महाभारत — शान्तिपर्व — भाग ३२ - ब्रह्मविद्या — भीष्म की अंतिम दार्शनिक दिशा

 महाभारत — शान्तिपर्व — भाग ३२ - ब्रह्मविद्या — भीष्म की अंतिम दार्शनिक दिशा

शान्तिपर्व की दीर्घ यात्रा अब अपने दार्शनिक शिखर की ओर पहुँचती है।

युधिष्ठिर ने भीष्म से राजधर्म पूछा, आपद्धर्म पूछा, मोक्षधर्म पूछा। उन्होंने आत्मा, कर्म, वैराग्य, ध्यान और ज्ञान के विषय में भी प्रश्न किए। इन सभी प्रश्नों के पीछे अन्ततः एक ही जिज्ञासा छिपी थी—

मनुष्य उस सत्य को कैसे जाने जो परिवर्तनशील जीवन के पीछे स्थित है?

भीष्म की शिक्षा अब उसी मूल प्रश्न पर केन्द्रित होती है।

ब्रह्म — जिसे वस्तु की तरह नहीं जाना जा सकता

ब्रह्मविद्या का सबसे कठिन पक्ष यह है कि ब्रह्म को किसी दूसरी वस्तु की तरह सामने रखकर नहीं जाना जा सकता।

जो कुछ दिखाई देता है, वह ज्ञेय है।

जिसके विषय में विचार किया जाता है, वह विचार का विषय है।

लेकिन वह सत्ता जिसमें देखने, विचार करने और जानने की सम्पूर्ण प्रक्रिया घटित होती है, उसे उसी प्रकार बाहरी वस्तु बना देना सम्भव नहीं।

इसलिए ब्रह्मविद्या केवल किसी नए तथ्य को जान लेना नहीं है।

यह जानने की सम्पूर्ण दृष्टि की परीक्षा है।

यहीं ज्ञान अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है—जहाँ ज्ञेय की खोज से अधिक महत्वपूर्ण ज्ञाता के स्वरूप की खोज हो जाती है।

भीष्म की शिक्षा का सार

भीष्म ने युधिष्ठिर को कोई एक सूत्र देकर शान्तिपर्व समाप्त नहीं किया।

उन्होंने जीवन के अनेक स्तरों को एक-दूसरे से जोड़ा।

राजा यदि स्वयं पर शासन नहीं कर सकता तो राज्य पर शासन भी अधूरा है।

राज्य यदि प्रजा की रक्षा नहीं करता तो उसका वैभव निरर्थक है।

धर्म यदि परिस्थिति को नहीं देखता तो वह जड़ नियम बन सकता है।

कर्म यदि स्वार्थ से संचालित है तो बन्धन बन सकता है।

ज्ञान यदि आचरण में नहीं उतरता तो वह केवल शब्द रह सकता है।

वैराग्य यदि उत्तरदायित्व से पलायन बन जाए तो वह मुक्ति नहीं।

और आत्मज्ञान यदि जीवन की दृष्टि न बदले तो उसकी परीक्षा अभी पूरी नहीं हुई।

इस प्रकार भीष्म की शिक्षा किसी एक विषय का उपदेश नहीं, मनुष्य और समाज दोनों के संतुलन की व्यापक खोज है।

युधिष्ठिर में आया परिवर्तन

शान्तिपर्व की शुरुआत में युधिष्ठिर युद्ध के परिणाम से भीतर तक विचलित हैं।

उनके सामने राज्य है, लेकिन मन में प्रश्न है कि क्या ऐसी विजय वास्तव में विजय है।

भीष्म उन्हें शोक में स्थिर रहने के लिए नहीं कहते।

वे उन्हें ज्ञान के अनेक द्वारों से गुजारते हैं।

राजधर्म उन्हें उत्तरदायित्व की ओर लौटाता है।

आपद्धर्म उन्हें परिस्थिति की जटिलता समझाता है।

मोक्षधर्म उन्हें अपने भीतर देखने की दिशा देता है।

और आत्मविद्या उन्हें यह समझने की ओर ले जाती है कि मनुष्य की अंतिम पहचान केवल उसके कर्म, संबंध और सामाजिक भूमिका से निर्धारित नहीं होती।

इस यात्रा के बाद युधिष्ठिर का प्रश्न करने वाला मन वही नहीं रह जाता जो प्रारम्भ में था।

अब उनके सामने राज्य केवल अधिकार नहीं, दायित्व है।

धर्म केवल नियम नहीं, विवेक है।

और जीवन केवल भोग या दुःख नहीं, आत्मबोध की सम्भावना भी है।

भीष्म का शरशय्या पर रहना

लेकिन शान्तिपर्व केवल दर्शन का ग्रन्थ नहीं है।

इसके पीछे एक जीवित कथा है—एक वृद्ध योद्धा मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है और उसके सामने खड़ा है वह राजा जिसे वह युद्ध के बाद जीवन की दिशा दे रहा है।

भीष्म का शरीर बाणों से विदीर्ण है, लेकिन उनकी चेतना अभी शिक्षण में सक्रिय है।

उनका जीवन स्वयं उनकी शिक्षा का प्रमाण बन जाता है।

उन्होंने राज्य देखा। राजनीति देखी। प्रतिज्ञा का भार उठाया। 

कुरुवंश का उत्थान और पतन देखा। युद्ध देखा।

और अब मृत्यु को सामने देखकर धर्म पर विचार कर रहे हैं।

इसलिए भीष्म की शिक्षा केवल सिद्धान्त नहीं रह जाती।

वह जीवन के सम्पूर्ण अनुभव से निकली हुई दृष्टि बन जाती है।

शान्तिपर्व का वास्तविक केन्द्र

यदि सम्पूर्ण शान्तिपर्व को एक ही प्रश्न में संक्षिप्त करना हो तो वह प्रश्न हो सकता है—

व्यक्ति और राज्य दोनों अपने भीतर के असंतुलन से कैसे मुक्त हों?

राज्य का असंतुलन लोभ, अन्याय और अविवेक से उत्पन्न होता है।

व्यक्ति का असंतुलन अहंकार, आसक्ति और अज्ञान से।

भीष्म पहले बाहरी व्यवस्था को धर्म से जोड़ते हैं और फिर उसी धर्म की जड़ को मनुष्य के भीतर खोजते हैं।

यही कारण है कि शान्तिपर्व का राजधर्म और मोक्षधर्म अलग-अलग विषय दिखाई देने पर भी अन्ततः एक ही व्यापक यात्रा के दो छोर हैं।

बाहर धर्मपूर्ण व्यवस्था और भीतर जाग्रत विवेक।

यहीं शान्तिपर्व की दार्शनिक यात्रा अपनी पूर्णता के निकट पहुँचती है।

शान्तिपर्व का समापन

भीष्म की शिक्षाएँ समाप्त होने के बाद कथा फिर अपने मूल प्रवाह में लौटती है।

युधिष्ठिर अब राज्य की ओर लौटते हैं।

जिस व्यक्ति ने युद्ध के बाद स्वयं को दोष और शोक में घिरा पाया था, वही अब धर्म, शासन और जीवन के व्यापक उत्तरदायित्व को स्वीकार करने की स्थिति में आता है।

लेकिन भीष्म अभी जीवित हैं।

उनकी प्रतीक्षा है—उत्तरायण की।

युद्ध समाप्त हो चुका है, राजधर्म का उपदेश दिया जा चुका है, मोक्षधर्म की गहन चर्चा हो चुकी है। अब शिक्षक की भूमिका समाप्त होने वाली है।

भीष्म की शरशय्या पर कही हुई वाणी आगे भी महाभारत के पात्रों और पाठकों के भीतर चलती रहेगी।

शान्तिपर्व इसलिए केवल युद्ध के बाद का विराम नहीं है।

यह महाभारत का वह बिन्दु है जहाँ युद्ध की बाहरी कथा भीतर के युद्ध में बदल जाती है।

कुरुक्षेत्र में शस्त्रों का युद्ध समाप्त हुआ था।

शान्तिपर्व में मनुष्य के भीतर चलने वाले धर्म-अधर्म, मोह-विवेक, अहंकार-आत्मज्ञान और कर्तव्य-पलायन के युद्ध की पड़ताल हुई।

अब अगला चरण भीष्म के जीवन की अंतिम घड़ी है। उनकी प्रतीक्षा समाप्त होगी।

और उनके साथ महाभारत की एक युगदृष्टि भी अपने अगले चरण में प्रवेश करेगी।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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