ख़ामोशी की गुफ़्तगू
अल्फ़ाज़ों से बात करना अच्छा लगता है,
वे सहारा देते हैं,
रूह को खोल देते हैं,
पर सच तो यह है
ख़ामोशी ज़्यादा बोलती है।
ख़ामोशी में छिपे हैं
वो सवाल जो जुबां पर नहीं आते,
वो दर्द जिन्हें आँखें भी छू नहीं पातीं,
और वो सच्चाइयाँ
जिन्हें अल्फ़ाज़ अक्सर ढक लेते हैं।
मैं कई बार चाहता हूँ
कि इस ख़ामोशी में डूब जाऊँ,
जहाँ कोई जवाब न हो,
सिर्फ़ रूह का आईना हो।
आजकल मैं उसी आईने में डूबा हुआ हूँ
जहाँ मैं हूँ,
और मेरी ख़ामोशी
मेरी सबसे सच्ची गुफ़्तगू बन गई है।
मुकेश ,,,