हरिवंशपुराण — भाग ३४ -बाणासुर-संग्राम : सहस्र भुजाओं का अभिमान

 हरिवंशपुराण — भाग ३४ -बाणासुर-संग्राम : सहस्र भुजाओं का अभिमान

शक्ति, मर्यादा और भक्तिरक्षा का निर्णायक प्रसंग

श्रीकृष्ण और बाणासुर की सेनाओं के बीच युद्ध तीव्र हो उठा। बाणासुर को अपनी सहस्र भुजाओं और युद्ध-कौशल पर गर्व था। भगवान शिव उसकी रक्षा के लिए उपस्थित थे, जबकि श्रीकृष्ण अनिरुद्ध को मुक्त कराने के उद्देश्य से युद्ध कर रहे थे।

इस संघर्ष में दोनों पक्षों की शक्ति का प्रदर्शन हुआ। बाणासुर ने अपनी सामर्थ्य के बल पर यादव सेना को चुनौती दी, लेकिन श्रीकृष्ण ने धैर्य और युद्ध-कौशल से उसका सामना किया।

कथा का केंद्र केवल युद्ध की विजय नहीं, बल्कि बाणासुर के उस अभिमान का परिणाम भी है जिसने उषा और अनिरुद्ध के संबंध को समझने के बजाय उसे बलपूर्वक रोकना चाहा। उसकी विशाल शक्ति समस्या का समाधान नहीं कर सकी; उलटे उसी ने संकट को व्यापक बना दिया।

सहस्र भुजाओं का छेदन

बाणासुर ने श्रीकृष्ण को युद्ध की चुनौती दी। श्रीकृष्ण ने उसके अस्त्रों का सामना करते हुए उसका रथ और युद्ध-सामर्थ्य नष्ट कर दिया। फिर उन्होंने सुदर्शन चक्र उठाया और बाणासुर की सहस्र भुजाओं को काटना आरंभ किया।

बाणासुर की दशा देखकर भगवान शिव ने श्रीकृष्ण से उसे जीवनदान देने की प्रार्थना की। श्रीकृष्ण ने बाणासुर का वध नहीं किया, बल्कि उसकी सहस्र भुजाओं में से केवल दो शेष रखीं। इस प्रकार उसका अभिमान टूट गया और शिव को दिए गए संरक्षण का भी मान बना रहा।

पाठ-सार

श्रीकृष्ण ने बाणासुर की सहस्र भुजाएँ काटकर उसके अभिमान का अंत किया। भगवान शिव की प्रार्थना पर उसका जीवन सुरक्षित रहा।

मुकेश श्रीवास्तव आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र (इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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