहीं से उद्योगपर्व आरम्भ होता है।

“उद्योग” का अर्थ यहाँ केवल उद्योग या परिश्रम नहीं, बल्कि किसी बड़े कार्य के लिए किया गया प्रयास और तैयारी भी है।

और महाभारत में यह तैयारी दो दिशाओं में चलती है— युद्ध की तैयारी और शांति की तैयारी।

विराट से हस्तिनापुर तक

विराट की पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से होता है।

इस विवाह के अवसर पर पाण्डवों के अनेक सहयोगी राजा एकत्र होते हैं।

अब पाण्डव अकेले नहीं हैं। उनके पास मित्र-राज्य हैं, सेनाएँ हैं और कृष्ण का समर्थन है।

दूसरी ओर हस्तिनापुर में दुर्योधन भी युद्ध की तैयारी कर रहा है।

इस प्रकार दोनों पक्षों की शक्ति स्पष्ट होने लगती है।

लेकिन अभी एक प्रश्न खुला है— क्या युद्ध वास्तव में आवश्यक है?

संजय का दूत बनकर जाना

धृतराष्ट्र की ओर से संजय पाण्डवों के पास जाते हैं। वे शांति का संदेश लेकर आते हैं।

पाण्डवों की ओर से भी युद्ध की इच्छा को तत्काल प्राथमिकता नहीं दी जाती।

युधिष्ठिर अपने अधिकार की बात रखते हैं। यहाँ महाभारत एक महत्वपूर्ण स्थिति बनाता है—

दोनों पक्ष जानते हैं कि युद्ध भयानक होगा।

फिर भी कोई भी अपने अधिकार और प्रतिष्ठा से पीछे हटना नहीं चाहता।

कृष्ण क्यों केंद्र में आते हैं?

अब पाण्डवों की ओर से शांति-प्रयास को आगे बढ़ाने के लिए कृष्ण स्वयं हस्तिनापुर जाने का निर्णय करते हैं।

यहाँ कृष्ण की भूमिका बदलती हुई दिखाई देती है।

वे अब केवल— पाण्डवों के मित्र नहीं हैं। वे— दूत और मध्यस्थ के रूप में सामने आते हैं।

और यही भूमिका आगे भगवद्गीता के कृष्ण को समझने में भी महत्वपूर्ण होगी।

क्योंकि कुरुक्षेत्र पर उपदेश देने से पहले कृष्ण ने युद्ध रोकने का पूरा प्रयास किया था।

कृष्ण का हस्तिनापुर जाना

कृष्ण हस्तिनापुर पहुँचते हैं।

वे धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोण, विदुर और अन्य वरिष्ठों के सामने पाण्डवों की ओर से शांति का प्रस्ताव रखते हैं।

उनका तर्क सीधा है— यदि पूरा राज्य लौटाना कठिन है, तो न्यूनतम न्यायपूर्ण समाधान खोजा जाए।

पाण्डवों की माँग क्रमशः बहुत छोटी कर दी जाती है। अंततः बात यहाँ तक पहुँचती है कि वे— पाँच गाँव

तक स्वीकार करने को तैयार हैं। यहाँ कथा का नैतिक तनाव अपने चरम पर पहुँचता है।

पाँच गाँव : यह प्रसंग इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

ध्यान दीजिए—

जिस युधिष्ठिर ने राजसूय के माध्यम से सार्वभौम प्रतिष्ठा प्राप्त की थी, वह अब सम्पूर्ण साम्राज्य की माँग नहीं कर रहा।

वह युद्ध से बचने के लिए न्यूनतम राजनीतिक अधिकार स्वीकार करने को तैयार है।

इससे एक गंभीर प्रश्न निकलता है— 

क्या धर्म का अर्थ हमेशा अधिक प्राप्त करना है, या कभी न्याय की न्यूनतम सीमा पर रुक जाना भी धर्म है?

लेकिन दुर्योधन इसके लिए भी तैयार नहीं होता।

उसका प्रसिद्ध उत्तर इसी कठोरता को व्यक्त करता है— “सूच्यग्रं नैव दास्यामि विना युद्धेन केशव।”

अर्थात् युद्ध के बिना सूई की नोक जितनी भूमि भी देने को तैयार नहीं हूँ।

यहीं शांति की सम्भावना लगभग समाप्त हो जाती है।

कृष्ण का प्रयास असफल क्यों हुआ?

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है।

कृष्ण का दूत बनकर जाना केवल कथा का औपचारिक प्रसंग नहीं है।

महाभारत यह स्थापित करता है कि—

युद्ध से पहले संवाद हुआ। समझौते का प्रयास हुआ। न्यूनतम माँग रखी गई। वरिष्ठों को समझाने का प्रयास हुआ।

फिर भी युद्ध टला नहीं। इसलिए कुरुक्षेत्र को केवल “दो पक्षों की लड़ाई” कहना पर्याप्त नहीं होगा।

उसके पीछे असफल कूटनीति की एक पूरी प्रक्रिया है।

दुर्योधन की दूसरी दृष्टि

लेकिन दुर्योधन के पक्ष को भी समझना आवश्यक है।

उसकी दृष्टि में पाण्डवों को राज्य देना उसके अपने अधिकार को कमजोर करना था।

वह स्वयं को हस्तिनापुर की सत्ता का वैध उत्तराधिकारी मानता है।

इसलिए उसके लिए यह केवल पाँच गाँव का प्रश्न नहीं था।

यह प्रश्न था— सत्ता किसकी है? यही कारण है कि कृष्ण की तर्कपूर्ण अपील भी उसके निर्णय को नहीं बदलती।

सभा में कृष्ण को बाँधने का प्रयास

उद्योगपर्व का एक अत्यंत अद्भुत प्रसंग यहाँ आता है। 

दुर्योधन कृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास करता है।

कृष्ण तब अपना विराट रूप प्रकट करते हैं।

सभा में उपस्थित लोग उनके भीतर अनेक देवताओं और समस्त विश्व को देखते हैं।

यहाँ कथा फिर हमारे पुराने प्रश्न पर लौट आती है— 

क्या महाभारत में कृष्ण केवल ऐतिहासिक राजपुरुष हैं, या उन्हें ब्रह्माण्डीय चेतना के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है?

इस प्रश्न को अभी अंतिम रूप से हल नहीं करेंगे।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि उद्योगपर्व में कृष्ण की कथा-भूमिका मानवीय राजनीति से उठकर ब्रह्माण्डीय आयाम ग्रहण करती है।

और यही आगे गीता के लिए निर्णायक पृष्ठभूमि तैयार करेगा।

युद्ध की दिशा

कृष्ण का शांति-दूत के रूप में प्रयास असफल हो गया।

अब दोनों पक्ष सेना एकत्र करने लगते हैं। यहीं एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग आता है।

कृष्ण दोनों पक्षों को विकल्प देते हैं— एक ओर उनकी विशाल नारायणी सेना,

दूसरी ओर— स्वयं कृष्ण, लेकिन बिना अस्त्र उठाए।

अर्जुन कृष्ण को चुनते हैं। दुर्योधन सेना चुनता है।

यह चुनाव आगे होने वाले युद्ध के चरित्र को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कथा अब कहाँ पहुँच गई?

हमारी पूरी कथा को इस बिंदु तक देखें—

इन्द्रप्रस्थ का निर्माण मायासभा राजसूय द्यूत वनवास अज्ञातवास विराट शांति-प्रयासकृष्ण का दूतत्व पाँच गाँव का प्रस्ताव अस्वीकार युद्ध की तैयारी

अब कथा उस सीमा पर खड़ी है जहाँ से लौटना लगभग असम्भव है।

लेकिन महाभारत अभी भी एक अंतिम महत्वपूर्ण कार्य करता है— 

युद्धभूमि तक पहुँचने से पहले दोनों पक्षों की सेनाओं को एत्र करता है और प्रत्येक प्रमुख योद्धा को उसका स्थान देता है।

यहीं से हम भीष्मपर्व की ओर बढ़ेंगे। और उसके आरम्भ में आएगा वह क्षण जिसके लिए पूरी कथा अब तक धीरे-धीरे तैयार हो रही थी— कुरुक्षेत्र।

दो सेनाएँ आमने-सामने होंगी। अर्जुन अपना धनुष उठाएगा। फिर वह उन लोगों को देखेगा जिनके विरुद्ध उसे युद्ध करना है।

और उसके हाथ से गाण्डीव ढीला पड़ जाएगा। यहीं से—

भगवद्गीता का आरम्भ होगा।

— मुकेश श्रीवास्तव
भगवद्गीता शोध परियोजना

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