महाभारत — मौसलपर्व - भाग ७ : अर्जुन का आगमन और द्वारका का अंत

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ७ : अर्जुन का आगमन और द्वारका का अंत

कृष्ण के प्रस्थान के बाद द्वारका में अब कोई निर्णय लेने वाला नहीं था।

दारुक हस्तिनापुर पहुँच चुका था और उसने अर्जुन को यादवों के विनाश, बलराम के प्रस्थान और कृष्ण की अंतिम अवस्था का समाचार दिया। यह समाचार अर्जुन के लिए केवल किसी प्रिय मित्र के खोने का समाचार नहीं था। उसके सामने कुरुक्षेत्र का वह समूचा संसार अचानक बदल गया था जिसमें कृष्ण उसके सारथी, मार्गदर्शक और मित्र के रूप में उपस्थित थे।

अर्जुन तुरंत द्वारका की ओर चला।

जिस कृष्ण के साथ उसने जीवन के सबसे निर्णायक क्षण बाँटे थे, अब उसी कृष्ण से उसका अंतिम मिलन भी नहीं हो सकता था।

द्वारका पहुँचने पर अर्जुन ने जो देखा, वह किसी विजयी नगर का दृश्य नहीं था। यादवों का महान वंश अपने ही संघर्ष में समाप्त हो चुका था। राजमहल, समुद्र और नगर की गलियाँ थीं, लेकिन उनके भीतर वह जीवन नहीं था जो कभी द्वारका की पहचान था।

अर्जुन ने कृष्ण के अंतिम संस्कार का कार्य पूरा किया। बलराम और यादवों के मृत शरीरों का भी संस्कार कराया गया। अब उसके सामने अगला दायित्व था—बचे हुए लोगों को सुरक्षित निकालना।

कृष्ण पहले ही संकेत दे चुके थे कि द्वारका अधिक समय तक समुद्र से सुरक्षित नहीं रहेगी।

अर्जुन ने शेष यादव स्त्रियों, बच्चों और वृद्धों को अपने संरक्षण में लिया और उन्हें द्वारका से बाहर ले चलने की तैयारी की।

यहाँ कथा का स्वर फिर बदलता है।

कुरुक्षेत्र में अर्जुन के हाथ में गांडीव था और उसके पीछे कृष्ण का मार्गदर्शन। उस समय उसकी शक्ति को किसी बाहरी सहायता की आवश्यकता दिखाई नहीं देती थी, क्योंकि उसके साथ वह चेतना थी जो उसके संशय को निर्णय में बदल देती थी।

अब वही अर्जुन अकेला था। कृष्ण नहीं थे।

और शीघ्र ही उसे अपने भीतर और बाहर के इस परिवर्तन का अनुभव होने वाला था।

द्वारका से लोगों का समूह निकल पड़ा। समुद्र के किनारे स्थित उस नगर को पीछे छोड़ते हुए अर्जुन आगे बढ़ रहा था। उसके साथ वे लोग थे जो यादव-विनाश के बाद किसी प्रकार जीवित बचे थे।

लेकिन यात्रा अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि मार्ग में आक्रमणकारी समूहों ने उन्हें घेर लिया।

अर्जुन ने उन्हें रोकने का प्रयास किया।

उसके हाथ में गांडीव था। उसके पास वही युद्ध-कौशल था जिसने कुरुक्षेत्र में असंख्य योद्धाओं को परास्त किया था।

लेकिन इस बार परिस्थिति अलग थी।

महाभारत का यह प्रसंग अत्यंत मार्मिक है—अर्जुन को अनुभव होता है कि उसका धनुर्विद्या-कौशल पहले जैसा प्रभावी नहीं रह गया। उसके बाण अपेक्षित शक्ति से नहीं चल रहे थे, और उसके दिव्यास्त्रों का स्मरण भी पहले की तरह सहज नहीं हो रहा था।

वह उन लोगों की पूरी रक्षा नहीं कर सका जिन्हें कृष्ण ने उसके संरक्षण में सौंपा था।

यह घटना केवल अर्जुन की व्यक्तिगत असफलता के रूप में नहीं आती।

महाभारत इसके माध्यम से एक बड़े परिवर्तन को दिखाता है।

कुरुक्षेत्र के अर्जुन और कृष्ण-विहीन अर्जुन के बीच अंतर उसके शरीर या शस्त्र में नहीं, परिस्थिति के बदल जाने में था।

महाभारत के युद्ध में अर्जुन की शक्ति उसके अपने पराक्रम से बनी थी, लेकिन उसका निर्णायक आयाम कृष्ण की उपस्थिति से जुड़ा हुआ था। कृष्ण के चले जाने के बाद अर्जुन को पहली बार उस शक्ति-विन्यास का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ जिसमें उसका पुराना सामर्थ्य अब उसी रूप में उपलब्ध नहीं था।

यहाँ एक महत्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्न उठता है— क्या शक्ति केवल व्यक्ति के भीतर होती है?

या शक्ति व्यक्ति, परिस्थिति, साधन, संबंध और चेतना के समन्वय से प्रकट होती है?

अर्जुन का प्रसंग इस प्रश्न को किसी उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि एक घटना के रूप में सामने रखता है।

जिस गांडीव ने कभी भीषण युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई थी, वही अब परिस्थितियों को नियंत्रित करने में पर्याप्त नहीं था।

यह परिवर्तन उस महाभारत का अंतिम मनोवैज्ञानिक बिंदु भी है जिसने मनुष्य को बार-बार यह दिखाया कि कोई भी सामर्थ्य शाश्वत नहीं है।

कुरुक्षेत्र में अर्जुन ने कृष्ण से ज्ञान पाया था।

अब द्वारका के पतन में उसे उस ज्ञान के एक दूसरे पक्ष का सामना करना था—आश्रय बदलते ही शक्ति की अनुभूति भी बदल जाती है।

अंततः बचे हुए लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाया गया। यादव वंश की अगली पीढ़ी के लिए वज्र को इन्द्रप्रस्थ में स्थापित किया गया। द्वारका पीछे छूट गई।

और फिर वह हुआ जिसकी सूचना कृष्ण पहले दे चुके थे।

समुद्र आगे बढ़ा।

द्वारका, जिसने कभी समुद्र के किनारे अपनी भव्यता के साथ यदुवंश की शक्ति का प्रतीक बनकर खड़ी रही थी, धीरे-धीरे जल में समा गई।

महाभारत की दृष्टि से यह केवल एक नगर का डूबना नहीं था।

जिस वंश का विनाश भीतर से शुरू हुआ था, उसका बाहरी केंद्र भी अब प्रकृति के सामने टिक नहीं सका।

मानव-सत्ता का अंत और प्रकृति की निरपेक्ष गति—दोनों एक ही दृश्य में दिखाई देते हैं।

द्वारका का डूबना इसलिए मौसलपर्व की कथा को एक गहरी पूर्णता देता है।

यादवों का अंत युद्धभूमि में नहीं हुआ था। उनका अंत उनके भीतर पैदा हुए संघर्ष से हुआ।

और उनका नगर किसी शत्रु की विजय से नहीं, समुद्र की गति से समाप्त हुआ।

अब अर्जुन के पास लौटने के लिए केवल हस्तिनापुर था।

लेकिन वह अर्जुन जो वहाँ लौटेगा, वह कुरुक्षेत्र से लौटने वाला अर्जुन नहीं होगा।

उसने कृष्ण को खो दिया था। उसने यादवों का अंत देखा था।

उसने अपनी शक्ति के क्षीण होने का अनुभव किया था।

और उसके सामने अब एक और अंतिम प्रश्न खड़ा था—

यदि कृष्ण चले गए, यादव समाप्त हो गए और द्वारका भी समुद्र में विलीन हो गई, तो क्या अब पांडवों के लिए भी उनके पृथ्वी-जीवन की भूमिका समाप्त हो चुकी है?

मौसलपर्व अब अपने अंतिम मोड़ की ओर बढ़ रहा था।


मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है