महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ५ : लोभ — आवश्यकता से अधिक पाने की भूख

 महाभारत — अनुशासनपर्व - प्रसंग ५ : लोभ — आवश्यकता से अधिक पाने की भूख

सत्य के बाद भीष्म जिस मनोभूमि की ओर संकेत करते हैं, वह है लोभ।

महाभारत के पूरे आख्यान को पीछे मुड़कर देखें तो कुरुवंश के विनाश में अनेक कारण दिखाई देते हैं, लेकिन उनमें एक वृत्ति लगातार सक्रिय रहती है—जो प्राप्त है, उससे संतुष्ट न होना।

दुर्योधन के पास राज्य था, सामर्थ्य था, प्रतिष्ठा थी और विशाल सेना थी। फिर भी पाण्डवों के अधिकार को स्वीकार करना उसके लिए कठिन था।

यह केवल संपत्ति का प्रश्न नहीं था।

यह उस मानसिक स्थिति का प्रश्न था जिसमें दूसरे के पास जो है, वह अपने लिए असह्य लगने लगता है।

यहीं से लोभ जन्म लेता है।

लोभ और आवश्यकता में अंतर

मनुष्य की आवश्यकताएँ सीमित हो सकती हैं, लेकिन उसकी इच्छाएँ सीमित नहीं होतीं।

भोजन चाहिए—यह आवश्यकता है।
स्वाद के लिए लगातार अधिक चाहना—यह इच्छा है।

जीवन के लिए धन चाहिए—यह आवश्यकता है।
धन को ही सुरक्षा, प्रतिष्ठा और सत्ता का अंतिम साधन मान लेना—यह लोभ की दिशा है।

इसलिए लोभ का संबंध वस्तु की मात्रा से कम और मन की तृप्तिहीनता से अधिक है।

जिसे दस चाहिए और दस मिलने पर संतोष हो जाता है, वह आवश्यकतापूर्वक लोभी नहीं।

जिसे सौ मिलकर भी हजार चाहिए और हजार मिलने पर भी भय बना रहे कि कहीं कोई और आगे न निकल जाए—समस्या वस्तु में नहीं, चेतना की अवस्था में है।

लोभ का अगला चरण

लोभ अकेला नहीं आता। उसके पीछे भय आता है— “जो मेरे पास है, वह कहीं चला न जाए।”

फिर संग्रह बढ़ता है। संग्रह बढ़ता है तो उसकी रक्षा की चिंता बढ़ती है।

चिंता बढ़ती है तो दूसरे संभावित प्रतिस्पर्धी दिखाई देने लगते हैं।

और फिर मनुष्य कभी-कभी दूसरे को हटाने को भी उचित मानने लगता है।

इस प्रकार एक छोटी-सी इच्छा धीरे-धीरे संघर्ष का कारण बन सकती है।

महाभारत में यह प्रक्रिया केवल व्यक्ति के भीतर नहीं, पूरे राजवंश के स्तर पर दिखाई देती है।

लोभ और सत्ता

सत्ता के क्षेत्र में लोभ का रूप और सूक्ष्म हो जाता है।

धन का लोभ कहता है—“मुझे अधिक चाहिए।”

सत्ता का लोभ कहता है—“निर्णय मेरे हाथ में रहना चाहिए।”

प्रतिष्ठा का लोभ कहता है—“मुझे कोई चुनौती न दे।”

यहीं लोकतांत्रिक या राजकीय व्यवस्था का वास्तविक संकट पैदा होता है—जब पद सेवा का माध्यम न रहकर स्वयं की पहचान का आधार बन जाता है।

महाभारत के राजधर्म में इसलिए राजा के व्यक्तिगत संयम को इतना महत्व दिया गया है।

जिसे स्वयं पर अधिकार नहीं, उसके हाथ में दूसरों पर अधिकार खतरनाक हो सकता है।

लोभ और न्याय

लोभ की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह न्याय की दृष्टि को धीरे-धीरे बदल देता है।

मनुष्य अपने हित को “अधिकार” और दूसरे के अधिकार को “बाधा” समझने लगता है।

तब वही व्यक्ति अपने लिए जिस नियम को उचित मानता है, दूसरे के लिए उसे कठोर मान सकता है।

यह नैतिक दृष्टि का असंतुलन है।

इसलिए अनुशासन का अर्थ केवल इच्छा को दबाना नहीं है।

इच्छा और अधिकार के बीच अंतर समझना भी अनुशासन है।

दान का संबंध यहाँ फिर दिखाई देता है

अब पिछले प्रसंग का दान नए अर्थ में समझ आता है।

दान केवल गरीब को कुछ दे देना नहीं। दान लोभ के विरुद्ध एक अभ्यास भी है।

जब मनुष्य अपनी आवश्यकता से अधिक को किसी योग्य प्रयोजन में प्रवाहित करता है, तो वह अपने भीतर यह स्वीकार करता है—

“हर प्राप्त वस्तु केवल मेरे उपभोग के लिए नहीं है।”

यहीं से संपत्ति साधन रहती है, स्वामी नहीं बनती।

लेकिन दान भी तभी सार्थक है जब वह विवेकपूर्ण हो। अंधा दान कभी-कभी समस्या को हल करने के बजाय बढ़ा सकता है। इसलिए महाभारत की दान-चर्चा में पात्र, समय, परिस्थिति और भावना जैसे प्रश्नों का महत्व है।

लोभ का सबसे सूक्ष्म रूप

सबसे कठिन लोभ धन का नहीं है। वह है— अपने विचार को सही सिद्ध करने का लोभ।

मनुष्य कभी-कभी सत्य से अधिक अपनी धारणा को बचाना चाहता है।

वह प्रमाण बदल देगा, तर्क बदल देगा, संबंध तोड़ देगा, लेकिन अपनी मान्यता नहीं छोड़ेगा।

यहाँ लोभ वस्तु का नहीं, अहंकार का है।

और यही वह बिंदु है जहाँ लोभ फिर सत्य के सामने आ खड़ा होता है।

यदि सत्य स्वीकार करने से हमारा अहंकार टूटता है, तो क्या हम सत्य स्वीकार करेंगे?

यही आत्मानुशासन की वास्तविक परीक्षा है।

महाभारत का अनुभव बताता है कि बाहरी युद्ध अचानक नहीं होता।

उसके बीज बहुत पहले मन में पड़ते हैं— असंतोष से, तुलना से, लोभ से,अहंकार से,

और अंततः अधिकार की ऐसी भावना से जिसमें दूसरे के अस्तित्व के लिए स्थान कम होता जाता है।

कुरुक्षेत्र में जो दिखाई दिया, वह भीतर लंबे समय से चल रही प्रक्रिया का बाहरी विस्फोट था।

अब प्रश्न है—लोभ के बाद कौन-सी वृत्ति मनुष्य को भीतर से असंतुलित करती है?

वह है क्रोध—और अनुशासनपर्व में क्रोध को समझे बिना धर्म के आत्मिक पक्ष को समझना कठिन होगा।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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