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Monday, 23 February 2026

ख़ामोशी की गुफ़्तगू

 ख़ामोशी की गुफ़्तगू

अल्फ़ाज़ों से बात करना अच्छा लगता है,

वे सहारा देते हैं,

रूह को खोल देते हैं,

पर सच तो यह है

ख़ामोशी ज़्यादा बोलती है।

ख़ामोशी में छिपे हैं

वो सवाल जो जुबां पर नहीं आते,

वो दर्द जिन्हें आँखें भी छू नहीं पातीं,

और वो सच्चाइयाँ

जिन्हें अल्फ़ाज़ अक्सर ढक लेते हैं।

मैं कई बार चाहता हूँ

कि इस ख़ामोशी में डूब जाऊँ,

जहाँ कोई जवाब न हो,

सिर्फ़ रूह का आईना हो।

आजकल मैं उसी आईने में डूबा हुआ हूँ

जहाँ मैं हूँ,

और मेरी ख़ामोशी

मेरी सबसे सच्ची गुफ़्तगू बन गई है।


मुकेश ,,,


कूँ-कूँ करता आया टॉमी,

कूँ-कूँ करता आया टॉमी,

जीभ निकाले आया टॉमी।

टुन्‍ना ने दिया उसे बिस्कुट,

खुशी से पूँछ हिलाया टॉमी।


दो कूद लगा कर बोला “भौं!”,

जैसे जीता कोई इनाम,

बिस्कुट चट कर चाटे होंठ,

फिर लेटा बनकर श्रीमान


मुकेश ,,,,,,

मास्साब का डंडा

मास्साब का डंडा 

मास्साब का डंडा है,

सीधा जैसे खंभा है।

मेज़ पे जब टिक जाता,

चुप हो जाए झुंडा है।

इसे देख सुधर जाते हम,

छोड़ें सब उत्पात का,

डर थोड़ा, सीख बड़ी —

यही है असली बात का।


छुट्टी की घंटी

छुट्टी की घंटी बजी रे,

टन-टन करती आई रे,

सारी कक्षा हँस पड़ी,

खुशियों की बरसाई रे।

बस्ता कंधे चढ़ जाता,

मन पतंग बन जाता,

कॉपी-किताबें सोतीं फिर,

मैदान हमें बुलाता। 


कल तो इतवार है

कल तो इतवार है,

छुट्टी का वार है,

अलार्म घड़ी भी बोले —

“सोना तुम्हारा अधिकार है!”

ना होमवर्क का डर कोई,

ना मास्साब की फटकार है,

मस्ती ही मस्ती होगी,

क्योंकि कल इतवार है! 


मुकेश ,,,,,,,,,,,


तिलों का नक्शा”

 “

वो कहती थी,

मेरे बदन पर तिल नहीं,

छोटे-छोटे सितारे हैं।


कंधे के पास वाला,

जिसे मैं कभी गिनता भी नहीं था,

उसके लिए वह एक पहचान था

“यहीं से तुम शुरू होते हो,”

वो मुस्कुरा कर कहती।


गर्दन के पीछे का हल्का सा निशान,

जिसे मैं आईने में ढूँढ नहीं पाता,

वो बिना देखे बता देती

“यहाँ है… बिल्कुल यहीं।”


मुझे अचरज होता था,

कैसे किसी ने

मेरे शरीर को

इतनी तसल्ली से पढ़ा है,

जैसे कोई पुरानी किताब

जिसे बार-बार खोला गया हो।


पर बात सिर्फ़ त्वचा की नहीं थी।

वो जानती थी

किस तिल के पास मैं असहज हो जाता हूँ,

किस स्पर्श पर मैं चुप हो जाता हूँ।


मेरे बदन का नक्शा

उसके लिए भूगोल नहीं,

एक कहानी था।


आज आईने में देखता हूँ

सब कुछ वैसा ही है।

तिल, निशान,

त्वचा की वही रेखाएँ।


पर अब कोई नहीं कहता

“यहाँ से तुम शुरू होते हो…”


और शायद

किसी के द्वारा पहचाना जाना ही

सबसे गहरा स्पर्श होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

डायरी का एक पन्ना — वह मुझे जानती थी

 डायरी का एक पन्ना — वह मुझे जानती थी


वो मेरे बदन के सारे तिल और मस्से जानती थी,

जैसे किसी ने

नक्शे पर छोटे-छोटे सितारे चिन्हित कर दिए हों।


उसे मालूम था

मेरे कंधे के पास वह छोटा सा निशान,

और गर्दन के पीछे का वह हल्का सा तिल

जिसे मैं आईने में भी ठीक से नहीं देख पाता था।


पर बात सिर्फ़ बदन की नहीं थी

वो मेरी आवाज़ के कंपन को भी पहचानती थी,

जब मैं मज़बूत बनने की कोशिश करता था।


उसे पता था

कब मैं थका हुआ हूँ,

कब मुस्कान बनावटी है,

और कब मेरी चुप्पी

शोर मचा रही है।


वो जानती थी

मेरे भीतर के डर,

मेरे अधूरे सपने,

और वो कोना

जहाँ मैं किसी को आने नहीं देता था।


उसकी उँगलियाँ

सिर्फ़ त्वचा को नहीं,

मेरे आत्मविश्वास और असुरक्षाओं को भी छू लेती थीं।


आज जब वह साथ नहीं है,

आईना वही है,

तिल और मस्से भी वही हैं

पर उन्हें पहचानने वाली नज़र

अब पास नहीं।


और शायद

किसी को पूरी तरह जानना

सिर्फ़ शरीर को देख लेना नहीं,

बल्कि उसकी खामोशियों को पढ़ लेना है।


मुकेश ,,,,,,,,,



आँगन का रेडियो चुप है

 आँगन का रेडियो चुप है

लकड़ी की पेटी में बंद

एक बीता हुआ ज़माना

धूल की महीन परत ओढ़े पड़ा है।


कभी उसी से

सुबह की ख़बरें उतरती थीं,

दोपहर की फ़रमाइशें,

और शाम की गूँजती हुई धुनें।


उसके गोल डायल पर

उँगलियाँ शहर खोजती थीं

लखनऊ, दिल्ली, बंबई…

जैसे हवा में रास्ते खुल रहे हों।


आँगन में दादी खाट पर,

बच्चे ज़मीन पर,

और पड़ोसी दीवार के उस पार—

सबकी सुनवाई एक ही तरंग पर।


वो सिर्फ़ यंत्र नहीं था,

सामूहिक श्रवण का संस्कार था

जहाँ आवाज़ निजी नहीं,

साझी होती थी।


जब गाने बजते,

तो चूल्हे की आँच भी

ताल में जलती थी।

जब समाचार आते,

तो देश घर के भीतर आ बैठता था।


फिर समय बदला

टेलीविज़न ने दृश्य जोड़े,

मोबाइल ने आवाज़ को

व्यक्तिगत कर दिया।


अब हर कान में

अलग-अलग दुनिया है,

और आँगन

बातचीत से अधिक

वाई-फ़ाई का क्षेत्र बन गया है।


रेडियो चुप है

पर उसकी जाली में

अब भी फँसी है

पुरानी तरंगों की गूँज।


शोध की दृष्टि से देखें

तो वह उपकरण

घरेलू लोकतंत्र था

जहाँ सूचना, संगीत और राष्ट्र

एक साथ सुनाई देते थे।


आँगन का रेडियो चुप है,

पर कभी-कभी हवा चलती है

तो लगता है

कोई पुरानी धुन

फिर से ट्यून हो रही है।


मुकेश ,,,,,,,,,

झुमका

झुमका
कान की लोब पर झूलता हुआ
धातु का छोटा-सा ब्रह्मांड,
जिसमें वृत्त, घंटी और कंपन
एक साथ बसते हैं।

उसकी बनावट में
लोक-शिल्प की उँगलियों का इतिहास है—
कुंदन, मीना,
चाँदी की जाली,
सोने की महीन नक्काशी।

झुमका स्थिर नहीं रहता,
वो हर क़दम पर हिलता है
जैसे स्त्री की चाल में
ध्वनि का अदृश्य आभूषण जुड़ गया हो।

उसकी हल्की झंकार
सिर्फ़ सजावट नहीं,
उपस्थिति की घोषणा थी
घर के भीतर एक लय,
बाज़ार में एक पहचान।

उत्तर से दक्षिण तक
उसके रूप बदलते रहे—
कहीं मंदिर-शैली की भारी गोलाई,
कहीं बूँद-सा सादा आकार;
भूगोल ने भी
उसे अपना-अपना अर्थ दिया।

सिनेमा ने
उसे लोकप्रियता का नया मंच दिया,
गीतों में उसका नाम आया,
और शहर की लड़कियों ने
उसे फैशन का प्रतीक बना लिया।

पर समय के साथ
हल्के स्टड्स और मिनिमल डिज़ाइन
रोज़मर्रा की ज़रूरत बन गए
झुमका अलमारी में टँग गया,
त्योहारों का मेहमान बनकर।

शोध कहता है
आभूषण देह-सौंदर्य से अधिक
सांस्कृतिक संकेत होते हैं;
झुमका स्त्री की गति,
ध्वनि और दृश्य उपस्थिति
तीनों का संगम था।

जब भी कोई स्त्री
फिर से झुमका पहनती है,
तो कान के पास
एक छोटा-सा इतिहास
फिर से झूलने लगता है।

झुमका केवल गहना नहीं
वो स्मृति की वह घंटी है
जो हर हल्के स्पर्श पर
समय को फिर से बजा देती है।

मुकेश ,,,,,,