महाभारत — उद्योगपर्व भाग — कर्ण, कुन्ती और अंतिम धर्म-संकट : युद्ध से पहले आखिरी अवसर
महाभारत — उद्योगपर्व
भाग — कर्ण, कुन्ती और अंतिम धर्म-संकट : युद्ध से पहले आखिरी अवसर
युद्ध अब केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं रहा
कृष्ण हस्तिनापुर से लौट चुके थे।
शांति का अंतिम प्रयास भी असफल हो चुका था।
युधिष्ठिर ने अपना पूरा राज्य माँगा था; फिर माँग घटाकर इतनी कर दी थी कि पाँच भाइयों के लिए पाँच ग्राम भी पर्याप्त होते। लेकिन दुर्योधन किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
अब युद्ध लगभग निश्चित था।
लेकिन महाभारत यहीं एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है,
क्या युद्ध इसलिए निश्चित था क्योंकि कोई विकल्प बचा ही नहीं था, या इसलिए कि मनुष्यों ने उपलब्ध विकल्पों को अपने-अपने संबंधों, अहंकार और प्रतिज्ञाओं के कारण अस्वीकार कर दिया?
इसी बिंदु पर कथा कर्ण की ओर मुड़ती है।
कर्ण इस युद्ध का केवल एक महान योद्धा नहीं था।
वह स्वयं उस युद्ध की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक था।
जिस व्यक्ति को पाण्डवों का सबसे बड़ा शत्रु समझा जा रहा था, वही वास्तव में कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र था।
और अब युद्ध के ठीक पहले यह सत्य सामने आने वाला था।
कृष्ण कर्ण से मिलते हैं
कृष्ण ने कर्ण को अपने साथ चलने का प्रस्ताव दिया।
यह केवल किसी योद्धा को अपनी ओर करने का राजनीतिक प्रयास नहीं था।
कृष्ण ने कर्ण के सामने उसकी वास्तविक पहचान रखी।
तुम राधेय मात्र नहीं हो। तुम कुन्ती के पुत्र हो।
तुम पाण्डवों के ज्येष्ठ भ्राता हो।
अर्थात् जिस युद्ध में कर्ण अर्जुन को मारने के लिए खड़ा होने वाला था, उसी युद्ध में अर्जुन वास्तव में उसका छोटा भाई था।
यहाँ महाभारत एक असाधारण नैतिक परिस्थिति निर्मित करता है।
कर्ण के सामने तीन पहचानें खड़ी थीं—
जन्म की पहचान — कुन्ती का पुत्र।
पालन की पहचान — राधा और अधिरथ का पुत्र।
जीवन की पहचान — दुर्योधन का मित्र और सहयोगी।
इन तीनों में से कौन-सी उसकी वास्तविक पहचान है?
महाभारत इसका कोई सरल उत्तर नहीं देता।
कृष्ण का प्रस्ताव
कृष्ण ने कर्ण से कहा कि यदि वह पाण्डवों की ओर आ जाए तो परिस्थिति पूरी तरह बदल सकती है।
कर्ण केवल पाण्डवों का भाई नहीं होगा— वह ज्येष्ठ पाण्डव होगा।
राज्य पर उसका अधिकार स्थापित किया जा सकता था।
युधिष्ठिर उसके छोटे भाई होते।
अर्जुन उसका अनुज होता।
भीम, नकुल और सहदेव उसके छोटे भाई होते।
इस प्रकार कृष्ण कर्ण के सामने केवल युद्ध से बचने का प्रस्ताव नहीं रखते।
वे उसके सामने एक नया जीवन रखते हैं।
जिस सम्मान की तलाश में कर्ण ने जीवन बिताया था, वह सम्मान उसके जन्मसंबंध के आधार पर उसके सामने रखा जा रहा था।
लेकिन कर्ण के लिए प्रश्न इतना सरल नहीं था।
उसका पूरा जीवन उस व्यक्ति से जुड़ा था जिसने उसे स्वीकार किया था— दुर्योधन।
कर्ण ने दुर्योधन का साथ तब दिया था जब संसार उसे सूतपुत्र कहकर अपमानित करता था।
दुर्योधन ने उसे अंग का राजा बनाया।
कर्ण के लिए यह केवल राजनीतिक संबंध नहीं था।
यह उसके जीवन के सबसे कठिन समय में प्राप्त स्वीकृति थी।
इसलिए जन्मसत्य सामने आने पर भी कर्ण दुर्योधन को छोड़ नहीं पाया।
कर्ण का सबसे बड़ा धर्म-संकट
यहीं महाभारत का एक अत्यंत गहरा प्रश्न सामने आता है—
धर्म क्या केवल जन्म से निर्धारित होता है?
यदि कर्ण कुन्ती का पुत्र है तो क्या उसे पाण्डवों के साथ जाना चाहिए?
या धर्म उस संबंध का नाम है जिसे मनुष्य अपने जीवन में निभाता है?
कर्ण के सामने जन्म और कृतज्ञता आमने-सामने खड़े हैं।
एक ओर है— कुन्ती। जिसने उसे जन्म दिया।
दूसरी ओर— राधा और अधिरथ।
जिन्होंने उसका पालन किया। और तीसरी ओर— दुर्योधन।
जिसने उसे सामाजिक अपमान के बीच प्रतिष्ठा दी और मित्र बनाया।
यही कारण है कि कर्ण का निर्णय महाभारत में केवल “सही” या “गलत” निर्णय बनकर नहीं रह जाता।
उसमें मनुष्य की एक वास्तविक समस्या दिखाई देती है—
क्या मनुष्य अपने अतीत के प्रति कृतज्ञता को अपने वर्तमान धर्म से ऊपर रख सकता है?
महाभारत इस प्रश्न का कोई आसान नैतिक सूत्र नहीं देता।
कर्ण का निर्णय
कर्ण कृष्ण का प्रस्ताव स्वीकार नहीं करता।
वह दुर्योधन को नहीं छोड़ता।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए।
कर्ण यह नहीं कहता कि उसे अपने जन्म का सत्य स्वीकार नहीं है।
वह यह भी नहीं कहता कि कुन्ती झूठ बोल रही है।
वह सत्य को जान लेता है।
लेकिन सत्य जान लेना और उसके अनुसार जीवन बदल देना—दो अलग बातें हैं।
कर्ण अपने जीवन की बनाई हुई निष्ठा को नहीं तोड़ता।
यही उसका गुण भी है और उसकी त्रासदी भी।
वह उस व्यक्ति के साथ खड़ा रहता है जिसने उसके जीवन के निर्णायक मोड़ पर उसे सम्मान दिया था।
लेकिन इसी निष्ठा के कारण वह उस युद्ध के उस पक्ष में खड़ा होता है जिसे स्वयं महाभारत अंततः विनाश की ओर ले जाता है।
फिर आती हैं कुन्ती
कृष्ण के बाद कुन्ती स्वयं कर्ण से मिलती हैं।
यह महाभारत के सबसे मार्मिक प्रसंगों में से एक है।
कुन्ती कर्ण को बताती हैं— “तुम मेरे पुत्र हो।”
वह उसे उसके जन्म की कथा बताती हैं।
वह बताती हैं कि उसका जन्म सूर्य से हुआ था और वह जन्म से ही कवच और कुण्डलों से युक्त था। महाभारत के पाठ में कर्ण की यही जन्मकथा उसे असाधारण वीर के रूप में स्थापित करती है।
लेकिन यहाँ एक असहज सत्य भी सामने आता है।
कर्ण को जन्म देने वाली माता ने उसे शैशव में छोड़ दिया था।
जिस माता ने उसे जन्म दिया, वह उसके जीवन में अनुपस्थित रही।
जिस माता ने उसका पालन किया—राधा—वह उसके जीवन की वास्तविक मातृ-उपस्थिति थी।
इसलिए कुन्ती का रक्त-संबंध सत्य है, लेकिन कर्ण की भावनात्मक दुनिया उससे कहीं अधिक जटिल है।
कुन्ती का आग्रह
कुन्ती कर्ण से कहती हैं कि वह अपने भाइयों के पास लौट आए।
वह उसे बताती हैं कि वह ज्येष्ठ पाण्डव है।
यदि वह पाण्डवों के साथ आता है तो उसका स्थान सबसे ऊपर होगा।
लेकिन कर्ण इस आग्रह को भी स्वीकार नहीं करता।
यहाँ महाभारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक पक्ष सामने आता है—
मनुष्य केवल उस व्यक्ति का परिणाम नहीं है जिसने उसे जन्म दिया है।
वह उन संबंधों से भी निर्मित होता है जिन्होंने उसके जीवन को अर्थ दिया।
कर्ण का शरीर कुन्ती से आया था।
लेकिन उसका जीवन राधा, अधिरथ और दुर्योधन के साथ बना था।
यही कारण है कि जन्मसत्य उसकी पूरी आत्म-पहचान को बदल नहीं देता।
फिर भी कर्ण कुन्ती को एक वचन देता है
यहीं यह प्रसंग और अधिक गहरा हो जाता है।
कर्ण कुन्ती से कहता है कि वह सभी पाण्डवों को नहीं मारेगा।
उसका मुख्य युद्ध अर्जुन से होगा।
अर्थात् युद्ध के अंत में कुन्ती के पाँच पुत्र जीवित रहेंगे—
या तो अर्जुन जीवित रहेगा और कर्ण मारा जाएगा,
या कर्ण अर्जुन को मार देगा और तब भी अन्य चार पाण्डव जीवित रहेंगे।
कर्ण इस प्रकार कुन्ती को एक प्रकार का आश्वासन देता है।
यह प्रसंग महाभारत के नैतिक संसार की जटिलता को बहुत स्पष्ट करता है।
कर्ण दुर्योधन को नहीं छोड़ता।
लेकिन कुन्ती को भी पूरी तरह अस्वीकार नहीं करता।
वह अपने पुराने संबंध और अपने जन्मसंबंध—दोनों के बीच एक सीमारेखा खींचने का प्रयास करता है।
कर्ण की त्रासदी कहाँ है?
कर्ण को केवल “अच्छा” या “बुरा” कह देना महाभारत को बहुत छोटा कर देना होगा।
कर्ण में कई विरोधी शक्तियाँ एक साथ काम करती हैं—
असाधारण प्रतिभा। अपमान की स्मृति। सम्मान की तीव्र आकांक्षा। दुर्योधन के प्रति कृतज्ञता।
अर्जुन के प्रति प्रतिस्पर्धा। कुन्ती के प्रति जन्मसंबंध। अपनी सामाजिक पहचान को सिद्ध करने की इच्छा।
और इन सबके ऊपर—
अपनी प्रतिज्ञा से पीछे न हटने का आग्रह।
यही कारण है कि कर्ण महाभारत का केवल एक योद्धा नहीं है। वह निष्ठा और धर्म के संघर्ष का चरित्र बन जाता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण शोध-सावधानी
कर्ण की कथा को पढ़ते समय दो अतियों से बचना आवश्यक है।
पहली अति— “कर्ण वास्तव में पाण्डव था, इसलिए उसे पाण्डवों के साथ ही होना चाहिए था।”
यह आधुनिक दृष्टि से सरल निष्कर्ष है, लेकिन महाभारत का नैतिक संसार इससे अधिक जटिल है।
दूसरी अति— “कर्ण दुर्योधन का मित्र था, इसलिए उसका पक्ष लेना ही उसका धर्म था।”
यह भी पर्याप्त नहीं है। क्योंकि मित्रता अपने आप में धर्म का अंतिम प्रमाण नहीं है।
महाभारत बार-बार यह प्रश्न उठाता है कि—
क्या किसी व्यक्ति के प्रति निष्ठा अन्यायपूर्ण व्यवस्था के प्रति निष्ठा बन सकती है?
कर्ण इसी प्रश्न के भीतर फँसा हुआ चरित्र है।
कर्ण और अर्जुन — केवल दो योद्धाओं की प्रतिस्पर्धा नहीं
अब युद्ध की सबसे बड़ी व्यक्तिगत टकराहट भी एक नए अर्थ में बदल जाती है।
अर्जुन और कर्ण केवल दो महान धनुर्धर नहीं हैं। वे भाई हैं।
लेकिन दोनों इस सत्य को जीवन के अधिकांश समय नहीं जानते।
इसलिए उनका युद्ध केवल शस्त्रों का युद्ध नहीं होगा।
वह—
जन्म बनाम पालन, प्रतिभा बनाम सामाजिक पहचान, मित्रता बनाम भ्रातृत्व, प्रतिज्ञा बनाम धर्म
का भी संघर्ष होगा।
और यही कारण है कि आगे जब कुरुक्षेत्र में अर्जुन अपने सामने अपने ही संबंधियों को देखेगा, तब उसका संकट केवल युद्ध करने या न करने का संकट नहीं होगा।
महाभारत पहले ही उसके सामने ऐसे संबंधों की भूमि तैयार कर चुका है।
सेनाएँ अब वास्तव में युद्धभूमि की ओर बढ़ती हैं
कर्ण का निर्णय अंतिम हो जाता है।
अब दोनों पक्ष अपनी-अपनी सेनाओं को व्यवस्थित करने लगते हैं।
पाण्डवों के पास सात अक्षौहिणी सेना थी।
युधिष्ठिर ने सात प्रमुख सेनानायकों की व्यवस्था की और अंततः धृष्टद्युम्न को प्रधान सेनापति बनाया। महाभारत में धृष्टद्युम्न को द्रोण के वध के उद्देश्य से उत्पन्न योद्धा के रूप में विशेष रूप से रखा गया है।
दूसरी ओर कौरवों की विशाल सेना का प्रधान सेनापति भीष्म बनाया गया।
भीष्म ने एक शर्त के साथ नेतृत्व स्वीकार किया—कर्ण उनके जीवित रहते युद्ध में उनके साथ अग्रिम रूप से नहीं लड़ेगा। कर्ण स्वयं कहता है कि जब तक गंगापुत्र जीवित हैं, वह युद्ध नहीं करेगा; भीष्म के बाद वह अर्जुन से लड़ेगा।
इस प्रकार युद्ध शुरू होने से पहले ही एक विचित्र स्थिति बनती है—
एक ही पक्ष में दो महान योद्धा हैं, लेकिन उनके बीच पूर्ण एकता नहीं है।
कौरवों के पास संख्या और शक्ति है। पाण्डवों के पास भी विशाल सेना है।
लेकिन युद्ध केवल सेना की संख्या से निर्धारित नहीं होने वाला।
कुरुक्षेत्र अब सामने है
पाण्डव सेना कुरुक्षेत्र पहुँचती है।
युधिष्ठिर के शिविर की व्यवस्था की जाती है।
महाभारत में वर्णन आता है कि पाण्डवों ने कुरुक्षेत्र में हिरण्यवती नदी के समीप अपना शिविर स्थापित किया और सुरक्षा के लिए खाई आदि की व्यवस्था की गई।
अब कथा वन से निकल चुकी है। अब कोई अज्ञात वन नहीं। कोई तीर्थयात्रा नहीं। कोई अज्ञातवास नहीं। कोई शांति-दूत शेष नहीं।
अब सामने है— कुरुक्षेत्र।
और यहीं से भगवद्गीता की वास्तविक भूमिका शुरू होती है
यह बिंदु हमारे पूरे शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यदि हम केवल भगवद्गीता के पहले श्लोक से पढ़ना शुरू करें—
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
तो ऐसा लग सकता है कि अचानक दो सेनाएँ सामने आ गईं और अर्जुन अचानक विचलित हो गया।
लेकिन महाभारत का पूरा पूर्वकथानक पढ़ने के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है।
अर्जुन का संकट अचानक उत्पन्न नहीं हुआ।
उसके पीछे है—
राज्य का हरण → द्यूत → वनवास → अज्ञातवास → अपमान → अनेक संघर्ष → शांति के प्रयास → पाँच ग्राम तक की माँग → कृष्ण का दूतत्व → शांति का असफल होना → कर्ण का जन्मसत्य → भाइयों के बीच छिपा हुआ रक्त-संबंध → और अब युद्ध।
इसलिए भगवद्गीता को समझने के लिए कुरुक्षेत्र से पहले की पूरी मानसिक और नैतिक यात्रा को समझना आवश्यक है।
हमारी शोध-यात्रा में इसका महत्व
अब तक हमारी कथा में एक बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है।
आरंभ में प्रश्न था— “कौरव और पाण्डव क्यों लड़ रहे हैं?”
फिर प्रश्न हुआ— “क्या युद्ध टाला जा सकता था?”
उद्योगपर्व हमें बताता है— हाँ, प्रयास हुए थे।
कृष्ण ने शांति का प्रयास किया।
युधिष्ठिर ने माँग घटाई।
विदुर ने चेताया।
भीष्म चिंतित हुए।
धृतराष्ट्र युद्ध के परिणाम से भयभीत था।
कृष्ण ने दुर्योधन को समझाया।
लेकिन अंततः निर्णय अहंकार, आसक्ति, प्रतिज्ञाओं और संबंधों के जाल में फँस गया।
और कर्ण का प्रसंग हमें एक और गहरी बात बताता है—
कभी-कभी मनुष्य सत्य जान लेने के बाद भी अपने चुने हुए मार्ग से नहीं लौटता।
यहीं से गीता का प्रश्न जन्म लेता है।
अर्जुन के सामने भी अब एक ऐसा ही प्रश्न होगा— “मैं क्या करूँ?”
लेकिन अर्जुन का संकट कर्ण से भिन्न होगा।
कर्ण ने सत्य जानकर भी अपना पक्ष चुना।
अर्जुन युद्धभूमि पर पहुँचकर अपने ही चुने हुए पक्ष के धर्म पर प्रश्न करेगा।
और तब कृष्ण का उत्तर केवल युद्ध के लिए प्रेरणा नहीं होगा।
वह—
इन प्रश्नों का उत्तर बन जाएगा।
यही वह द्वार है जिसके ठीक बाहर अब भगवद्गीता खड़ी है।
अब हमारी कथा कहाँ पहुँची?
वनवास → तीर्थयात्रा → अज्ञातवास → विराट → उपप्लव्य → उद्योगपर्व → शांति-दूत कृष्ण → शांति का असफल प्रयास → कर्ण का जन्मसत्य → कुन्ती–कर्ण संवाद → सेनाओं का संगठन → कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान → अब भगवद्गीता के द्वार पर अर्जुन
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