ग़ज़ल - हर शहर की सड़कों पर सन्नाटा नहीं, हँसी हो,
ग़ज़ल
हर शहर की सड़कों पर सन्नाटा नहीं, हँसी हो,
हर घर में लौटती हुई ख़ुशी तो अच्छी हो।
जिस आँख में ठहरा है बरसों से दर्द गहरा,
उस आँख में थोड़ी-सी रौशनी तो अच्छी हो।
दीवार बहुत ऊँची है रिश्तों के दरमियाँ अब,
दीवार से बड़ी कोई सादगी तो अच्छी हो।
नफ़रत के ये बाज़ार बहुत गर्म हैं ज़माने में,
इस दौर में थोड़ी-सी आदमी तो अच्छी हो।
बच्चों के हाथ में फिर क़लम दिखाई दे कुछ,
उनकी किताब में कोई ज़िंदगी तो अच्छी हो।
मज़हब के नाम पर जो बँटे हैं तमाम चेहरे,
उनके बीच फिर थोड़ी दोस्ती तो अच्छी हो।
हर ओर धुआँ-धुआँ है, हर ओर ख़ौफ़ का मौसम,
इस रात के बाद कोई ताज़गी तो अच्छी हो।
पत्थर लिए जो निकले थे घर से किसी के ख़िलाफ़,
उन हाथों में फूलों की बंदगी तो अच्छी हो।
हमने तो उम्र भर बस यही माँगा है जहाँ से,
इंसान में बची हुई इंसानगी तो अच्छी हो।
‘मुकेश’ अब और क्या चाहिए इस सफ़र में हमको,
दिल में किसी के लिए थोड़ी ख़ुशी तो अच्छी हो।
— मुकेश
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