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मेरे मन की माला में तेरे ही नाम के मनके हैं

मेरे मन की माला में तेरे ही नाम के मनके हैं कौन कमबख्त कहता है हम किसी गैर के हैं पहले मिल, बैठ, समझ, परख मुझको ढंग से तब तू भी कहेंगी मुकेश तो है,ज़माने से हट के मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

थोड़ा सा प्यार थोड़ा सा दुलार चाहिए

थोड़ा सा प्यार थोड़ा सा दुलार चाहिए तेरी आँखों में ही सारा संसार चाहिए दौलते दुनिया से क्या गरज़ मुझको मुझको  तो  बस  तेरा दीदार चाहिए मुकेश इलाहाबादी ---------------------

और बिखर जाता हूँ ख़ुद को समेटते हुए

और बिखर जाता हूँ ख़ुद को समेटते हुए आँख हो नम जाती है दर्द से , हँसते हुए तुम्हारे इस चाँद जैसे चेहरे की आँच में देखे हैं बर्फ ही नहीं पत्थर, पिघलते हुए कैसे लिक्खूँ तुझको अपने दिल की बात हाथ लरज़ जाते हैं, तुझे ख़त लिखते हुए ऐसा भी नहीं तेरे बिन ये रात न कटेगी काट दूंगा ये तमाम रात तारे गिनते हुए बस इक ग़ज़ल सुना दे तू आज की रात मुकेश रात सो जाऊँगा, तुझे  सुनते हुए मुकेश इलाहाबादी -----------------------

परिंदो का भी ठिकाना है

परिंदो का भी ठिकाना  है बूढा बरगद आशियाना है मुसाफिर मैं उम्र भर का फ़क़त चलते ही जाना है तेरी  खामोश  निगाहों से, किया वादा भी निभाना है तुमको  मुहब्बत ही न  थी रुसवाई फ़क़त बहाना था इक दिन तुम भी मानोगे मुकेश अजब दीवाना था मुकेश इलाहाबादी ----------

परिंदो का भी ठिकाना है

परिंदो का भी ठिकाना  है बूढा बरगद आशियाना है मुसाफिर मैं उम्र भर का फ़क़त चलते ही जाना है तेरी  खामोश  निगाहों से, किया वादा भी निभाना है तुमको  मुहब्बत ही न  थी रुसवाई फ़क़त बहाना था इक दिन तुम भी मानोगे मुकेश अजब दीवाना था मुकेश इलाहाबादी ----------

अक्सर ऐसा क्यूँ होता है ?

अक्सर ऐसा क्यूँ होता है ? भीड़ में  कोई इक चेहरा अच्छा लगता है, और जी भर के देख पायें इसके पहले ही भीड़ में ही  गुम हो जाता है , अक्सर, ऐसा क्यूँ होता है? कोई दिल से अच्छा लगता है मिलने - बतियाने को जी करता है और वो ही ,, मिलते - मिलते रह जाता है जैसे - होठों तक कोई प्याला आते आते रह जाता  है पर, क्यूँ ? क्यूँ ?क ऐसा क्यूँ अक्सर  होता है? कोई ख़्वाब हकीकत होते होते रह जाता है ??? मुकेश इलाहाबादी ------------

अक्सर ऐसा क्यूँ होता है

अक्सर ऐसा क्यूँ होता है भीड़ में  कोई इक चेहरा अच्छा लगता है, और जी भर के देख पायें इसके पहले ही भीड़ में ही  गुम हो जाता है , अक्सर, ऐसा क्यूँ होता है? कोई दिल से अच्छा लगता है मिलने - बतियाने को जी करता है और वो ही ,, मिलते - मिलते रह जाता है जैसे - होठों तक कोई प्याला आते आते रह जाता  है पर, क्यूँ ? क्यूँ ?क ऐसा क्यूँ अक्सर  होता है? कोई ख़्वाब हकीकत होते होते रह जाता है ??? मुकेश इलाहाबादी ------------

अक्सर ऐसा क्यूँ होता है

अक्सर ऐसा क्यूँ होता है भीड़ में  कोई इक चेहरा अच्छा लगता है जिससे, मिलने, बतियाने को जी करता है अक्सर ऐसा क्यूँ होता है कोई दिल से अच्छा लगता है और वो ही ,, मिलते मिलते रह जाता है जैसे - होठों से कोइ प्याला गिर जाता है पर, क्यूँ क्यूँ क्यूँ ऐसा होता है कोई अपना होते होते रह जाता है ??? मुकेश इलाहाबादी ------------

मोबाइल

मेरे , दिल के मोबाइल में फीड हो तुम सब से प्रिय नंबर की तरह जिस नंबर के लिए मैंने सबसे जुदा और सबसे मीठी कान्हा की बांसुरी की रिंग टोन लगा रखी है रह - रह के देख लेता हूँ दिले मोबाइल को की कहीं तुम्हारी कॉल या मेसेज तो नहीं आया है और हर बार मायूस हो के रख देता हूँ फिर से मोबाइल को वैसे, भी तुम मेरे दिल के एंड्रॉइड फ़ोन का वो प्रोगग्राम हो और नेट सर्विस हो जिसके बिना मेरा ये दिले फ़ोन सिर्फ एक खिलौना है जिससे ज़माना खेलता है जी भर के और तोड़ता फोड़ता रहता है, किसी शैतान बच्चे सा, मेरी प्यारी सुमी, तुम्हारी सिर्फ और सिर्फ एक मिस कॉल या मैसेज के मैसेज के इंतज़ार में मुकेश इलाहाबादी --------------------------

तेरी मासूमियत

तेरी मासूमियत और साफगोई ही तो है जो, हम तुझपे मरे जाते हैं वर्ना, ईश्क़ करने के लिए तो बहुत से मिल जायेंगे   ज़माने में सुमी, तुम्ही से मुकेश इलाहाबादी ------------