हरिवंशपुराण — प्रथम खंड - भाग 1 : हरिवंश क्या है?

हरिवंशपुराण — प्रथम खंड - भाग 1 : हरिवंश क्या है?

हरिवंशपुराण के अध्ययन की शुरुआत उसके नाम और स्वरूप को समझने से होनी चाहिए। किसी प्राचीन ग्रंथ को समझने के लिए केवल उसकी कथाओं को जान लेना पर्याप्त नहीं होता; यह जानना भी आवश्यक है कि वह ग्रंथ किस परंपरा से आया, उसका मूल प्रयोजन क्या था, वह किसी बड़े ग्रंथ से किस प्रकार जुड़ा और कालांतर में उसकी पहचान किस प्रकार विकसित हुई।

‘हरिवंश’ इसी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह एक ओर महाभारत के साथ संबद्ध है, दूसरी ओर इसमें ऐसी विषय-वस्तु मिलती है जो इसे विकसित होती हुई पुराण-परंपरा से जोड़ती है। इसके केंद्र में कृष्ण हैं, परंतु कृष्ण तक पहुँचने के लिए ग्रंथ पहले सृष्टि, देव-परंपरा, वंश और राजवंशों की एक विस्तृत पृष्ठभूमि निर्मित करता है।

इसलिए हरिवंश को केवल कृष्ण की कथा कहना उसके वास्तविक स्वरूप को छोटा कर देना होगा।

‘हरिवंश’ नाम का अर्थ

‘हरिवंश’ दो शब्दों से बना है—हरि + वंश।

‘हरि’ भारतीय वैदिक और पौराणिक परंपरा में विष्णु, नारायण और कृष्ण से संबंधित एक अत्यंत व्यापक नाम है। ‘वंश’ का अर्थ है—कुल, परंपरा, वंशक्रम अथवा पीढ़ियों की निरंतर धारा।

इस प्रकार सामान्य अर्थ में हरिवंश का अर्थ है—हरि की वंशपरंपरा।

लेकिन यहाँ ‘वंश’ को केवल पिता से पुत्र तक चलने वाली पारिवारिक सूची के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। भारतीय पुराणीय साहित्य में वंश केवल रक्त-संबंध नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति, सत्ता, पहचान और परंपरा की निरंतरता का भी प्रतीक है।

हरिवंश में सृष्टि से लेकर देवताओं, ऋषियों और राजवंशों तक की अनेक परंपराएँ आती हैं और अंततः कथा कृष्ण तथा यादववंश की ओर केंद्रित होती है। इसलिए ‘हरिवंश’ वास्तव में एक ऐसी स्मृति-परंपरा है जिसमें ब्रह्मांडीय वंश से मानवीय वंश और मानवीय वंश से कृष्ण के व्यक्तित्व तक की यात्रा दिखाई देती है।

हरिवंश केवल वंशावली नहीं है

यदि केवल नाम के आधार पर देखा जाए तो यह अनुमान हो सकता है कि हरिवंश किसी राजवंश या देववंश की वंशावली मात्र होगा। परंतु ग्रंथ की विषय-वस्तु इससे कहीं व्यापक है।

इसमें सृष्टि-वर्णन, देव और दैत्य परंपराएँ, मन्वंतर, राजवंश, चंद्रवंश, यदुवंश, कृष्ण का जन्म, उनके बाल्यजीवन, कंस, मथुरा, यादवों की परंपरा तथा कृष्ण से जुड़े अनेक आख्यान आते हैं।

अर्थात् यहाँ वंश आख्यान का आधार है, स्वयं पूरा आख्यान नहीं।

वंश के माध्यम से व्यक्ति की पहचान निर्मित होती है और व्यक्ति के माध्यम से एक व्यापक सांस्कृतिक चेतना का निर्माण होता है। कृष्ण की कथा इसी प्रक्रिया में धीरे-धीरे अपने मानवीय और दैवीय दोनों आयामों को प्राप्त करती है।

महाभारत से हरिवंश का संबंध

हरिवंश की सबसे विशिष्ट पहचान उसके महाभारत से संबंध में है।

भारतीय परंपरा में हरिवंश को महाभारत का खिल कहा गया है। ‘खिल’ का सामान्य अर्थ है—मुख्य पाठ के साथ संबद्ध अतिरिक्त, पूरक अथवा परिशिष्ट सामग्री।

यह संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि महाभारत में कृष्ण पहले से ही केंद्रीय व्यक्तित्व हैं। वे पांडवों के मित्र हैं, राजनयिक हैं, राजनीतिक रणनीतिकार हैं, अर्जुन के सारथी हैं और भगवद्गीता के उपदेशक हैं। किंतु महाभारत का मुख्य आख्यान कृष्ण का जीवनचरित नहीं है। उसका केंद्र कुरुवंश, पांडव-कौरव संघर्ष, राज्य, धर्म और मानव-संकट है।

इसलिए महाभारत के कृष्ण को समझते समय स्वाभाविक प्रश्न उठता है—

वह कृष्ण कौन हैं जिनका प्रभाव कुरुक्षेत्र के पूरे घटनाक्रम पर इतना निर्णायक है?

हरिवंश इसी प्रश्न की ओर पीछे लौटता है।

वह कृष्ण के वंश, जन्म, परिवार, बाल्यजीवन और यादव-पृष्ठभूमि को सामने लाता है। इस दृष्टि से हरिवंश महाभारत की कथा को केवल आगे नहीं बढ़ाता, बल्कि एक अर्थ में पीछे जाकर उसकी पृष्ठभूमि को विस्तृत करता है।

महाभारत का कृष्ण और हरिवंश का कृष्ण

दोनों ग्रंथों में कृष्ण एक ही व्यक्तित्व हैं, परंतु उनके चित्रण का संदर्भ अलग है।

महाभारत का कृष्ण मुख्यतः धर्म, राजनीति, युद्ध, नीति और मानव-संकट के बीच दिखाई देता है। अर्जुन के सामने खड़ा कृष्ण मनुष्य के कर्म और कर्तव्य के प्रश्न का समाधान करता है। राजसभाओं में दिखाई देने वाला कृष्ण राजनीति और कूटनीति का केंद्र है। कुरुक्षेत्र में वही कृष्ण सारथी बन जाता है।

हरिवंश में दृष्टि दूसरी दिशा में जाती है।

यहाँ प्रश्न है—

कृष्ण का जन्म कहाँ हुआ? उनका वंश क्या है? उनके माता-पिता कौन हैं? उनका प्रारंभिक जीवन किन परिस्थितियों में बीता? यादवों का संसार क्या था? मथुरा और कंस का संबंध क्या था?

इस प्रकार महाभारत जहाँ कृष्ण के कर्म और प्रभाव को सामने लाता है, वहीं हरिवंश उनके वंश और जीवन की पृष्ठभूमि को विस्तार देता है।

यह अंतर पूर्ण विभाजन नहीं है, बल्कि दोनों ग्रंथों को समझने की एक उपयोगी शोध-दृष्टि है।

‘खिल’ की संकल्पना को कैसे समझें?

यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है।

‘खिल’ का अर्थ यह नहीं मान लेना चाहिए कि हरिवंश का प्रत्येक अंश निश्चित रूप से बाद में किसी एक व्यक्ति द्वारा महाभारत में जोड़ दिया गया था। प्राचीन भारतीय ग्रंथ आधुनिक अर्थ में एक ही समय पर लिखी गई निश्चित पुस्तकें नहीं थे। उनकी रचना, स्मरण, पाठ और विस्तार की प्रक्रिया दीर्घकालीन रही।

मौखिक परंपरा, आख्यानों का प्रसार, विभिन्न पाठ-परंपराएँ और क्षेत्रीय संरक्षण—इन सबने प्राचीन ग्रंथों के वर्तमान स्वरूप को प्रभावित किया।

इसलिए हरिवंश का अध्ययन करते समय हमें दो प्रश्न अलग-अलग रखने होंगे—

क्या हरिवंश महाभारत की मूल कथा से अलग एक विकसित पाठ है?

और—

क्या उसके भीतर ऐसी प्राचीन आख्यान-परंपराएँ सुरक्षित हैं जो महाभारत की व्यापक सांस्कृतिक दुनिया से पहले से जुड़ी रही हों?

इन प्रश्नों का उत्तर केवल परंपरा के आधार पर नहीं, बल्कि पाठालोचन, भाषा, शैली, पांडुलिपि और तुलनात्मक अध्ययन से खोजा जाना चाहिए।

हरिवंश और पुराण की ओर संक्रमण

हरिवंश की एक दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें ऐसी सामग्री मिलती है जो इसे पुराणीय साहित्य से जोड़ती है।

सृष्टि, देव-दैत्य परंपरा, मन्वंतर, वंशावली, राजवंश और देव-अवतार संबंधी आख्यान भारतीय पुराणों के प्रमुख विषय रहे हैं। हरिवंश में इन तत्वों का पर्याप्त विस्तार दिखाई देता है।

इस कारण इसे केवल महाभारत का अतिरिक्त आख्यान मानना भी पर्याप्त नहीं होगा।

इसे महाकाव्यीय और पुराणीय परंपराओं के बीच स्थित एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में देखा जा सकता है।

यहाँ से कृष्ण की कथा एक नए सांस्कृतिक आयाम में प्रवेश करती है। महाभारत में कृष्ण धर्म और राजनीति के केंद्र में हैं; हरिवंश में उनके जन्म, वंश और दिव्य स्वरूप के आख्यान उन्हें एक व्यापक पौराणिक संदर्भ में स्थापित करते हैं।

‘पुराण’ कहे जाने का प्रश्न

कालांतर में हरिवंश को हरिवंशपुराण के नाम से भी जाना गया। यह नामकरण अपने भीतर एक सांस्कृतिक परिवर्तन का संकेत देता है।

‘पुराण’ शब्द का अर्थ केवल “पुरानी कथा” नहीं है। भारतीय परंपरा में पुराण ऐसी साहित्यिक-सांस्कृतिक विधा है जिसमें सृष्टि, देवता, वंश, धर्म, आख्यान, भूगोल, तीर्थ और लोक-स्मृति अनेक स्तरों पर एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

हरिवंश में इन तत्वों की उपस्थिति इसे पुराणीय चेतना से जोड़ती है।

इसलिए ‘हरिवंश’ से ‘हरिवंशपुराण’ की यात्रा को केवल नाम में वृद्धि के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह संभवतः उस सांस्कृतिक पहचान के विस्तार का संकेत है जिसके अंतर्गत ग्रंथ को बाद की परंपरा ने देखा और संरक्षित किया।

कृष्ण-कथा के विकास में हरिवंश का स्थान

कृष्ण भारतीय संस्कृति के उन व्यक्तित्वों में हैं जिनकी कथा एक ही ग्रंथ में समाप्त नहीं होती। महाभारत के कृष्ण, हरिवंश के कृष्ण, विष्णुपुराण के कृष्ण, भागवतपुराण के कृष्ण और बाद की भक्ति-परंपराओं के कृष्ण में अनेक समानताएँ हैं, लेकिन उनके चित्रण और धार्मिक अर्थ में महत्वपूर्ण अंतर भी दिखाई देते हैं।

इसलिए हरिवंश का अध्ययन करते समय बाद की कृष्ण-परंपराओं को सीधे उसके मूल पाठ में आरोपित करना उचित नहीं होगा।

विशेष रूप से यह समझना आवश्यक है कि—

हरिवंश का कृष्ण बाद की प्रत्येक कृष्ण-कथा का पूर्ण प्रतिनिधि नहीं है।

बल्कि हरिवंश कृष्ण-चेतना के विकास की एक महत्वपूर्ण अवस्था को सुरक्षित रखता है।

यही बात इस ग्रंथ को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है।

हरिवंश : स्मृति, वंश और चेतना का ग्रंथ

यदि पूरे प्रश्न को एक व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो हरिवंश तीन स्तरों को जोड़ता दिखाई देता है—

वंश की स्मृति — कृष्ण कहाँ से आते हैं?

जीवन का आख्यान — कृष्ण क्या करते हैं?

दिव्यता की चेतना — कृष्ण का व्यापक सांस्कृतिक और धार्मिक अर्थ क्या बनता है?

इन तीनों के बीच ही हरिवंश का वास्तविक महत्व निहित है।

यह ग्रंथ केवल अतीत की कथा सुरक्षित नहीं रखता; वह यह भी दिखाता है कि भारतीय समाज ने अपने नायकों, देवताओं, वंशों और सांस्कृतिक स्मृतियों को किस प्रकार कथा के माध्यम से संरक्षित किया।

शोध की दृष्टि से हरिवंश

इस शोधग्रंथ में इसलिए हरिवंश को न तो केवल आस्था का विषय माना जाएगा और न केवल ऐतिहासिक दस्तावेज।

इसे तीनों स्तरों पर पढ़ना आवश्यक होगा—

पाठ के रूप में, ताकि यह जाना जा सके कि वास्तव में क्या लिखा है।

परंपरा के रूप में, ताकि यह समझा जा सके कि इसे किस प्रकार ग्रहण किया गया।

सांस्कृतिक दस्तावेज के रूप में, ताकि यह देखा जा सके कि भारतीय समाज की स्मृति और कृष्ण की अवधारणा इसके भीतर किस प्रकार विकसित होती है।

इस दृष्टि से हरिवंश का अध्ययन हमें केवल कृष्ण तक नहीं ले जाता; वह हमें भारतीय सांस्कृतिक स्मृति के निर्माण की प्रक्रिया तक ले जाता है।

निष्कर्ष

हरिवंश को केवल “कृष्ण की कथा” कहना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित कर देता है और केवल “महाभारत का परिशिष्ट” कहना उसके स्वतंत्र सांस्कृतिक महत्व को कम कर देता है।

अधिक व्यापक दृष्टि से कहा जा सकता है कि—

हरिवंश महाभारत और पुराण-परंपरा के बीच स्थित ऐसा ग्रंथ है जिसमें वंश, इतिहास-स्मृति, आख्यान, धर्म और कृष्ण-चेतना एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

महाभारत हमें उस कृष्ण के सामने ले जाता है जो धर्म और मानव-संकट के बीच खड़ा है; हरिवंश हमें उस कृष्ण की ओर वापस ले जाता है जिसकी जड़ें वंश, जन्म, परिवार, समाज और सांस्कृतिक स्मृति में हैं।

और यहीं से हरिवंश का वास्तविक शोध आरंभ होता है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है