महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग २ : गांडीव का त्याग और अंतिम यात्रा

महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग २ : गांडीव का त्याग और अंतिम यात्रा

हस्तिनापुर में पांडवों के महाप्रस्थान का निर्णय हो चुका था, लेकिन उससे पहले राज्य और वंश की व्यवस्था पूरी करना आवश्यक था।

युधिष्ठिर ने परीक्षित को हस्तिनापुर के सिंहासन पर स्थापित किया। वे अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र थे—कुरुवंश की उस अगली पीढ़ी के प्रतिनिधि, जिसके जन्म ने युद्ध के बाद वंश की निरंतरता बनाए रखी थी।

यादववंश की ओर से भी व्यवस्था की गई। वज्र को इन्द्रप्रस्थ का राजा बनाया गया। इस प्रकार पांडवों ने दोनों राजवंशों के भविष्य को अपने व्यक्तिगत जीवन से अलग कर दिया।

राज्य अब उनका नहीं था।

उन्होंने अपने धन, राजसी वस्त्र और आभूषण त्याग दिए। द्रौपदी उनके साथ थीं। धौम्य भी उनके साथ चले। पांडवों ने अग्नि को आगे रखते हुए अपनी अंतिम यात्रा आरम्भ की।

इसी समय एक महत्वपूर्ण घटना घटी।

अर्जुन के पास अब भी गांडीव धनुष और अक्षय तूणीर थे। यही वे दिव्य साधन थे जिनके साथ उन्होंने जीवन के असंख्य युद्ध लड़े थे। कुरुक्षेत्र की स्मृति अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।

तभी अग्निदेव का संबंध इस प्रसंग से जुड़ता है।

महाभारत की कथा के अनुसार अग्नि ने अर्जुन से कहा कि अब गांडीव और अक्षय तूणीरों को उनके मूल स्थान पर लौटाने का समय आ गया है। वरुण से प्राप्त गांडीव और दोनों अक्षय तूणीर अब अर्जुन के पास रहने के लिए आवश्यक नहीं थे।

अर्जुन ने इस बात को स्वीकार किया। 

वे समुद्र के समीप गए और गांडीव तथा अक्षय तूणीरों को जल में समर्पित कर दिया।

यह घटना अत्यंत महत्वपूर्ण है। अर्जुन ने केवल एक धनुष नहीं छोड़ा।

उन्होंने अपने योद्धा-स्वरूप का अंतिम बाहरी प्रतीक छोड़ दिया।

कुरुक्षेत्र में गांडीव उनका परिचय था। महाप्रस्थान में गांडीव का कोई प्रयोजन नहीं था।

अब उन्हें युद्ध नहीं करना था। किसी राज्य की रक्षा नहीं करनी थी। किसी शत्रु को परास्त नहीं करना था।

इसलिए वह शस्त्र, जो जीवन के एक चरण में धर्म-पालन का साधन था, अब त्याग का विषय बन गया।

महाप्रस्थान की यात्रा इसी बोध से आगे बढ़ी।

पांडव उत्तर दिशा की ओर चले। उनके आगे कोई सेना नहीं थी। पीछे हस्तिनापुर की सत्ता छूट चुकी थी।

द्रौपदी उनके साथ थीं।

पाँचों भाइयों के साथ वह कुत्ता भी चल रहा था, जो यात्रा के आरम्भ से उनके पीछे आ लगा था।

वे नगरों और बस्तियों से दूर होते गए। मार्ग कठिन होता गया। मैदान पीछे छूटे और पर्वतीय प्रदेश सामने आने लगे।

यात्रा के साथ शरीर पर भी उसका प्रभाव दिखाई देने लगा।

यह अब राजमार्ग की यात्रा नहीं थी। न रथ थे, न विश्राम के राजकीय साधन। पांडव पैदल आगे बढ़ रहे थे।

सबसे आगे युधिष्ठिर थे। उनके पीछे भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी क्रम से चल रहे थे। कुत्ता लगातार उनके साथ था।

हिमालय की दिशा में आगे बढ़ते हुए वे मेरु की ओर जाने वाले कठिन मार्ग पर पहुँचे।

यहीं से महाप्रस्थानिकपर्व का सबसे मार्मिक भाग आरम्भ होता है।

अचानक द्रौपदी लड़खड़ाईं। वह भूमि पर गिर पड़ीं।

भीमसेन ने युधिष्ठिर से पूछा कि द्रौपदी जैसी धर्मनिष्ठ स्त्री सबसे पहले क्यों गिर गईं।

युधिष्ठिर ने पीछे मुड़कर देखा, लेकिन वे रुके नहीं।

उन्होंने कहा कि द्रौपदी पाँचों पांडवों की पत्नी थीं, फिर भी उनके मन में अर्जुन के प्रति विशेष पक्षपात था। उसी सूक्ष्म पक्षपात के कारण उनका पतन हुआ।

यह उत्तर महाप्रस्थानिकपर्व की विशिष्ट शैली को सामने लाता है। अब किसी के कर्म का परिणाम युद्धभूमि में नहीं मिलता।

वह यात्रा के मार्ग में प्रकट होता है। द्रौपदी के गिरने के बाद पांडव आगे बढ़े।

कुछ ही समय बाद सहदेव भी गिर पड़े। भीम ने फिर प्रश्न किया।

युधिष्ठिर ने बताया कि सहदेव को अपनी बुद्धि और ज्ञान पर गर्व था। यही उसका दोष था।

फिर नकुल गिरे। उनके विषय में युधिष्ठिर ने कहा कि उन्हें अपने रूप और सौंदर्य पर गर्व था।

फिर अर्जुन गिरे। 

यह वही अर्जुन थे जिन्होंने कुरुक्षेत्र में गांडीव उठाया था, जिनकी धनुर्विद्या की तुलना किसी से नहीं की जाती थी। लेकिन महाप्रस्थान में उनके हाथ में गांडीव नहीं था।

भीम ने पूछा कि अर्जुन जैसे महान धनुर्धर क्यों गिरे।

युधिष्ठिर ने कहा कि अर्जुन को अपने पराक्रम पर गर्व था और उन्होंने कभी यह कहा था कि वे एक ही दिन में शत्रुओं का पूर्ण विनाश कर सकते हैं, पर उस प्रतिज्ञा को पूरा नहीं कर सके।

अब तीनों छोटे भाई और द्रौपदी पीछे रह चुके थे। युधिष्ठिर आगे बढ़ते रहे।

भीम अब उनके साथ थे। लेकिन शीघ्र ही भीम का शरीर भी थकने लगा।

उन्होंने युधिष्ठिर से पूछा— वे इतने बलशाली थे, धर्म के मार्ग पर चले थे, फिर उन्हें क्यों गिरना पड़ रहा है?

युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि भीम को अपने बल पर गर्व था और वे अपने भोजन तथा अपनी शक्ति को लेकर संयमहीन थे। और फिर भीम भी भूमि पर गिर पड़े।

अब उस विराट यात्रा में केवल दो जीवित प्राणी आगे बढ़ रहे थे— युधिष्ठिर और वह कुत्ता।

यह दृश्य महाभारत के पूरे युद्ध-युग का उलटा चित्र था।

कभी पाँचों पांडव, द्रौपदी, कृष्ण, सेना, रथ और अस्त्रों से घिरे हुए थे।

अब सब पीछे छूट चुके थे। अर्जुन का गांडीव समुद्र में लौट चुका था। द्रौपदी गिर चुकी थीं। सहदेव, नकुल और अर्जुन भी पीछे रह गए थे। भीम भी गिर चुके थे।

युधिष्ठिर फिर भी आगे बढ़ रहे थे।

उनके साथ केवल वह कुत्ता था जिसने आरम्भ से उनका साथ नहीं छोड़ा था।

लेकिन यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई थी।

आगे स्वर्ग का मार्ग था।

और उसी मार्ग पर इन्द्र का दिव्य रथ युधिष्ठिर के सामने आने वाला था।

वहीं महाप्रस्थानिकपर्व की कथा अपने सबसे निर्णायक प्रश्न तक पहुँचेगी—

क्या युधिष्ठिर उस रथ पर अकेले चढ़ेंगे, या उस जीव को भी साथ ले जाएँगे जिसने अंतिम यात्रा में उनका साथ नहीं छोड़ा?


मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

कथा में संवाद और दृश्य बढ़ाइएव्याख्यात्मक दोहराव संक्षिप्त कीजिएअगले भाग से संक्रमण सुधारिए

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