महाभारत — शान्तिपर्व — भाग १८ : आश्रमधर्म — प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर
महाभारत — शान्तिपर्व — भाग १८ : आश्रमधर्म — प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर
मोक्षधर्म की ओर प्रवेश करते ही एक मूल प्रश्न सामने आता है—यदि मनुष्य को अंततः आत्मज्ञान और मुक्ति की ओर जाना है, तो संसार में रहते हुए उसके जीवन का क्रम क्या हो?
महाभारत इस प्रश्न का उत्तर जीवन को चार आश्रमों की व्यवस्था में देखकर देता है—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।
लेकिन इन्हें केवल सामाजिक संस्थाएँ मानना पर्याप्त नहीं होगा। इनके भीतर मनुष्य के जीवन की एक आंतरिक गति भी दिखाई देती है।
अर्जन से उत्तरदायित्व की ओर, उत्तरदायित्व से निवृत्ति की ओर और निवृत्ति से आत्मबोध की ओर।
यह यात्रा संसार का निषेध नहीं करती; वह धीरे-धीरे मनुष्य की संसार के प्रति निर्भरता को कम करती है।
ब्रह्मचर्य — जीवन की पहली साधना
ब्रह्मचर्य का सामान्य अर्थ केवल अविवाहित रहना नहीं है।
आश्रम व्यवस्था में यह जीवन का वह चरण है जिसमें मनुष्य अपने इन्द्रियों, मन और बुद्धि को शिक्षा तथा अनुशासन के माध्यम से विकसित करता है।
ज्ञान प्राप्त करना इसका एक पक्ष है, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण है—ज्ञान ग्रहण करने योग्य बनना।
जिस मन पर इच्छाओं का निरन्तर दबाव हो, जो अनुशासन स्वीकार न कर सके और जो तत्काल सुख को ही जीवन का लक्ष्य समझे, उसके लिए गहन ज्ञान कठिन हो जाता है।
इसलिए ब्रह्मचर्य को आत्मसंयम की प्रारम्भिक भूमि माना गया।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है।
संयम का उद्देश्य जीवन को दबाना नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा को दिशा देना है।
गृहस्थ — केवल भोग नहीं, दायित्व
यदि ब्रह्मचर्य संयम की तैयारी है, तो गृहस्थाश्रम उस संयम की सामाजिक परीक्षा है।
गृहस्थ परिवार बनाता है, संतान का पालन करता है, आजीविका अर्जित करता है, अतिथियों का सत्कार करता है, समाज और अन्य आश्रमों का भी पोषण करता है।
इसलिए महाभारत की दृष्टि में गृहस्थाश्रम को केवल संसार में फँस जाना नहीं कहा जा सकता।
वास्तव में समाज की आर्थिक और सामाजिक संरचना का बड़ा भाग गृहस्थ के श्रम पर टिका हुआ है।
गृहस्थ का प्रश्न इसलिए यह नहीं कि—
“मैं कितना प्राप्त करूँ?”
बल्कि—
“मैं प्राप्त वस्तुओं का उपयोग किस उद्देश्य से करूँ?”
यहीं अर्थ और धर्म का संबंध बनता है।
धन स्वयं बन्धन नहीं है।
धन के प्रति अतृप्त आसक्ति बन्धन बन सकती है।
परिवार स्वयं बन्धन नहीं है।
परिवार को अपनी सम्पूर्ण सत्ता मान लेना बन्धन बन सकता है।
गृहस्थाश्रम संसार में रहते हुए भी भीतर से विवेक विकसित करने की प्रयोगभूमि है।
वानप्रस्थ — धीरे-धीरे पीछे हटना
जीवन का तीसरा चरण अत्यन्त सूक्ष्म है।
वानप्रस्थ का अर्थ केवल जंगल चले जाना नहीं समझना चाहिए। उसके भीतर एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य धीरे-धीरे अपने ऊपर केंद्रित जीवन से पीछे हटता है।
जब संतान बड़ी हो जाए, सामाजिक दायित्वों का बड़ा भाग पूरा हो जाए और जीवन का अनुभव पर्याप्त हो जाए, तब मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने संग्रह और अधिकार को धीरे-धीरे कम करे।
यहाँ एक गहरी मनोवैज्ञानिक बात दिखाई देती है।
मनुष्य को केवल यह सीखना नहीं चाहिए कि कैसे प्राप्त करें।
उसे यह भी सीखना चाहिए कि कब छोड़ें।
जीवन के प्रारम्भिक चरणों में उपलब्धि आवश्यक है।
लेकिन यदि मनुष्य जीवन के अंतिम चरण तक भी वही संग्रह, वही प्रतिस्पर्धा और वही अधिकार बनाए रखना चाहता है, तो निवृत्ति कभी प्रारम्भ नहीं होगी।
वानप्रस्थ इसी परिवर्तन की शिक्षा देता है।
संन्यास — बाहरी त्याग से अधिक भीतर का त्याग
चौथा आश्रम संन्यास है।
यहाँ मनुष्य अपने जीवन को बाहरी उपलब्धियों से हटाकर आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाता है।
लेकिन संन्यास का वास्तविक प्रश्न वस्त्र, स्थान या सामाजिक पहचान से आगे है।
यदि व्यक्ति जंगल में चला जाए लेकिन मन में धन, प्रतिष्ठा, परिवार, शत्रु और पुराने विवाद लगातार चलते रहें, तो बाहरी दूरी ने भीतर की दूरी उत्पन्न नहीं की।
इसलिए वास्तविक संन्यास का प्रश्न है—
मन किससे बँधा हुआ है?
वस्तु सामने हो और मन उससे स्वतंत्र रहे—यह एक प्रकार की निवृत्ति है।
वस्तु सामने न हो, फिर भी मन उसी के पीछे भागता रहे—तो बाहरी त्याग अधूरा है।
प्रवृत्ति और निवृत्ति
यहीं आश्रम व्यवस्था का दार्शनिक महत्व स्पष्ट होता है।
मनुष्य के जीवन में दो शक्तियाँ काम करती हैं—
प्रवृत्ति और निवृत्ति।
प्रवृत्ति संसार की ओर ले जाती है—परिवार, समाज, कर्म, निर्माण, ज्ञान, अर्थ और उत्तरदायित्व की ओर।
निवृत्ति मनुष्य को भीतर की ओर ले जाती है—वैराग्य, आत्मचिन्तन, संयम और मुक्ति की ओर।
इन दोनों को एक-दूसरे का शत्रु मानना आवश्यक नहीं।
प्रवृत्ति के बिना समाज नहीं चलता।
निवृत्ति के बिना मनुष्य अपने ही अर्जित संसार का कैदी बन सकता है।
इसलिए आश्रम व्यवस्था दोनों को जीवन के अलग-अलग चरणों में संतुलित करने का प्रयास करती दिखाई देती है।
क्या प्रत्येक मनुष्य को चार आश्रमों से गुजरना ही चाहिए?
यहाँ ऐतिहासिक और दार्शनिक स्तर को अलग रखना आवश्यक है।
आश्रम व्यवस्था एक आदर्श जीवन-संरचना प्रस्तुत करती है; वास्तविक समाज में प्रत्येक व्यक्ति का जीवन बिल्कुल उसी क्रम में चला हो, यह मान लेना उचित नहीं।
महाभारत स्वयं अनेक ऐसे व्यक्तियों को प्रस्तुत करता है जिनका जीवन इस आदर्श क्रम से अलग है।
इसलिए आश्रमों को केवल सामाजिक नियम की तरह पढ़ना उनके गहरे अर्थ को सीमित कर देगा।
उन्हें जीवन के चार मनोवैज्ञानिक और नैतिक चरणों के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।
मनुष्य किसी भी आयु में स्वयं से पूछ सकता है—
क्या मैं अभी सीखने की अवस्था में हूँ?
क्या मुझ पर दायित्व हैं?
क्या अब मुझे कुछ अधिकार छोड़ने चाहिए?
क्या मेरा जीवन भीतर की स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा है?
इस दृष्टि से आश्रमधर्म केवल प्राचीन समाज का विषय नहीं रह जाता।
त्याग कब शुरू होता है?
त्याग मृत्यु के निकट पहुँचने पर अचानक शुरू नहीं होता।
उसकी तैयारी बहुत पहले शुरू होनी चाहिए।
ब्रह्मचर्य में संयम उसका बीज है।
गृहस्थ में दायित्व उसका विस्तार है।
वानप्रस्थ में आसक्ति का क्रमशः क्षय है।
संन्यास में उसी प्रक्रिया की पूर्णता का आदर्श रखा जाता है।
अर्थात् मोक्ष किसी एक दिन का निर्णय नहीं।
वह जीवनभर की दिशा है।
युधिष्ठिर के लिए इसका अर्थ
युधिष्ठिर राजा हैं।
उनके सामने अभी राज्य का दायित्व है। इसलिए उन्हें तत्काल संन्यास लेने का उपदेश देना शान्तिपर्व की दृष्टि नहीं होगी।
उन्हें पहले यह समझना है कि राज्य करते हुए भी राज्य के प्रति आसक्त कैसे न हों।
यही मोक्षधर्म की शक्ति है।
मोक्ष राजधर्म का विरोध नहीं करता।
वह राजधर्म के भीतर एक ऐसी दृष्टि पैदा करता है जिसमें राजा अपने पद को स्थायी आत्म-पहचान न बना ले।
आज मैं राजा हूँ।
कल कोई दूसरा होगा।
आज मेरे पास राज्य है।
कल यह किसी और के पास होगा।
आज शरीर मेरा साथ दे रहा है।
कल यह भी नहीं रहेगा।
जो यह देख सके, उसके भीतर सत्ता का अहंकार धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।
मृत्यु की स्मृति
आश्रमधर्म के पीछे मृत्यु की स्मृति लगातार उपस्थित है।
मनुष्य जितना भी अर्जित कर ले, मृत्यु उसके संग्रह को वहीं रोक देती है।
इसलिए मृत्यु का स्मरण जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन के मूल्य को समझने का साधन हो सकता है।
यदि मृत्यु निश्चित है तो प्रश्न यह नहीं रह जाता कि—
“मैंने कितना जमा किया?”
प्रश्न बदल जाता है—
“मैंने अपने जीवन का उपयोग किसलिए किया?”
यहीं से अर्थ बदलता है।
धन साधन बनता है।
सत्ता दायित्व बनती है।
परिवार सेवा का क्षेत्र बनता है।
ज्ञान आत्मबोध की ओर ले जाने वाला माध्यम बनता है।
और जीवन स्वयं एक यात्रा बन जाता है।
आश्रमधर्म का दार्शनिक निष्कर्ष
चार आश्रमों को यदि केवल सामाजिक नियमों की सूची के रूप में पढ़ा जाए तो उनका अर्थ सीमित हो जाएगा।
उनके भीतर एक गहरी मनोवैज्ञानिक गति है—
अज्ञान से ज्ञान की ओर।
असंयम से संयम की ओर।
संग्रह से दायित्व की ओर।
दायित्व से निवृत्ति की ओर।
और अंततः अहंकार से आत्मबोध की ओर।
मोक्षधर्म की यात्रा यहीं से आगे बढ़ती है।
अब प्रश्न यह नहीं कि मनुष्य जीवन के किस आश्रम में है।
प्रश्न यह है कि—
उसके भीतर आसक्ति कितनी है?
क्योंकि कोई व्यक्ति गृहस्थ होकर भी भीतर से विरक्त हो सकता है और कोई संन्यासी होकर भी भीतर से संसार में बँधा रह सकता है।
यहीं से शान्तिपर्व हमें आश्रम की बाहरी संरचना से उठाकर वैराग्य की आंतरिक अवस्था की ओर ले जाता है।
और अगला प्रश्न होगा—
वैराग्य क्या है? क्या संसार को छोड़ देना ही वैराग्य है, या संसार के बीच रहते हुए “मैं” और “मेरा” की पकड़ को ढीला कर देना ही वास्तविक निवृत्ति है?
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
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