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कोई ज़रूरी तो नहीं,

कोई ज़रूरी तो नहीं, नाचघर जाया जाए हो रहा शहर में तमाशा चलो आओ देखा जाए साधे पाँव संग भूखे पेट, रस्सी पे नाचती लड़की देख थरथराती छातियाँ चंद सिक्के उछाला जाए हूत तू तू सब बोल रहे खेल कबड्डी खेल रहे चुनाव अखाड़ा खुल गया चल सत्ता दंगल देखा जाए है सरे आम बाल बिखेरे देखो महंगाई झूम रही औ नेता बन के नाच रहे भालू - बन्दर देखा जाए मुकेश इलाहाबादी -----

प्यार मुहब्बत झूठी बातें

इक राजा इक रानी लिख फिर से वही कहानी लिख प्यार मुहब्बत झूठी बातें रिश्ते हैं जिस्मानी लिख बाँध ले गठरी सच्चाई की धन दौलत बेमानी लिख देश - प्रेम की खातिर तू अपनी चढ़ी जवानी लिख रोना - धोना छोड़ दे प्यारे ग़ज़ल कोई तूफानी लिख मुकेश इलाहाबादी ---------

आप भी अज़ब दिल्लगी करते हो जनाब

आप भी अज़ब दिल्लगी करते हो जनाब पलकें बंद करके कहते हो आखों में बस जाऊं मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

दिल में ताज़ी हवा रक्खो

दिल में ताज़ी हवा रक्खो दिले दरीचा खुला रक्खो इतनी मायूसी अच्छी नही चरागे हौसला जला रक्खो शख्शियत महक उट्ठेगी गुले मुहब्बत खिला रक्खो कोई भला करे या बुरा करे अपने होठों पे दुआ रक्खो ग़म अपना सूना सको तुम ऐसा कोई इक ठिया रक्खो मुकेश इलाहाबादी ----------

गर अपने आंसुओं को

गर अपने आंसुओं को तन्हाइयों की जगह मेरी हथेली में गिर जाने दिया होता खुदा कसम अब तक ये आंसू फूल बन के खिल गए होते मुकेश इलाहाबादी ------

किताबे ज़िंदगी का इक इक सफ़ा पलटता हूँ

किताबे ज़िंदगी का इक इक सफ़ा पलटता हूँ माज़ी के हर लफ्ज़ में सिर्फ तुझे ही पढता हूँ अंधेरी रात जब नींद किसी करवट आती नहीं रह - रह के ख़्वाबों में तेरा ही अक्श देखता हूँ जब कभी दास्ताने ज़िंदगी लिखता हूँ तब - तब गीत ग़ज़ल और रुबाई में तेरा ही नाम लिखता हूँ यूँ तो ज़माने में कई दोस्त हैं महफ़िल है रौनके हैं फिर भी शामो सहर तन्हाइयों में रहना चाहता हूँ अब तो तमाम उम्र गुज़र गयी सफ़र में ऐ मुकेश तेरा दर और मेरी मंज़िल कब आयेगी सोचता हूँ मुकेश इलाहाबादी ------------------------------ ----

SWATANTRATA DIWAS PER MERE BHEE DO SHABD

श्रद्धेय अतिथगण एवं बाल मित्रों, आप सभी को स्वाधीनता दिवस की 65वीं वर्षगाठं की बहुत बहुत शुभकामनाएं। मित्रों मुझे यह बडी अजीब बात लगती है कि हम लोग बिना स्वाधीनता का अर्थ जाने ही स्वाधीनता दिवस मनाते रहते हैं और बिना स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ समझे स्वतंत्रता दिवस मनाते रहते हैं। मेरे देखे स्वाधीनता का अर्थ है जो ‘स्व’ के आधीन हो और स्वतंत्रा को अर्थ होता है जो स्व के तंत्र मे स्थित हो। और विडंबना ये भी है कि हम लोग न तो स्व को जानते हैं न अपने तंत्र को जानते हैं और नही ही अधीनता वह परतंत्रता के वास्तबिक अर्थो मे समझते हैं। मेरे देखे स्वतंत्रता और परतंत्रता एक ही सिक्के के दो पहलू है। बिना परतंत्रता के स्वतंत्रता अराजक हो जाती है तो निखालिष परतंत्रा सारे विकास को अवरुद्ध कर देती है। शायद इसी कारण भारतीय मनीषा से इन दोनो बातों को जानकर ही इन दोनेा अदभुत शब्दों का श्रजन किया है। और मेरा भी मानना है कि इनसान को स्वतंत्रा होनी चाहिये विचार की भाव की रहने की खाने की कमाने की । मगर साथ ही धर्म की संस्कार की समाज के नियमों के प्रति आधीनता भी होनी चाहिये। तभी एक सभ्य सुसंस्क्रत और खूबसूरत सम...

उनकी ऑखों में दर्द के गुहर नज़र आये है

उनकी ऑखों में दर्द के गुहर नज़र आये है गुलशन के फूल बेरंग बेनूर नज़र आये है इक मुद्दत के बाद हाल पुछा है जनाब ने कि लम्बी रात के बाद सहर नज़र आये है दूर - दूर तक रेत है तपन है और तन्हाई है ज़िंदगी हमें मुस्किल सफ़र नज़र आये है मुकेश इलाहाबादी --------------------------

ऐसा भी नहीं कि हम मुहब्बत की ज़ुबाँ नहीं रखते

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ऐसा भी नहीं कि हम मुहब्बत की ज़ुबाँ नहीं रखते ये अलग बात देख कर तुम्हारे तेवर हम चुप रह गए मुकेश इलाहाबादी --------------------------------------

बचपन से ही दुनियादार हो गए

बचपन से ही दुनियादार हो गए ग़रीबी में बच्चे समझदार हो गए खेलने खाने और पढ़ने की उम्र में छोटे छोटे बच्चे बारोजगार हो गए मासूमियत को भूल कर ये बच्चे तमाम बातों के जानकार हो गए कम्पुटर और मोबाईल के युग मे खो खो व गुल्ली डंडा बेकार हो गए इक्कीसवीं सदी में राम की बातें ? सच कह के हम गुनहगार हो गए मुकेश इलाहाबादी --------------------