महाभारत — शान्तिपर्व — भाग ३१ - ज्ञान की साधना — भीष्म बताते हैं मुक्ति का मार्ग
महाभारत — शान्तिपर्व — भाग ३१ - ज्ञान की साधना — भीष्म बताते हैं मुक्ति का मार्ग
युधिष्ठिर के प्रश्न अब उस बिन्दु पर पहुँच चुके हैं जहाँ केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं कि बन्धन कैसे उत्पन्न होता है। अगला प्रश्न उससे अधिक कठिन है—
जिस अज्ञान से बन्धन उत्पन्न होता है, उससे मुक्ति कैसे मिले?
भीष्म की शिक्षा में इसका उत्तर केवल शास्त्र पढ़ लेने में नहीं है। ज्ञान को जीवन में उतारना पड़ता है। सुनना, विचार करना और अपने भीतर उस सत्य को परखना—इन तीनों के बिना आत्मज्ञान अधूरा रह जाता है।
भीष्म ज्ञान को केवल सूचना नहीं मानते
मनुष्य बहुत कुछ जान सकता है।
उसे वेदों का ज्ञान हो सकता है, अनेक शास्त्रों का अध्ययन हो सकता है, तर्क में कुशलता हो सकती है और वह आत्मा-ब्रह्म के विषय में बहुत कुछ बोल सकता है।
लेकिन यदि भीतर वही लोभ, वही क्रोध, वही अहंकार और वही आसक्ति बनी हुई है, तो भीष्म की दृष्टि में अभी ज्ञान का वास्तविक फल प्राप्त नहीं हुआ।
क्योंकि शब्द आत्मा का ज्ञान दे सकते हैं, लेकिन आत्मज्ञान के लिए दृष्टि का परिवर्तन आवश्यक है।
ज्ञान का पहला चरण है—सत्य को सुनना।
दूसरा है—उस पर विचार करना।
और तीसरा है—अपने जीवन में यह देखना कि जो समझा है, वह वास्तव में जीया भी जा रहा है या नहीं।
श्रवण से संशय तक
भीष्म की शिक्षा का एक सूक्ष्म पक्ष यह है कि प्रश्न करना ज्ञान के मार्ग में बाधा नहीं है।
युधिष्ठिर स्वयं इसका उदाहरण हैं।
वे बार-बार प्रश्न करते हैं।
एक उत्तर मिलने के बाद दूसरा प्रश्न उठाते हैं।
यदि केवल श्रद्धा पर्याप्त होती, तो इतने प्रश्नों की आवश्यकता नहीं होती।
महाभारत में ज्ञान की परम्परा का यह रूप महत्वपूर्ण है—गुरु का सम्मान और प्रश्न करने की स्वतंत्रता साथ-साथ चलती है।
श्रद्धा का अर्थ अन्धस्वीकृति नहीं।
श्रद्धा वह मनःस्थिति है जिसमें मनुष्य सत्य को जानने के लिए स्वयं को उपलब्ध कराता है; और विवेक यह देखता है कि जो सुना गया है वह तर्क, अनुभव और जीवन की कसौटी पर कितना स्थिर है।
ज्ञान और विवेक
भीष्म की शिक्षा में विवेक का अर्थ केवल बौद्धिक चतुराई नहीं।
विवेक का अर्थ है—जो बदलता है और जो अपेक्षाकृत स्थिर है, उनके बीच अन्तर करना; साधन और साध्य में अन्तर करना; इच्छा और आवश्यकता में अन्तर करना; कर्तव्य और स्वार्थ में अन्तर करना।
राजा के लिए यह विवेक राजधर्म था।
अब साधक के लिए यही विवेक आत्मधर्म बनता है।
राजा को यह जानना था कि राज्य उसका निजी स्वत्व नहीं।
साधक को यह देखना है कि शरीर, मन, पद, संबंध और उपलब्धियाँ भी उसकी अंतिम पहचान नहीं।
इस प्रकार शान्तिपर्व का बाहरी राजधर्म और आन्तरिक मोक्षधर्म एक गहरे सूत्र में जुड़ते हैं—स्वामित्व की सीमा पहचानना।
ज्ञान और इन्द्रियाँ
भीष्म इन्द्रियों को शत्रु बनाकर नहीं देखते।
इन्द्रियाँ अनुभव के द्वार हैं। लेकिन यदि मन हर अनुभव के पीछे बिना विवेक के दौड़ता रहे, तो वही इन्द्रियाँ बन्धन का माध्यम बन जाती हैं।
इसलिए ज्ञान की साधना में इन्द्रियनिग्रह आवश्यक है।
निग्रह का अर्थ यह नहीं कि संसार के प्रत्येक सुख को नष्ट कर दिया जाए।
अर्थ यह है कि सुख मनुष्य का स्वामी न बन जाए।
भोजन किया जाए, लेकिन भोजन ही जीवन का उद्देश्य न बन जाए।
धन कमाया जाए, लेकिन धन ही आत्म-मूल्य का प्रमाण न बन जाए।
सम्मान मिले, लेकिन सम्मान के बिना स्वयं को शून्य न समझा जाए।
यही संयम ज्ञान को व्यवहार में उतरने देता है।
भीष्म की दृष्टि में गुरु
आत्मज्ञान का मार्ग अकेले अहंकार के भरोसे चलना भी सम्भव नहीं।
गुरु की आवश्यकता इसलिए है कि साधक अपने ही भ्रम को सत्य समझ सकता है।
मनुष्य अपने पक्ष में तर्क करने में बहुत कुशल होता है।
वह अपनी इच्छा को आवश्यकता कह सकता है।
अपने क्रोध को न्याय कह सकता है।
अपने अहंकार को आत्मसम्मान कह सकता है।
अपने मोह को प्रेम कह सकता है।
यहीं गुरु और शास्त्र की भूमिका आती है।
वे साधक को उसके अपने मानसिक प्रतिबिम्ब से बाहर देखने में सहायता करते हैं।
लेकिन गुरु का अर्थ यह नहीं कि साधक अपना विवेक किसी दूसरे को सौंप दे।
सच्ची शिक्षा साधक को निर्भर नहीं, विवेकी बनाती है।
ज्ञान और तप
भीष्म की मोक्षधर्म-परम्परा में तप का अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना नहीं है।
वास्तविक तप उस मानसिक ऊर्जा को साधना भी है जो निरन्तर विषयों, इच्छाओं और प्रतिक्रियाओं में बिखरती रहती है।
क्रोध आया और व्यक्ति तुरंत प्रतिक्रिया न करे—यह तप है।
लोभ उत्पन्न हुआ और वह अपने निर्णय को रोककर देखे—यह तप है।
अपमान हुआ और वह प्रतिशोध से पहले स्वयं को देखे—यह तप है।
इच्छा उठी और वह पूछे कि यह आवश्यकता है या केवल मन की आदत—यह भी तप है।
इस प्रकार तप शरीर से अधिक चेतना का अनुशासन बन जाता है।
ज्ञान की परीक्षा कहाँ होती है?
शान्तिपर्व का सबसे व्यावहारिक प्रश्न यही है।
ज्ञान की परीक्षा एकान्त में नहीं, संबंधों में होती है।
जहाँ विरोधी व्यक्ति सामने हो, वहाँ क्रोध कितना घटा?
जहाँ लाभ सामने हो, वहाँ लोभ कितना घटा?
जहाँ प्रशंसा मिले, वहाँ अहंकार कितना बढ़ा?
जहाँ हानि हो, वहाँ मन कितना टूटता है?
जहाँ मृत्यु सामने आए, वहाँ जीवन को देखने की दृष्टि कितनी बदलती है?
यही वास्तविक परीक्षा है।
इस दृष्टि से भीष्म की शिक्षा किसी रहस्यमय अनुभव की प्रतीक्षा नहीं करती। वह साधक को उसके दैनिक व्यवहार में ही उसकी आध्यात्मिक स्थिति दिखा देती है।
ज्ञान से ध्यान की ओर
अब ध्यान की चर्चा का वास्तविक स्थान भी स्पष्ट होता है।
ध्यान केवल मन को शांत करने के लिए नहीं।
ज्ञान बताता है कि क्या देखना है।
विवेक बताता है कि किसे वास्तविक मानना है।
संयम मन को देखने योग्य बनाता है।
ध्यान उस देखने को स्थिर करता है।
और आत्मबोध तब सम्भव होता है जब यह समझ केवल विचार न रहकर चेतना की प्रत्यक्ष दिशा बन जाए।
इसलिए भीष्म की शिक्षा में ज्ञान और ध्यान अलग-अलग द्वीप नहीं हैं।
वे एक ही आन्तरिक यात्रा के विभिन्न चरण हैं।
मुक्ति का अर्थ
भीष्म जिस मुक्ति की ओर युधिष्ठिर को ले जा रहे हैं, वह संसार से भागने की मुक्ति नहीं।
वह अज्ञान से मुक्ति है।
वस्तु रहे या न रहे—उसके प्रति मोह का स्वरूप बदल जाए।
कर्म चलता रहे—लेकिन वह अहंकार का विस्तार न बने।
संबंध रहें—लेकिन उनमें स्वामित्व का अंधापन न हो।
शरीर वृद्ध हो—लेकिन चेतना केवल शरीर की अवस्था से अपनी पहचान न बनाए।
यही ज्ञान धीरे-धीरे मनुष्य को उस प्रश्न तक ले जाता है जहाँ शास्त्र का अन्त और आत्मानुभूति की शुरुआत होती है।
और यहाँ भीष्म की शिक्षा एक अत्यन्त गम्भीर मोड़ लेती है।
अब प्रश्न यह नहीं कि आत्मा के बारे में क्या कहा गया है, बल्कि यह है—
क्या आत्मा को वास्तव में जाना जा सकता है?
यदि जानने वाला ही आत्मा है, तो आत्मा का ज्ञान किस प्रकार का ज्ञान होगा?
यही प्रश्न शान्तिपर्व को आगे ब्रह्मविद्या की ओर ले जाता है।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
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