अब किसी से वो बहुत घुलती-मिलती नहीं,
ग़ज़ल
अब किसी से वो बहुत घुलती-मिलती नहीं,
अपने भीतर से भी शायद वो निकलती नहीं।
उसके चेहरे पे हँसी अब भी दिखाई देती है,
बस किसी बात पे पहले-सी वो खिलती नहीं।
लोग कहते हैं कि बदली है बहुत पहले से,
क्या करें, ज़ख़्म की तह आसानी से सिलती नहीं।
एक कमरे में कई शामें गुज़ार आती है,
अब किसी राह में बेवजह वो मिलती नहीं।
जिसको अपना कह के सब कुछ ही बता देती थी,
अब वो दिल की कोई परत किसी से खोलती नहीं।
उसके दरवाज़े पे दस्तक तो बहुत होती है,
वो मगर हर किसी आवाज़ पे उठती नहीं।
शायद इक उम्र लगी ख़ुद को समझने में उसे,
अब वो हर शख़्स को अपनी कहानी देती नहीं।
कोई पूछे तो बस इतना ही कहती है वो
“ठीक हूँ…” और ज़्यादा कभी कहती नहीं।
उसकी ख़ामोशियों में भी कई मौसम हैं,
बस वो मौसम किसी चेहरे पे ढलती नहीं।
मैंने देखा है उसे दूर से कुछ शामों में,
वो मुझे देख के अब भी कभी रुकती नहीं।
मुकेश
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