महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ९ : क्षमा — स्मृति को विष बनने से रोकना

महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ९ : क्षमा — स्मृति को विष बनने से रोकना

भीष्म के उपदेशों में क्षमा केवल किसी अपराधी को दण्ड न देने का नाम नहीं है। यह मनुष्य की उस क्षमता का नाम है जिसमें वह चोट को पहचानते हुए भी उसे अपने सम्पूर्ण जीवन का संचालक नहीं बनने देता।

कुरुक्षेत्र के बाद यह शिक्षा विशेष अर्थ रखती थी। लगभग प्रत्येक जीवित व्यक्ति के पास किसी न किसी के प्रति शिकायत थी। किसी ने पुत्र खोया था, किसी ने पिता, किसी ने भाई, किसी ने गुरु। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने दुःख को प्रतिशोध में बदलता, तो युद्ध समाप्त होने के बाद भी हिंसा चलती रहती।

इसलिए युद्ध के बाद समाज को केवल न्याय नहीं चाहिए था; उसे क्षमा की क्षमता भी चाहिए थी।

क्षमा अन्याय को स्वीकार करना नहीं

क्षमा का अर्थ यह नहीं कि अपराध को अपराध न माना जाए।

न्याय अपना स्थान रखता है।

जिसने अपराध किया, उसके कर्म का परिणाम हो सकता है। समाज की सुरक्षा के लिए दण्ड भी आवश्यक हो सकता है। लेकिन दण्ड देने वाले के भीतर यदि प्रतिशोध ही मुख्य प्रेरणा बन जाए, तो न्याय व्यक्तिगत क्रोध का रूप ले सकता है।

क्षमा उस अंतर को बनाए रखती है।

न्याय कर्म को देखता है; क्षमा मन को मुक्त करती है।

इसलिए क्षमा और दण्ड परस्पर विरोधी नहीं हैं।

स्मृति और प्रतिशोध

मनुष्य की स्मृति केवल घटनाओं को सुरक्षित नहीं रखती; वह उनसे जुड़ी भावनाओं को भी बार-बार सक्रिय कर सकती है।

घटना समाप्त हो जाती है, लेकिन उसका मानसिक पुनरावर्तन वर्षों तक चलता रह सकता है।

यही कारण है कि कभी-कभी व्यक्ति उस घटना से अधिक उसके स्मरण से पीड़ित रहता है।

क्षमा का अर्थ स्मृति मिटा देना नहीं है।

बल्कि यह है कि— स्मृति रहे, पर वह वर्तमान का स्वामी न बने।

महाभारत की दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि पूरा आख्यान स्मृति और प्रतिशोध की लंबी श्रृंखलाओं से बना हुआ है।

प्रतिशोध की श्रृंखला

एक व्यक्ति दूसरे को चोट पहुँचाता है। दूसरा प्रतिशोध लेता है।

पहले का परिवार इसे अपना अपमान मानता है।

फिर अगली प्रतिक्रिया जन्म लेती है।

इस प्रकार मूल घटना छोटी हो सकती है, लेकिन उससे उत्पन्न प्रतिक्रिया पीढ़ियों तक फैल सकती है।

क्षमा इस श्रृंखला में एक विराम है। यही उसकी सामाजिक शक्ति है।

क्षमा और शक्ति

क्षमा को अक्सर कमजोरी समझ लिया जाता है।

लेकिन किसी शक्तिशाली व्यक्ति के लिए क्षमा करना कई बार अधिक कठिन होता है, क्योंकि उसके पास प्रतिशोध लेने की क्षमता भी होती है।

जिसके पास दण्ड देने की शक्ति नहीं, उसका क्षमा करना और जिसके पास दण्ड देने की पूरी शक्ति है फिर भी वह विवेकपूर्वक क्षमा करता है—दोनों स्थितियाँ समान नहीं हैं।

राजा के संदर्भ में इसलिए क्षमा का अर्थ विवेकपूर्ण होना है।

हर अपराध को क्षमा कर देना शासन नहीं।

हर अपराध का कठोरतम दण्ड देना भी धर्म नहीं।

दण्ड, अपराध और परिस्थिति के अनुपात को समझना ही राजकीय विवेक है।

क्षमा और आत्मसंतुलन

क्षमा का सबसे गहरा प्रभाव दूसरे व्यक्ति पर नहीं, स्वयं पर पड़ता है।

जब मनुष्य किसी के प्रति घृणा को लगातार पकड़े रहता है, तो उसका मानसिक संसार उसी व्यक्ति के चारों ओर घूमने लगता है।

जिसे वह अपने जीवन से निकाल देना चाहता है, वही उसकी स्मृति में सबसे अधिक स्थान घेरने लगता है।

क्षमा उस मानसिक अधिकार को वापस लेने की प्रक्रिया है।

इस अर्थ में क्षमा आत्मसमर्पण नहीं— आत्मस्वामित्व की पुनःप्राप्ति है।

भीष्म की शिक्षा का व्यापक अर्थ

भीष्म स्वयं उस पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जिसने अनेक निर्णयों के परिणाम देखे। उनका जीवन सरल नैतिक उत्तरों से भरा हुआ जीवन नहीं था। इसलिए उनकी अंतिम शिक्षाओं में केवल आदर्श नहीं, अनुभव की कठोरता भी है।

युधिष्ठिर को वे जिस धर्म की ओर ले जा रहे हैं, उसमें मनुष्य को केवल नियमों का पालन करने वाला प्राणी नहीं माना गया।

वह ऐसा जीव है जिसके भीतर इच्छा, क्रोध, लोभ, अहंकार, भय, करुणा और विवेक लगातार सक्रिय रहते हैं।

धर्म इन प्रवृत्तियों को मिटाता नहीं।

वह इनके बीच मर्यादा और संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

यहीं अनुशासनपर्व की कथा एक नए स्तर पर पहुँचती है।

अब प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि व्यक्ति अपने दोषों को कैसे नियंत्रित करे।

प्रश्न है— वह समाज में अपने संबंधों को किस आधार पर व्यवस्थित करे?

यहीं से भीष्म की शिक्षा गृहस्थधर्म, स्त्री-पुरुष संबंध, परिवार और सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर बढ़ती है।

और अनुशासनपर्व का अगला महत्वपूर्ण प्रसंग इसी सामाजिक धरातल पर खुलता है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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