महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग ३ : युधिष्ठिर और स्वर्ग का रथ
महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग ३ : युधिष्ठिर और स्वर्ग का रथ
हिमालय की कठिन यात्रा अब अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी थी।
द्रौपदी और चारों भाई पीछे छूट चुके थे। युधिष्ठिर अकेले आगे बढ़ रहे थे। उनके साथ केवल वह कुत्ता था, जो हस्तिनापुर से निकलने के समय से ही उनके पीछे चलता आया था।
यह दृश्य महाभारत के पूर्ववर्ती समूचे इतिहास से बिल्कुल भिन्न था।
कभी युधिष्ठिर के साथ राजसत्ता थी, भाई थे, द्रौपदी थीं, सेना थी और कृष्ण का मार्गदर्शन था। अब उनके पास इनमें से कुछ भी नहीं था।
फिर भी वे चलते रहे।
उनके सामने हिमालय की ऊँचाइयाँ थीं। पीछे उनका सम्पूर्ण जीवन पड़ा था।
तभी आकाश में एक दिव्य प्रकाश दिखाई दिया। इन्द्र का रथ उनके सामने आकर रुका।
इन्द्र ने युधिष्ठिर को स्वर्ग चलने के लिए आमंत्रित किया।
युधिष्ठिर ने रथ की ओर देखा।
लेकिन उन्होंने तुरंत उस पर चढ़ने से इनकार नहीं किया और न ही उत्साह में अपने पीछे छूटे भाइयों और द्रौपदी को भूल गए। उन्होंने पूछा कि उनके भाई और द्रौपदी कहाँ हैं।
इन्द्र ने बताया कि वे अपने-अपने कर्मों के कारण मार्ग में गिर चुके हैं। उनका शरीर अब उनके साथ नहीं है, लेकिन उन्हें उनके कर्मानुसार प्राप्त होने वाला लोक मिल चुका है।
युधिष्ठिर ने फिर भी आगे बढ़ने की इच्छा तभी स्वीकार की जब उन्हें यह स्पष्ट हुआ कि उनके साथ चल रहा कुत्ता भी उनके साथ जा सकेगा।
इन्द्र ने कहा कि स्वर्ग में कुत्ते के लिए स्थान नहीं है। युधिष्ठिर ने रथ पर चढ़ने से मना कर दिया।
उन्होंने कहा कि जो जीव अंतिम समय तक उनका साथ देता आया है, उसे छोड़कर वे स्वर्ग प्राप्त नहीं करना चाहते।
यह प्रसंग महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण नैतिक प्रसंगों में से एक है।
युधिष्ठिर ने राज्य छोड़ा। भाइयों को पीछे छूटते देखा। द्रौपदी से भी वियोग स्वीकार किया।
लेकिन उस प्राणी को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए जिसने यात्रा के दौरान बिना किसी स्वार्थ के उनका साथ दिया था।
इन्द्र ने उन्हें पुनः समझाया कि स्वर्ग में शरीरधारी कुत्ते का प्रवेश संभव नहीं।
लेकिन युधिष्ठिर का निर्णय नहीं बदला।
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी शरणागत या आश्रित को छोड़कर प्राप्त किया गया सुख उन्हें स्वीकार नहीं है।
तभी वह कुत्ता अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुआ। वह धर्मदेव थे—युधिष्ठिर के दिव्य पिता।
उन्होंने युधिष्ठिर की परीक्षा ली थी।
जिस प्रकार पहले भी उनके जीवन में धर्म केवल शास्त्र के रूप में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में निर्णय के रूप में उपस्थित हुआ था, उसी प्रकार यहाँ भी परीक्षा किसी युद्ध से नहीं, बल्कि करुणा और निष्ठा से हुई।
धर्मदेव ने युधिष्ठिर की परीक्षा पूर्ण होने की घोषणा की। अब इन्द्र का रथ युधिष्ठिर को लेकर स्वर्ग की ओर बढ़ा।
लेकिन यहाँ भी कथा सीधी नहीं रहती।युधिष्ठिर ने स्वर्ग में प्रवेश किया तो उन्होंने अपने शत्रु दुर्योधन को वहाँ देखा।
यह दृश्य उनके लिए अस्वीकार्य था।
जिस दुर्योधन के कारण कुरुक्षेत्र का महाविनाश हुआ था, वही स्वर्ग में सम्मानित अवस्था में दिखाई दे रहे थे।
युधिष्ठिर ने पूछा—
यदि दुर्योधन यहाँ है, तो उनके भाई कहाँ हैं?
देवताओं ने उन्हें आगे चलने को कहा।
युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और द्रौपदी के बिना स्वर्ग के सुख को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
उन्हें एक दूसरे मार्ग पर ले जाया गया।
वहाँ वातावरण बिल्कुल बदल गया।
दुर्गंध, अंधकार, पीड़ा और करुण क्रंदन सुनाई देने लगे।
युधिष्ठिर को बताया गया कि उनके प्रियजन इसी स्थान पर हैं।
तभी उन्हें अपने भाइयों और द्रौपदी की आवाजें सुनाई दीं।
उन्होंने कहा कि यदि उनके प्रियजन यहाँ हैं तो वे भी यहीं रहेंगे।
युधिष्ठिर ने स्वर्ग लौटने से इनकार कर दिया। तभी इस दृश्य का रहस्य खुला। यह भी एक परीक्षा थी।
जो कुछ उन्होंने देखा था वह वास्तविक अंतिम स्थिति नहीं थी। देवताओं ने युधिष्ठिर की अंतिम परीक्षा के लिए यह दृश्य उपस्थित किया था। उनके भाइयों और द्रौपदी के वास्तविक स्वरूप को उनके कर्मानुसार दिव्य लोक प्राप्त हो चुका था।
युधिष्ठिर की परीक्षा इसलिए भी विशिष्ट थी कि उन्हें केवल अपने कर्मों का फल नहीं देखना था; उन्हें यह भी सिद्ध करना था कि वे सुख की प्राप्ति के लिए अपने प्रियजनों का त्याग नहीं करेंगे।
इस प्रकार महाप्रस्थानिकपर्व की यात्रा केवल हिमालय की यात्रा नहीं रही।
यह मनुष्य की बाहरी यात्रा से भीतर की परीक्षा तक पहुँच गई।
राजा ने राज्य छोड़ा। योद्धा ने शस्त्र छोड़ा। भाइयों ने शरीर छोड़े। युधिष्ठिर ने अकेलेपन को स्वीकार किया।
लेकिन उन्होंने अपने साथ चलने वाले जीव के प्रति निष्ठा नहीं छोड़ी।
यही वह बिंदु है जहाँ महाभारत का धर्म केवल नियम नहीं रह जाता।
वह आचरण में प्रकट निर्णय बन जाता है। युधिष्ठिर की यात्रा अब स्वर्ग के द्वार तक पहुँच चुकी थी।
लेकिन महाभारत की कथा अभी समाप्त नहीं हुई थी।
क्योंकि स्वर्ग में पहुँचने के बाद भी एक अंतिम प्रश्न शेष था—
क्या कुरुक्षेत्र के सभी पात्र अपने कर्मों से मुक्त होकर एक ही अंतिम सत्य में स्थित होंगे?
इसका उत्तर महाप्रस्थानिकपर्व के बाद आने वाले स्वर्गारोहणिकपर्व में मिलेगा।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
Comments
Post a Comment