महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २५ : कर्मफल और पुनर्जन्म — कर्म की गति इतनी सूक्ष्म क्यों है?

 महाभारत — शान्तिपर्व — भाग २५ : कर्मफल और पुनर्जन्म — कर्म की गति इतनी सूक्ष्म क्यों है?

मृत्यु के बाद जीव की गति का प्रश्न तभी समझ में आता है जब कर्म की प्रकृति को समझा जाए। मनुष्य के सामने सबसे सरल धारणा यह हो सकती है कि अच्छा कर्म करो तो अच्छा फल मिलेगा और बुरा कर्म करो तो बुरा फल मिलेगा। लेकिन शान्तिपर्व कर्म को इतनी सरल गणना नहीं मानता।

कर्म की गति समय, परिस्थिति, उद्देश्य, संस्कार और पूर्वकृत कर्मों से जुड़ी हुई है।

इसीलिए महाभारत बार-बार यह सावधानी देता है कि मनुष्य किसी दूसरे के जीवन को देखकर उसके कर्मों का पूरा हिसाब नहीं लगा सकता।

कर्म केवल बाहरी क्रिया नहीं

एक ही बाहरी कार्य अलग-अलग मानसिक उद्देश्यों से किया जा सकता है।

दान दिया गया—लेकिन प्रसिद्धि के लिए।

दण्ड दिया गया—लेकिन क्रोध से।

युद्ध किया गया—लेकिन निजी प्रतिशोध के लिए।

युद्ध किया गया—लेकिन किसी बड़े दायित्व के कारण।

बाहर से दोनों कर्म समान दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उनके भीतर की प्रेरणा अलग हो सकती है।

इसलिए कर्म का मूल्यांकन केवल उसकी बाहरी आकृति से नहीं किया जा सकता।

महाभारत की कर्म-दृष्टि में भाव, उद्देश्य, कर्तव्य और परिणाम सभी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

यही कारण है कि कर्मफल का गणित मनुष्य की सामान्य दृष्टि से कहीं अधिक जटिल है।

कर्म और संस्कार

हर कर्म केवल बाहरी परिणाम उत्पन्न नहीं करता।

वह कर्ता के भीतर भी कुछ बनाता है।

क्रोध में बार-बार प्रतिक्रिया करने वाला मन धीरे-धीरे क्रोधशील बनता जाता है।

लोभ को बार-बार स्वीकार करने वाला मन अधिक लोभी होता जाता है।

दया का अभ्यास करुणा को मजबूत करता है।

सत्य का अभ्यास सत्यनिष्ठा को स्वभाव में बदल सकता है।

इस प्रकार कर्म का एक फल बाहर दिखाई देता है और दूसरा भीतर।

बाहरी फल परिस्थितियों से प्रभावित हो सकता है; लेकिन कर्म से निर्मित संस्कार व्यक्ति के भीतर एक दिशा बना सकते हैं।

यही आन्तरिक संचय आगे जीव की गति से जोड़ा जाता है।

कर्मफल तत्काल क्यों नहीं मिलता?

यदि प्रत्येक कर्म का फल तुरन्त मिल जाए, तो कर्म का सिद्धान्त समझना सरल होता।

लेकिन जीवन ऐसा दिखाई नहीं देता।

कोई अच्छा कार्य करता है और तत्काल कठिनाई में पड़ जाता है।

कोई अनुचित कार्य करता हुआ भी कुछ समय तक सफल दिखाई देता है।

यहीं से कर्मफल की दीर्घकालिक अवधारणा सामने आती है।

महाभारत के अनुसार कर्म का फल हमेशा उसी क्षण और उसी रूप में सामने आए—यह आवश्यक नहीं।

कुछ कर्मों का फल इसी जीवन में मिलता है, कुछ का बाद में और कुछ कर्मों के परिणाम इतने सूक्ष्म होते हैं कि उनका सम्बन्ध अनेक कारणों से जुड़ जाता है।

इसलिए किसी व्यक्ति के वर्तमान सुख या दुःख को देखकर यह घोषित कर देना कि “यह उसके अमुक कर्म का फल है”—महाभारत की सूक्ष्म कर्म-दृष्टि के साथ न्याय नहीं करेगा।

पुनर्जन्म — कर्म की निरन्तरता

यहीं पुनर्जन्म की धारणा आती है।

यदि कर्मों के सभी संस्कार एक ही जीवन में समाप्त नहीं होते, तो जीव की यात्रा एक शरीर तक सीमित नहीं मानी जाती।

महाभारत अनेक प्रसंगों में जीव के विभिन्न योनियों और अवस्थाओं में जाने की बात करता है। इसके पीछे मूल विचार यह है कि कर्म की प्रवृत्तियाँ अपनी परिणति की ओर बढ़ती हैं।

जन्म केवल जैविक घटना नहीं रह जाता।

वह पूर्ववर्ती कर्म-संस्कारों की निरन्तरता का एक नया चरण बन जाता है।

लेकिन इसे आधुनिक आनुवंशिकी या जैविक पुनर्जन्म के सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। पुनर्जन्म यहाँ धार्मिक-दर्शनगत प्रतिपादन है, जिसका आधार कर्म और संस्कार की निरन्तरता है।

जन्म का कारण क्या है?

शान्तिपर्व के मोक्षधर्म में जन्म के कारणों पर विचार करते हुए कामना को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है।

जहाँ इच्छा है, वहाँ प्रवृत्ति है। जहाँ प्रवृत्ति है, वहाँ कर्म है। जहाँ कर्म है, वहाँ संस्कार है।

और संस्कार जीव की अगली गति से सम्बन्धित होते हैं।

इस दृष्टि से जन्म केवल बाहरी घटना नहीं, बल्कि भीतर की अधूरी प्रवृत्तियों की निरन्तरता भी है।

यही कारण है कि मोक्ष का अर्थ केवल स्वर्ग प्राप्त करना नहीं हो सकता।

स्वर्ग भी यदि कर्मफल की एक अवस्था है और वहाँ से पुनः संसार में लौटना है, तो वह अन्तिम मुक्ति नहीं है।

मोक्ष का प्रश्न कर्मफल के भीतर किसी बेहतर स्थान को पाने का नहीं, कर्मचक्र की मूल संरचना से बाहर निकलने का है।

शुभ कर्म भी अन्तिम मुक्ति क्यों नहीं?

यह मोक्षधर्म की एक गहरी बात है।

अशुभ कर्म दुःखद परिणाम दे सकते हैं, इसलिए मनुष्य को उनसे बचना चाहिए।

लेकिन केवल शुभ कर्म करते रहना भी अन्तिम मुक्ति नहीं माना गया।

क्यों? 

क्योंकि शुभ कर्म भी यदि फल की इच्छा और कर्तृत्व-अहंकार से जुड़े हैं, तो वे कर्मचक्र को बनाए रख सकते हैं।

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि— “मैं क्या कर रहा हूँ?”

प्रश्न यह भी है— “मैं किस भाव से कर रहा हूँ?”

और उससे भी आगे— “मैं अपने कर्म को अपने अहंकार की उपलब्धि क्यों बना रहा हूँ?”

यहीं कर्मयोग की भूमि तैयार होती है।

कर्ता कौन है?

कर्मफल का सबसे कठिन प्रश्न है—कर्ता कौन?

शरीर कर्म करता दिखाई देता है। इन्द्रियाँ कार्य करती हैं। मन इच्छा करता है। बुद्धि निर्णय लेती है।

लेकिन मनुष्य कहता है— “मैंने किया।”

यह “मैं” ही कर्तृत्व का केन्द्र बन जाता है।

यदि प्रत्येक कर्म को अहंकार अपनी निजी उपलब्धि मानता है, तो सफलता से गर्व और असफलता से दुःख उत्पन्न होता है।

कर्म के साथ पहचान जितनी मजबूत होती है, कर्मफल का मानसिक प्रभाव उतना ही गहरा होता है।

इसलिए कर्म से मुक्ति का अर्थ कर्म छोड़ देना नहीं है।

कर्तृत्व की आसक्ति को समझना कर्मबन्धन को समझने की दिशा है।

नियति और पुरुषार्थ

कर्मसिद्धान्त के सामने एक और प्रश्न आता है—

यदि वर्तमान जीवन पर पूर्वकर्मों का प्रभाव है, तो मनुष्य स्वतंत्र कहाँ है?

क्या सब कुछ पहले से निर्धारित है?

महाभारत का उत्तर एक कठोर नियतिवाद नहीं है।

यदि सब कुछ पूर्वनिर्धारित होता, तो धर्म, प्रयत्न, तप, ज्ञान, योग और नीति—इन सभी शिक्षाओं का कोई अर्थ नहीं रहता।

महाभारत मनुष्य को कर्म करने वाला भी मानता है और पूर्वकृत कर्मों से प्रभावित भी।

यही द्वंद्व नियति और पुरुषार्थ के प्रश्न को जन्म देता है।

पूर्वकर्म परिस्थितियों को प्रभावित कर सकते हैं; लेकिन वर्तमान पुरुषार्थ मनुष्य की प्रतिक्रिया, निर्णय और आगे की दिशा को प्रभावित करता है।

अर्थात् मनुष्य न तो पूर्णतः परिस्थितियों का दास है और न पूर्णतः परिस्थितियों से स्वतंत्र।

वर्तमान जीवन एक ऐसी भूमि है जहाँ पूर्ववृत्ति और वर्तमान प्रयत्न दोनों कार्य करते हैं।

कर्म का रहस्य

इसीलिए महाभारत कर्म को अत्यन्त गहन विषय मानता है।

किसी कर्म का परिणाम केवल उसी कर्म से नहीं बनता।

उसमें कर्ता की वृत्ति, समय, परिस्थिति, अन्य लोगों के कर्म, सामाजिक व्यवस्था और अनेक अदृश्य कारण सम्मिलित हो सकते हैं।

इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति कर्म के विषय में जल्दबाजी से निर्णय नहीं करता।

युधिष्ठिर का अपना जीवन इसका उदाहरण है।

उसने धर्म के अनुसार चलने का प्रयत्न किया, फिर भी उसे युद्ध, वनवास, अपमान और अपने प्रियजनों की मृत्यु का सामना करना पड़ा।

दूसरी ओर अधर्म करने वाले व्यक्ति को कभी-कभी तत्काल दण्ड नहीं मिला।

यही अनुभव कर्मफल को केवल तत्काल न्याय की व्यवस्था मानने से रोकता है।

कर्मफल और नैतिक उत्तरदायित्व

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि कर्मफल की अवधारणा मनुष्य को वर्तमान उत्तरदायित्व से मुक्त कर देती है।

इसके विपरीत, यदि प्रत्येक कर्म चित्त में संस्कार बनाता है, तो प्रत्येक निर्णय महत्वपूर्ण हो जाता है।

मनुष्य यह नहीं कह सकता— “इससे क्या फर्क पड़ेगा?”

क्योंकि प्रत्येक कर्म उसके भीतर कुछ जोड़ता है।

एक झूठ केवल एक झूठ नहीं रह सकता; वह झूठ बोलने की सहजता बढ़ा सकता है।

एक क्षमा केवल एक घटना नहीं; वह प्रतिक्रिया के स्थान पर धैर्य को मजबूत कर सकती है।

एक लोभ केवल धन की इच्छा नहीं; वह दृष्टि को लगातार अभाव की ओर मोड़ सकता है।

इस प्रकार कर्मफल को केवल भविष्य के किसी अदृश्य पुरस्कार या दण्ड के रूप में देखना अधूरा है।

कर्म का पहला फल स्वयं कर्ता का बदलना है।

संसारचक्र

जब इच्छा कर्म को जन्म देती है और कर्म संस्कार को, तब संसार की निरन्तरता बनी रहती है।

इच्छा → कर्म → संस्कार → पुनः इच्छा। यही चक्र जीवन को आगे धकेलता है।

मनुष्य एक इच्छा पूरी करता है, दूसरी उत्पन्न होती है।

एक उपलब्धि मिलती है, नई उपलब्धि की आकांक्षा पैदा होती है।

एक भय समाप्त होता है, दूसरा जन्म लेता है।

इस प्रकार बाहरी परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, लेकिन भीतर की संरचना वही बनी रहती है।

महाभारत का मोक्षधर्म इसी चक्र से बाहर निकलने का प्रश्न उठाता है।

मोक्ष का द्वार कहाँ खुलता है?

यदि इच्छा संसारचक्र को चलाती है, तो केवल इच्छाओं की वस्तुएँ बदल देने से मुक्ति नहीं मिलेगी।

धन की इच्छा के स्थान पर यश की इच्छा आ सकती है।

यश की जगह स्वर्ग की इच्छा आ सकती है। स्वर्ग की जगह सिद्धि की इच्छा आ सकती है।

इसलिए मुक्ति के लिए केवल इच्छा का विषय बदलना पर्याप्त नहीं।

इच्छा के मूल स्वरूप को समझना होगा।

और यहीं ज्ञान, योग और कर्म का मार्ग एक-दूसरे से जुड़ता है।

ज्ञान बताता है कि वास्तविकता क्या है। योग मन को उस ज्ञान के योग्य बनाता है।

कर्मयोग जीवन के बीच उस दृष्टि को व्यवहार में उतारता है।

इन तीनों का समन्वय मोक्षधर्म की अगली बड़ी भूमि तैयार करता है।

शान्तिपर्व का अगला प्रश्न

अब तक युधिष्ठिर ने राज्य के धर्म से लेकर जीव की गति तक अनेक प्रश्न पूछे।

लेकिन अब प्रश्न और निर्णायक है— क्या मनुष्य संसार में कर्म करते हुए भी कर्मबन्धन से मुक्त रह सकता है?

यदि हाँ, तो ऐसा कर्म कैसा होगा? क्या त्याग का अर्थ कर्मत्याग है?

या कर्म करते हुए फलासक्ति का त्याग?

और क्या वही मनुष्य, जो राज्य चलाता है, परिवार संभालता है और समाज के बीच रहता है, भीतर से मुक्त हो सकता है?

यहीं से शान्तिपर्व कर्मयोग और निष्काम कर्म की ओर प्रवेश करता है—जहाँ मोक्ष केवल वन या एकान्त की वस्तु न रहकर जीवन के बीच साध्य बनता है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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