महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २६ : कर्मयोग — कर्म के बीच निष्काम होने की साधना
महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २६ : कर्मयोग — कर्म के बीच निष्काम होने की साधना
यदि कर्म संसार को चलाने वाली अनिवार्य प्रक्रिया है, तो मनुष्य कर्म से भागकर मुक्ति कैसे प्राप्त करेगा?
युधिष्ठिर के सामने यह प्रश्न अत्यन्त व्यावहारिक है। वह राजा है। राज्य चलाना है, प्रजा की रक्षा करनी है, न्याय करना है, निर्णय लेने हैं। उसके लिए कर्मत्याग सम्भव नहीं।
इसलिए मोक्षधर्म का अगला प्रश्न यह बनता है— क्या कर्म करते हुए भी मनुष्य भीतर से मुक्त रह सकता है?
यहीं कर्मयोग की वास्तविक समस्या आरम्भ होती है।
कर्म का त्याग और फल का त्याग
कर्मयोग का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने उत्तरदायित्व छोड़ दे।
यदि चिकित्सक कहे कि रोगी की सेवा भी कर्मबन्धन है, इसलिए वह चिकित्सा छोड़ दे; यदि राजा कहे कि शासन भी बन्धन है, इसलिए राज्य छोड़ दे; यदि गृहस्थ कहे कि परिवार की जिम्मेदारी भी आसक्ति है, इसलिए वह उससे भाग जाए—तो यह त्याग नहीं, उत्तरदायित्व से पलायन होगा।
कर्मयोग इससे भिन्न है। वह पूछता है— कर्म करते समय मनुष्य अपने भीतर क्या जोड़ रहा है?
यदि कर्म के साथ अहंकार जुड़ता है—“मैंने किया।”
यदि फल के साथ स्वामित्व जुड़ता है—“यह परिणाम मेरा होना चाहिए।”
यदि असफलता के साथ आत्मद्वेष जुड़ता है—“मैं असफल हो गया।”
तो कर्म मन को बाँधता जाता है।
लेकिन यदि कर्म कर्तव्यबुद्धि से किया जाए और परिणाम को अपने अहंकार की पहचान न बनाया जाए, तो वही कर्म साधना बन सकता है।
कर्म की शुद्धि कहाँ होती है?
कर्म की शुद्धि कर्म के बाहर नहीं, कर्म की प्रेरणा में होती है।
एक राजा युद्ध कर सकता है। एक सैनिक युद्ध कर सकता है।
एक व्यक्ति निजी क्रोध में भी हिंसा कर सकता है।
बाहर से तीनों में केवल “हिंसा” दिखाई दे सकती है, लेकिन उनके उद्देश्य और उत्तरदायित्व भिन्न हो सकते हैं।
इसलिए कर्मयोग बाहरी क्रिया को अकेले नहीं देखता। वह कर्ता के भीतर की वृत्ति को देखता है।
कर्तव्य और स्वार्थ के बीच का अन्तर कर्म को साधना या बन्धन बना सकता है।
निष्काम का सही अर्थ
“निष्काम” शब्द को अक्सर इस प्रकार समझ लिया जाता है कि मनुष्य के भीतर कोई इच्छा ही न रहे।
लेकिन जीवित मनुष्य में इच्छा का पूर्ण अभाव व्यावहारिक रूप से सम्भव नहीं।
भोजन की इच्छा होगी। आराम की आवश्यकता होगी। जीवन की रक्षा की प्रवृत्ति होगी।
परिवार के प्रति स्नेह होगा। समाज के प्रति जिम्मेदारी होगी।
निष्कामता का गहरा अर्थ यह है कि मनुष्य अपनी समस्त चेतना को कर्मफल की प्राप्ति पर निर्भर न कर दे।
फल मिले तो अहंकार न फूले। फल न मिले तो कर्तव्यबोध न टूटे।
यही कर्मयोग की कठिन साधना है।
यज्ञ की व्यापक धारणा
महाभारत की कर्म-दृष्टि में यज्ञ केवल अग्नि में आहुति डालने की वैदिक क्रिया तक सीमित नहीं रहता।
यज्ञ का व्यापक अर्थ है—अपने कर्म को केवल निजी उपभोग का साधन न बनाना।
राजा का शासन यदि केवल राजसत्ता के विस्तार के लिए है, तो वह स्वार्थ है।
यदि वही शासन प्रजा के संरक्षण के लिए है, तो वह यज्ञभाव ग्रहण कर सकता है।
विद्वान का ज्ञान यदि केवल प्रतिष्ठा के लिए है, तो वह अहंकार को बढ़ा सकता है।
यदि वही ज्ञान लोकहित में लगाया जाए, तो उसका स्वरूप बदल जाता है।
धन का उपयोग केवल संचय के लिए हो तो लोभ बन सकता है।
वही धन किसी व्यापक उत्तरदायित्व में लगे तो उसका सामाजिक अर्थ बदल जाता है।
इसलिए कर्मयोग कर्म को समाप्त नहीं करता।
वह कर्म के केन्द्र को “मैं” से “कर्तव्य” की ओर स्थानान्तरित करता है।
कर्तव्य और परिणाम
कर्मयोग की सबसे कठिन परीक्षा परिणाम के समय होती है।
जब सफलता मिलती है, तब अहंकार कहता है— “मैंने किया।”
जब असफलता मिलती है, तब निराशा कहती है— “सब व्यर्थ हो गया।”
दोनों स्थितियों में मन परिणाम के साथ बँध जाता है। कर्मयोग परिणाम की उपेक्षा नहीं करता।
राजा के लिए परिणाम महत्वपूर्ण है। किसान के लिए फसल महत्वपूर्ण है।
व्यापारी के लिए व्यापार का परिणाम महत्वपूर्ण है। विद्यार्थी के लिए परीक्षा का परिणाम महत्वपूर्ण है।
लेकिन परिणाम को कर्तव्य का एकमात्र मूल्यांकन बना देना मनुष्य को भीतर से अस्थिर कर देता है।
कर्मयोग कहता है— कर्म पूरी सजगता से करो।
परिणाम के लिए आवश्यक प्रयास करो।
लेकिन परिणाम को अपने अस्तित्व का प्रमाण मत बनाओ।
कर्मयोग और राजा
यहीं युधिष्ठिर की स्थिति फिर महत्वपूर्ण हो जाती है।
युद्ध के बाद उसके सामने राज्य है।
यदि वह अपराधबोध के कारण राज्य छोड़ देता, तो क्या वह वास्तव में धर्म का पालन करता?
भीष्म की शिक्षाओं का एक गहरा संकेत यही है कि व्यक्तिगत दुःख और सामाजिक दायित्व में संतुलन आवश्यक है।
राजा का निजी मनोभाव प्रजा के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकता।
यदि राज्य को शासन चाहिए, तो राजा को अपनी व्यक्तिगत पीड़ा के बावजूद कर्तव्य निभाना होगा।
यहाँ कर्मयोग कोई अमूर्त आध्यात्मिक सिद्धान्त नहीं रह जाता।
युधिष्ठिर स्वयं कर्मयोग की परीक्षा का पात्र बन जाता है।
कर्म में पूर्णता
कर्मयोगी का अर्थ ऐसा व्यक्ति नहीं जो परिणाम की परवाह ही न करे।
वह अपने कर्म को अधिक सावधानी से करता है, क्योंकि कर्म उसके लिए पूजा या उत्तरदायित्व का रूप ले चुका है।
लापरवाही निष्कामता नहीं।
उदासीनता निष्कामता नहीं।
असफलता को स्वीकार कर लेना मात्र निष्कामता नहीं।
कर्मयोग में कर्म के प्रति सजगता बढ़ती है, घटती नहीं।
अन्तर केवल इतना है कि कर्म का उद्देश्य निजी अहंकार की तुष्टि नहीं रहता।
समत्व की वास्तविक परीक्षा
समत्व का अर्थ यह नहीं कि सफलता और असफलता एक जैसी दिखाई दें।
उनके बाहरी परिणाम अलग होंगे।
सफलता में अवसर मिल सकता है, असफलता में हानि हो सकती है।
समत्व का अर्थ है—
बाहरी परिणाम अलग होने पर भी भीतर का विवेक नष्ट न हो।
सफलता मनुष्य को अन्धा न करे।
असफलता उसे तोड़े नहीं।
प्रशंसा निर्णय को भ्रष्ट न करे।
आलोचना सत्य को देखने की क्षमता न छीन ले।
यही अवस्था कर्मयोग को केवल धार्मिक सिद्धान्त से जीवन-पद्धति में बदल देती है।
कर्मयोग और ज्ञानयोग
अब तक सांख्य और योग की चर्चा हुई। सांख्य ने विवेक की दृष्टि दी। योग ने चित्त को साधने की प्रक्रिया दी।
कर्मयोग इन दोनों को जीवन के व्यवहार में उतारता है।
ज्ञान के बिना कर्म अन्धी सक्रियता बन सकता है। योग के बिना कर्म में स्थिरता कठिन हो सकती है।
और कर्म के बिना ज्ञान जीवन से कटकर केवल विचार बन सकता है।
इसलिए शान्तिपर्व की व्यापक दृष्टि में ज्ञान, योग और कर्म परस्पर विरोधी रास्ते नहीं दिखाई देते; वे मनुष्य के अलग-अलग स्तरों को सम्बोधित करते हैं।
त्याग की अगली अवस्था
जब कर्म करते हुए फलासक्ति धीरे-धीरे कम होती है, तब त्याग का अर्थ भी बदल जाता है।
पहले त्याग का अर्थ था—वस्तु छोड़ देना।
फिर समझ आया—वस्तु से आसक्ति छोड़ना।
अब कर्मयोग में तीसरा चरण आता है— कर्म करते हुए भी कर्तृत्व-अहंकार को ढीला करना।
यही त्याग की अधिक सूक्ष्म अवस्था है।
मनुष्य कर्म करता है, लेकिन हर कर्म को अपने अहंकार की कहानी नहीं बनाता।
वह सफलता का उपयोग करता है, लेकिन उसे अपनी स्थायी पहचान नहीं बनाता।
वह असफलता से सीखता है, लेकिन उसे अपनी सम्पूर्ण पहचान नहीं मानता।
कर्मयोग से मोक्ष की दिशा
यहाँ मोक्षधर्म का प्रश्न फिर बदलता है।
अब मुक्ति संसार से बाहर किसी स्थान की खोज नहीं रह जाती।
वह जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में चेतना की स्वतंत्रता का प्रश्न बनती है।
राजा राज्य में रहते हुए। गृहस्थ परिवार में रहते हुए। विद्वान ज्ञान के बीच। कर्मशील व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में।
यदि मनुष्य कर्म के बीच भी आसक्ति और अहंकार को पहचान सकता है, तो मोक्ष की साधना जीवन से अलग नहीं रहती।
यही कर्मयोग का सबसे बड़ा दार्शनिक योगदान है।
लेकिन एक प्रश्न अभी शेष है
यदि कर्मयोगी फल की आसक्ति छोड़ देता है, तो क्या उसे कर्मफल से पूरी तरह मुक्ति मिल जाती है?
क्या केवल फलत्याग पर्याप्त है?
यदि भीतर सूक्ष्म अहंकार बचा रहे—“मैं निष्काम कर्म कर रहा हूँ”—तो क्या वह भी एक नई आसक्ति नहीं बन सकती?
और यदि ज्ञान, योग और कर्म तीनों साधन हैं, तो इनके ऊपर वह कौन-सी अवस्था है जहाँ साधक को न कर्म बाँधता है, न ज्ञान अहंकार बनता है और न साधना स्वयं उपलब्धि का विषय रह जाती है?
शान्तिपर्व अब त्याग की और भी सूक्ष्म अवस्था—ज्ञान, कर्म और संन्यास के समन्वय की ओर बढ़ेगा।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
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