महाभारत — वनपर्व — तीर्थ-यात्रा : पाण्डवों का मार्ग और गंगा-प्रदेश की ओर

महाभारत — वनपर्व — तीर्थ-यात्रा : पाण्डवों का मार्ग और गंगा-प्रदेश की ओर

पुष्कर में बारह रातों का निवास और तीर्थ-व्रत पूरा करने के बाद पाण्डव आगे बढ़ते हैं। महाभारत स्वयं बताता है कि पुष्कर से आगे जम्बूमार्ग, फिर तण्डुलिकाश्रम और अगस्त्य-सरोवर आदि तीर्थ आते हैं। अर्थात् पुष्कर कोई अकेला पड़ाव नहीं था; वह एक लंबे तीर्थ-मार्ग का एक प्रमुख चरण था। 

यहीं से हमारे लिए पाण्डवों के मार्ग का एक प्रारम्भिक नक्शा बनता है—

पुष्कर → जम्बूमार्ग → तण्डुलिकाश्रम → अगस्त्य-सरोवर → आगे अनेक आश्रम और तीर्थ → गंगा–यमुना क्षेत्र → प्रयाग

यह आधुनिक सड़क-मार्ग का नक्शा नहीं है। यह महाभारत के कथित तीर्थ-क्रम का नक्शा है।

प्रयाग की ओर

यात्रा आगे बढ़ती है।

पाण्डव अब उस भूभाग में पहुँचते हैं जहाँ गंगा और यमुना का संगम है।

महाभारत इस स्थान को अत्यंत ऊँचा तीर्थ मानता है। यहाँ ब्रह्मा द्वारा यज्ञ किए जाने की कथा कही जाती है और प्रयाग को देवताओं, ऋषियों और पितरों से सम्बद्ध महान तीर्थ बताया जाता है।

लेकिन इस बार हमारे पास केवल तीर्थ-महिमा नहीं है।

पाण्डव स्वयं यहाँ क्या करते हैं—यह भी पाठ स्पष्ट रूप से बताता है।

पाण्डव प्रयाग पहुँचते हैं

महाभारत के अनुसार पाण्डव गंगा और यमुना के संगम पर पहुँचते हैं।

वे वहाँ— स्नान करते हैं, संयम और तपस्या का पालन करते हैं, और तीर्थ में निवास करते हैं।

पाठ विशेष रूप से कहता है कि वे वहाँ महान तपस्या करते हुए निवास करते हैं। 

यह बात हमारे लिए महत्वपूर्ण है। क्योंकि इससे तीर्थयात्रा का वास्तविक स्वरूप सामने आता है।

यह केवल—

स्थान देखना → आगे बढ़ जाना नहीं था। बल्कि— स्थान → स्नान → निवास → संयम → तप → अगला तीर्थ

एक धार्मिक यात्रा-पद्धति बनती है।

प्रयाग का उस समय का महत्त्व

महाभारत प्रयाग को साधारण तीर्थों में नहीं रखता। वहाँ गंगा और यमुना का संगम है।

और इसी क्षेत्र को ब्रह्मा के यज्ञ-स्थल से जोड़ा जाता है।

पाठ में प्रयाग के साथ प्रतीष्ठान, कम्बल, अश्वतर और भोगवती जैसे तीर्थों को भी ब्रह्मा की यज्ञ-वेदियों से जोड़ा गया है। 

इससे एक रोचक बात सामने आती है। आज हम प्रयाग को मुख्यतः— गंगा + यमुना + संगम के रूप में जानते हैं।

लेकिन महाभारत की कल्पना में यह उससे कहीं बड़ा यज्ञ-क्षेत्र है।

यहाँ एक और असाधारण बात

महाभारत कहता है कि प्रयाग में अनेक प्रकार की शक्तियाँ और प्राणी उपस्थित माने जाते हैं—

देवता, ऋषि, पितर, नाग, गन्धर्व, अप्सराएँ आदि। 

इसे हम भौतिक वैज्ञानिक वर्णन नहीं मान सकते।

लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से इसका अर्थ बहुत रोचक है।

एक ही तीर्थ में— देव-परंपरा,  ऋषि-परंपरा, पितृ-परंपरा, नाग-परंपरा, नदी, यज्ञ  सभी को जोड़ दिया गया है।

अर्थात् प्रयाग एक प्रकार का सांस्कृतिक संगम भी बन जाता है।

क्या यहाँ “त्रिवेणी” थी?

यहाँ शोध में सावधानी आवश्यक है।

महाभारत के इस वर्णन में गंगा और यमुना के संगम का स्पष्ट उल्लेख है। बाद की भारतीय परंपरा में सरस्वती की अदृश्य धारा के साथ त्रिवेणी संगम की धारणा अत्यंत प्रसिद्ध हुई।

इसलिए हमें यह नहीं लिखना चाहिए कि— “महाभारत में वर्तमान त्रिवेणी संगम की पूरी अवधारणा उसी रूप में मौजूद थी।”

अधिक सुरक्षित कथन है— 

महाभारत में गंगा–यमुना संगम प्रयाग की तीर्थ-पहचान का केंद्रीय तत्व है; सरस्वती के साथ त्रिवेणी की प्रसिद्ध धार्मिक अवधारणा बाद की परंपराओं में और अधिक विकसित हुई।

यही इतिहास और परंपरा के बीच आवश्यक अंतर है।

पाण्डव फिर आगे बढ़ते हैं

प्रयाग में स्नान और तपस्या के बाद यात्रा रुकती नहीं।

पाण्डव आगे वेदी नामक तीर्थ की ओर जाते हैं, जिसे ब्रह्मा से सम्बद्ध और तपस्वियों द्वारा पूजित बताया गया है। 

फिर यात्रा अनेक तीर्थों, नदियों और आश्रमों से होती हुई आगे बढ़ती है।

इस प्रकार पाण्डवों का मार्ग अब किसी एक दिशा में जाने वाला राजमार्ग नहीं रह जाता।

यह एक विशाल तीर्थ-जाल बन जाता है।

पाण्डवों के मार्ग को अब ऐसे समझिए

हमारे शोध के लिए मैं आगे प्रत्येक भाग में यह छोटा-सा “मार्ग-मानचित्र” साथ रखूँगा।

अब तक

पुष्कर
→ जम्बूमार्ग, → तण्डुलिकाश्रम → अगस्त्य-सरोवर → अनेक आश्रम/तीर्थ → गंगा–यमुना क्षेत्र → प्रयागवेदी
→ आगे के तीर्थ

यह क्रम महाभारत के तीर्थयात्रा वर्णनों से लिया जा रहा है, न कि आधुनिक तीर्थ-पर्यटन के क्रम से। 

और अब यात्रा का स्वर और बदलता है

प्रयाग के बाद पाण्डवों की यात्रा उन्हें धीरे-धीरे गंगा के ऊपरी क्षेत्रों और हिमालय की ओर ले जाती है।

वहाँ कथा केवल स्नान और दान की नहीं रहेगी।

अब सामने आएगा—

हिमालय,गंगा का उद्गम, कनखल, नाग-तीर्थ, और अंततः दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र।

और वहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण घटना होगी—

पाण्डवों की तीर्थयात्रा पहली बार वास्तविक भौगोलिक कठिनाई से टकराएगी।

लोमश उन्हें सावधान करेंगे।

कुछ मार्ग इतने दुर्गम होंगे कि पूरा दल साथ नहीं जा सकेगा।

यहीं हमें पता चलेगा कि महाभारत का तीर्थ-भूगोल केवल कल्पित स्वर्गीय संसार नहीं है—उसमें पहाड़, दूरी, कठिन मार्ग और यात्रा की वास्तविक समस्या भी मौजूद है। 

अगला भाग इसी यात्रा को आगे बढ़ाएगा—प्रयाग से गंगा के ऊपरी क्षेत्र और हिमालय की ओर।

— मुकेश श्रीवास्तव
भगवद्गीता शोध परियोजना

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