महाभारत — भीष्मपर्व से द्रोणपर्व भीष्म के बाद : जब गुरु सेनापति बना

 महाभारत — भीष्मपर्व से द्रोणपर्व

भीष्म के बाद : जब गुरु सेनापति बना

गीता के बाद युद्ध आरम्भ हुआ।

दस दिनों तक भीष्म कौरव सेना के सेनापति रहे। अन्ततः शिखण्डी को सामने रखकर अर्जुन के बाणों से वे शरशय्या पर गिर पड़े। वे मरे नहीं—इच्छामृत्यु के कारण अभी जीवित थे और उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे। युद्धभूमि से उनका हटना इसलिए भी असाधारण था कि वे केवल सेनापति नहीं, पूरी कुरु-व्यवस्था के सबसे पुराने नैतिक स्तम्भ थे।

अब प्रश्न था— भीष्म के बाद कौरव सेना का नेतृत्व कौन करेगा?

यहीं से महाभारत का युद्ध एक नए चरण में प्रवेश करता है।

भीष्म के गिरने का अर्थ केवल एक योद्धा का पतन नहीं था

भीष्म के रहते कौरव पक्ष के पास एक ऐसा सेनापति था जिसकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, आयु, अनुभव और युद्ध-कौशल अद्वितीय था।

लेकिन उनके भीतर एक गहरी विडम्बना भी थी।

वे जानते थे कि पाण्डव उनके अपने हैं।

वे दुर्योधन की अनेक नीतियों से सहमत नहीं थे।

फिर भी वे हस्तिनापुर के पक्ष में युद्ध कर रहे थे।

इसलिए भीष्म का चरित्र हमारे लिए पहले से उठे हुए प्रश्न को और गहरा करता है— क्या किसी व्यवस्था के प्रति निष्ठा स्वयं धर्म है?

भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञाओं का पालन किया।

लेकिन उन्हीं प्रतिज्ञाओं और राजनिष्ठा ने उन्हें ऐसी परिस्थिति में पहुँचा दिया जहाँ उन्हें उन लोगों के विरुद्ध युद्ध करना पड़ा जिन्हें वे स्वयं प्रेम करते थे।

यही महाभारत की नैतिक जटिलता है। यहाँ— धर्म और अधर्म दो स्पष्ट सेनाओं में विभाजित नहीं हैं।

कभी-कभी एक ही व्यक्ति के भीतर अनेक धर्म-संकट एक साथ उपस्थित होते हैं।

कर्ण फिर युद्धभूमि में आता है

भीष्म के रहते कर्ण ने युद्ध से स्वयं को अलग रखा था।

अब भीष्म के पतन के बाद उसके लिए युद्ध का मार्ग खुल गया।

कर्ण दुर्योधन के पास आता है और युद्ध जारी रखने का आश्वासन देता है।

लेकिन सेनापति कौन बने?

यहीं कर्ण की एक महत्वपूर्ण भूमिका सामने आती है।

वह स्वयं सेनापति बनने की अपेक्षा द्रोणाचार्य का नाम आगे करता है।

और यह चयन अत्यंत अर्थपूर्ण है। क्यों? क्योंकि द्रोण केवल महान योद्धा नहीं थे।

वे— पाण्डवों और कौरवों दोनों के गुरु थे।

अर्थात् अब युद्ध का सेनापति कोई बाहरी शत्रु नहीं बल्कि— दोनों पक्षों को युद्धकला सिखाने वाला गुरु है।

द्रोणाचार्य सेनापति बनते हैं

दुर्योधन द्रोणाचार्य से सेनापतित्व स्वीकार करने का अनुरोध करता है।

द्रोण स्वीकार करते हैं। यहीं से द्रोणपर्व आरम्भ होता है।

महाभारत की कथा में द्रोण का सेनापति बनना केवल सैन्य परिवर्तन नहीं है।

यह युद्ध के नैतिक स्वरूप में भी परिवर्तन है।

भीष्म की युद्ध-दृष्टि में अभी भी एक प्रकार की मर्यादा और आत्मसंयम दिखाई देता था।

द्रोण के नेतृत्व में युद्ध धीरे-धीरे अधिक रणनीतिक और अधिक कठोर होता जाता है।

द्रोण का पहला प्रमुख लक्ष्य भी बहुत महत्वपूर्ण है— युधिष्ठिर को जीवित पकड़ना।

द्रोण दुर्योधन को आश्वासन देते हैं कि यदि अर्जुन युधिष्ठिर की रक्षा से अलग हो जाए, तो वे युधिष्ठिर को बंदी बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

यहाँ एक नई युद्ध-दृष्टि सामने आती है। अब लक्ष्य केवल— शत्रु को मारना नहीं है।

लक्ष्य है— उसके नैतिक और राजनीतिक केंद्र को पकड़ लेना।

युधिष्ठिर ही क्यों?

यह प्रश्न हमारे शोध के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। दुर्योधन युधिष्ठिर को मारना नहीं चाहता।

वह उसे जीवित पकड़ना चाहता है।

क्यों? क्योंकि युधिष्ठिर पाण्डव सत्ता का नैतिक और राजनीतिक केंद्र हैं।

उनके जीवित रहते पाण्डवों की व्यवस्था एक संगठित राजकीय शक्ति बनी रहती है।

यदि उन्हें बंदी बनाया जाए तो दुर्योधन को लगता है कि पाण्डवों को फिर से द्यूत और निर्वासन की दिशा में धकेला जा सकता है। महाभारत के द्रोणपर्व के आरम्भिक प्रसंगों में यही उद्देश्य सामने आता है।

यहाँ महाभारत स्वयं अपनी पुरानी कथा को फिर सामने लाता है— द्यूत।

अर्थात् युद्ध के बीच भी दुर्योधन की राजनीतिक कल्पना पुराने द्यूत-प्रसंग से बाहर नहीं निकलती।

युद्ध बदल गया है। लेकिन मानसिकता वही है।

द्रोण की सबसे बड़ी कठिनाई — अर्जुन

द्रोण जानते हैं कि युधिष्ठिर तक पहुँचना सरल नहीं है।

क्योंकि जब तक अर्जुन उनके पास है, युधिष्ठिर को पकड़ना अत्यंत कठिन है।

इसलिए युद्ध अब केवल— द्रोण बनाम युधिष्ठिर नहीं रह जाता।

उसका वास्तविक समीकरण बन जाता है— 

द्रोण को युधिष्ठिर तक पहुँचना है → अर्जुन को हटाना होगा।

और यहीं से एक नई रणनीति जन्म लेती है।

संशप्तक

अर्जुन को मुख्य युद्धक्षेत्र से दूर ले जाने के लिए संशप्तक योद्धाओं का प्रयोग किया जाता है।

वे अर्जुन को ऐसी चुनौती देते हैं जिसे एक क्षत्रिय के लिए अस्वीकार करना कठिन है।

अर्जुन उनके साथ युद्ध करने चला जाता है।

अब मुख्य युद्धभूमि में— युधिष्ठिर अपेक्षाकृत अधिक असुरक्षित हैं।

यही वह परिस्थिति है जिसका द्रोण लाभ उठाना चाहते हैं।

इस घटना से महाभारत में युद्ध का एक नया आयाम दिखाई देता है— 

सिर्फ शक्ति पर्याप्त नहीं है; युद्ध में सूचना, रणनीति और व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति भी हथियार बन जाती है।

यहाँ अर्जुन की एक दूसरी परीक्षा शुरू होती है

गीता में अर्जुन का संकट था— “क्या मुझे अपने लोगों के विरुद्ध युद्ध करना चाहिए?”

अब उसका संकट अलग है। अब वह युद्ध से भाग नहीं रहा।

वह युद्ध कर रहा है। लेकिन उसे यह निर्णय लेना है कि— किस मोर्चे पर लड़ना अधिक आवश्यक है?

युद्ध की यही जटिलता है।

गीता ने अर्जुन को कर्म से विमुखता से बाहर निकाला।

लेकिन अब महाभारत उसे कर्म की जटिलता के भीतर ले जा रहा है।

यहाँ हमें एक महत्वपूर्ण सावधानी रखनी चाहिए—

इसे अभी गीता का “अगला अध्याय” नहीं कहना चाहिए।

यह महाभारत की कथा है। बाद में हम देखेंगे कि इन घटनाओं को गीता के प्रकाश में पढ़ने पर क्या नया दिखाई देता है।

द्रोण : गुरु और योद्धा

द्रोण का चरित्र अब हमारे शोध में विशेष महत्व प्राप्त करता है।

वे उन सभी के गुरु हैं जिनसे वे युद्ध कर रहे हैं। अर्जुन उनका प्रिय शिष्य रहा है।

युधिष्ठिर भी उनके शिष्य हैं। भीम, नकुल, सहदेव भी उन्हीं की युद्धपरंपरा का हिस्सा हैं।

कौरव भी उनके शिष्य हैं। और अब वही गुरु— अपने शिष्यों के विरुद्ध सेनापति है।

यहाँ महाभारत एक अत्यंत कठिन प्रश्न पूछता हुआ दिखाई देता है— 

क्या भूमिका बदलने से संबंध का नैतिक अर्थ बदल जाता है?

गुरु जब राजकीय सेवा स्वीकार करता है तो क्या वह केवल गुरु रहता है?

या वह राजा की सेना का अधिकारी भी बन जाता है?

यदि उसका शिष्य दूसरी ओर हो तो उसका धर्म क्या है?

द्रोण का चरित्र इस प्रश्न का सरल उत्तर नहीं देता।

भीष्म और द्रोण में एक सूक्ष्म अंतर

भीष्म की समस्या थी— प्रतिज्ञा और राजनिष्ठा।

द्रोण की समस्या अधिक जटिल है— ऋण, आश्रय, राजसेवा, गुरुता और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा।

द्रोण का जीवन हमें पहले से ज्ञात है।

उनका द्रुपद से संघर्ष, निर्धनता, हस्तिनापुर में आश्रय, राजकुमारों को शिक्षा देना और अंततः कुरु-राज्य की सैन्य व्यवस्था का हिस्सा बन जाना—इन सबने उनके चरित्र को निर्मित किया है।

इसलिए जब वे कौरव सेना के सेनापति बनते हैं, तो इसे केवल— “द्रोण ने अधर्म का साथ दिया”

कह देना पर्याप्त नहीं। हमें पूछना होगा— मनुष्य अपने पुराने ऋणों और संबंधों से कितना बँधा होता है?

और— 

क्या कर्तव्य का बोध कभी व्यक्ति को ऐसे कर्म में ले जा सकता है जिसे उसका अंतर्मन पूरी तरह स्वीकार नहीं करता?

यही महाभारत की नैतिक भूमि है।

युद्ध अब और कठोर होने वाला है

द्रोणपर्व में घटनाएँ तेजी से बदलती हैं।

युद्ध के अगले चरण में— 

संशप्तकों द्वारा अर्जुन को अलग करने की रणनीति, युधिष्ठिर को पकड़ने के प्रयास, चक्रव्यूह, अभिमन्यु का प्रवेश, अभिमन्यु की मृत्यु, अर्जुन की प्रतिज्ञा, जयद्रथ-वध, घटोत्कच का युद्ध, कर्ण द्वारा इन्द्रप्रदत्त शक्ति का प्रयोग, द्रोण का अंतिम संघर्ष

जैसी घटनाएँ आती हैं। द्रोणपर्व युद्ध को एक अधिक उग्र और त्रासद स्तर पर ले जाता है।

लेकिन इन सबको एक साथ लिख देना हमारे शोध की दृष्टि से उचित नहीं होगा।

क्योंकि प्रत्येक घटना अपने भीतर एक स्वतंत्र नैतिक प्रश्न रखती है।

इसलिए अब हम इन्हें एक-एक करके देखेंगे।

 अगला सबसे महत्वपूर्ण आख्यान — अभिमन्यु

द्रोणपर्व में हमारे सामने अगला बड़ा प्रसंग है— अभिमन्यु और चक्रव्यूह।

यह केवल एक युद्ध-कथा नहीं है। यहाँ प्रश्न होंगे— चक्रव्यूह क्या था? अभिमन्यु को उसमें प्रवेश का ज्ञान कैसे था? बाहर निकलने की समस्या क्या थी? अर्जुन को युद्धभूमि से दूर क्यों किया गया? अभिमन्यु के साथ युद्ध की मर्यादाएँ कहाँ तक निभाई गईं? उसकी मृत्यु के बाद अर्जुन की प्रतिज्ञा क्यों आती है?

और सबसे महत्वपूर्ण— क्या कुरुक्षेत्र का युद्ध उस नैतिक सीमा को पार करने लगता है जिसकी चर्चा युद्ध से पहले की गई थी?

यहीं से हमारी कथा एक बहुत कठिन क्षेत्र में प्रवेश करेगी।

क्योंकि अब प्रश्न केवल— “कौन धर्म के पक्ष में है?” नहीं रहेगा।

प्रश्न होगा— जब धर्मयुद्ध स्वयं अपनी मर्यादाएँ खोने लगे, तब धर्म की पहचान कैसे की जाए?

यही प्रश्न आगे जाकर युद्धोत्तर महाभारत को समझने की कुंजी बनेगा।

कठोर शोध-निष्कर्ष अभी तक की यात्रा में एक संरचना स्पष्ट दिखाई देती है—

अर्जुन का विषाद → गीता → कर्म का स्वीकार → भीष्म का पतन → द्रोण का सेनापतित्व → रणनीति का तीखापन → अभिमन्यु का संकट।

लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि महाभारत इन घटनाओं को सीधे गीता के सिद्धान्तों की “परीक्षा” के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।

इतना अवश्य कहा जा सकता है कि—

गीता के बाद वही युद्ध एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करता है जहाँ कर्म, धर्म, रणनीति, प्रतिशोध और व्यक्तिगत संबंधों की सीमाएँ लगातार टकराने लगती हैं।

यही द्रोणपर्व की वास्तविक दार्शनिक भूमि है।

अब हमारी कथा कहाँ पहुँची?

कुरुक्षेत्र → अर्जुन का विषाद → भगवद्गीता → युद्ध → भीष्म का पतन → कर्ण की वापसी → द्रोण सेनापति → युधिष्ठिर को जीवित पकड़ने की योजना → संशप्तक → अर्जुन को मुख्य रणभूमि से दूर करना → चक्रव्यूह और अभिमन्यु की ओर

— मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
भगवद्गीता शोध परियोजना

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