महाभारत — मौसलपर्व - भाग ९ : अर्जुन, व्यास और काल का विधान

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ९ : अर्जुन, व्यास और काल का विधान

मौसलपर्व का अंतिम चरण द्वारका के डूबने पर समाप्त नहीं होता। कृष्ण, बलराम और यादवों के प्रस्थान के बाद भी अर्जुन की यात्रा शेष थी। उसे कृष्ण के परिवार के बचे हुए लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाना था और फिर अपने भीतर उठे उस प्रश्न का उत्तर खोजना था, जिसे वह स्वयं समझ नहीं पा रहा था—कृष्ण के रहते जो सामर्थ्य उसके भीतर थी, वह कृष्ण के जाने के बाद कहाँ चली गई?

अर्जुन सातवें दिन द्वारका से प्रस्थान करता है। उसके साथ यादव-वंश के बचे हुए स्त्री, बालक और वृद्ध थे। वह मृत यादव नायकों के अंतिम संस्कार और श्राद्ध का विधान पूरा कर चुका था। कृष्ण और बलराम के शरीरों का भी संस्कार कराया गया। वसुदेव का योग द्वारा देहत्याग और उनके अंतिम संस्कार का वर्णन भी इसी प्रसंग में आता है।

द्वारका से यह अंतिम यात्रा आरम्भ हुई।

तभी समुद्र ने उस नगर को अपने भीतर लेना शुरू किया।

महाभारत के वर्णन में यह क्रम महत्वपूर्ण है। अर्जुन और बचे हुए लोग नगर से निकल चुके थे; उसके बाद समुद्र ने द्वारका को घेर लिया। उसकी प्राचीरें, भवन, उद्यान और राजमार्ग जल में समा गए। जिस नगर में कभी यादव शक्ति का वैभव था, वह अब स्मृति बन गया।

लेकिन अर्जुन की कठिनाई यहीं समाप्त नहीं हुई।

यात्रा के मार्ग में लुटेरों के एक बड़े समूह ने उस काफिले पर आक्रमण कर दिया। अर्जुन ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। उसके पास गांडीव था, वही धनुष जिसने कुरुक्षेत्र में असंख्य योद्धाओं का सामना किया था।

पर इस बार परिस्थिति विचित्र थी।

अर्जुन गांडीव को कठिनाई से ही चढ़ा पाया। उसने अपने दिव्यास्त्रों का स्मरण करना चाहा, लेकिन वे उसके स्मरण में उसी प्रकार उपस्थित नहीं हुए जैसे पहले होते थे। उसके बाण भी समाप्त हो गए और वह उन सभी लोगों की रक्षा नहीं कर सका जिन्हें वह द्वारका से लेकर चला था। कुछ स्त्रियों और संपत्ति को आक्रमणकारी ले गए। अर्जुन ने इस घटना को अपने जीवन के सबसे बड़े आघातों में अनुभव किया।

यहाँ महाभारत एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखता है—सामर्थ्य का क्षय केवल शस्त्र के क्षय का नाम नहीं है।

अर्जुन के पास वही गांडीव था।

वही अर्जुन था।

उसका अनुभव भी वही था।

लेकिन समय बदल चुका था।

कृष्ण की उपस्थिति समाप्त हो चुकी थी और उस युग की भूमिका भी समाप्त हो रही थी।

अर्जुन अंततः बचे हुए लोगों को लेकर कुरुक्षेत्र पहुँचा। वहाँ यादव-वंश के विभिन्न समूहों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएँ की गईं। वज्र को यादवों की शेष राजपरंपरा का उत्तराधिकारी बनाया गया। इस प्रकार वंश की राजनीतिक निरंतरता का एक सूत्र बचा रहा, भले ही द्वारका और उसका पुराना यादव-संघटन समाप्त हो चुका था।

लेकिन अर्जुन के भीतर शांति नहीं थी।

वह हस्तिनापुर जाने से पहले महर्षि व्यास के आश्रम पहुँचा।

व्यास ने अर्जुन के मुख पर वह परिवर्तन देखा जो किसी युद्ध में पराजित व्यक्ति के मुख पर दिखाई देता है। लेकिन अर्जुन किसी शत्रु से पराजित होकर नहीं आया था। वह अपने ही सामर्थ्य के बदल जाने से व्यथित था।

उसने कृष्ण के देहावसान की कथा सुनाई। उसने यादवों के विनाश का वर्णन किया।

उसने बताया कि किस प्रकार वे वीर, जिन्होंने कुरुक्षेत्र जैसे युद्धों का सामना किया था, एरका-घास से बने लौह-सदृश प्रहारों से एक-दूसरे के हाथों मारे गए।

फिर उसने अपने साथ हुई घटना बताई—वही अर्जुन, वही गांडीव, लेकिन न वे दिव्यास्त्र स्मरण में आए और न पुरानी शक्ति उसी प्रकार प्रकट हुई।

अर्जुन का प्रश्न केवल व्यक्तिगत नहीं था। यदि कृष्ण नहीं हैं तो अर्जुन कौन है?

यदि दिव्यास्त्र साथ नहीं हैं तो उसका गांडीव क्या है?

यदि विजय की परिस्थितियाँ समाप्त हो गईं तो क्या पुरानी विजय का सामर्थ्य भी उसी रूप में बना रह सकता है?

व्यास का उत्तर मौसलपर्व का वास्तविक दार्शनिक निष्कर्ष बन जाता है।

वे अर्जुन को बताते हैं कि काल ही इन परिवर्तनों का मूल है। समृद्धि के समय बुद्धि, शक्ति, पराक्रम और दूरदृष्टि मनुष्य में प्रकट होते हैं; विपरीत काल आने पर वही शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। अर्जुन के अस्त्रों ने अपना कार्य पूरा कर लिया था और अब उनके लौट जाने का समय था। व्यास अर्जुन को यह भी बताते हैं कि अब पांडवों के लिए संसार से अपने प्रस्थान का समय निकट है।

यह उत्तर महाभारत की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

व्यास अर्जुन की पराजय को उसकी व्यक्तिगत कमजोरी नहीं बताते।

वे उसे काल-परिवर्तन के व्यापक नियम में रखते हैं।

जिस शक्ति की आवश्यकता थी, वह समय के साथ प्रकट हुई।

जिस शक्ति का कार्य पूरा हुआ, वह समय के साथ वापस चली गई।

इस दृष्टि से कृष्ण का प्रस्थान केवल एक महान व्यक्ति की मृत्यु नहीं है। उसके साथ एक युग की संरचना भी समाप्त होती है।

अर्जुन व्यास की बात सुनकर हस्तिनापुर लौटता है और युधिष्ठिर को द्वारका तथा यादवों के विनाश की पूरी कथा सुनाता है। यहीं मौसलपर्व समाप्त होता है। मूल पाठ का अंतिम खंड भी अर्जुन और व्यास के इसी संवाद तथा अर्जुन के हस्तिनापुर लौटने पर समाप्त होता है।

इसलिए मौसलपर्व का अंतिम बिंदु पांडवों का महाप्रस्थान नहीं है।

वह अगला चरण है।

मौसलपर्व का अपना अंतिम दृश्य है—
कृष्ण का प्रस्थान, यादवों का विनाश, द्वारका का समुद्र में विलय, अर्जुन की शक्ति का क्षय, व्यास का काल-सिद्धांत और हस्तिनापुर लौटता हुआ अर्जुन।

इसके बाद कथा स्वाभाविक रूप से महाप्रस्थानिकपर्व में प्रवेश करती है, जहाँ युधिष्ठिर और पांडव राज्य छोड़कर अंतिम यात्रा पर निकलते हैं। महाभारत की पर्व-सूची भी मौसलपर्व के बाद क्रमशः महाप्रस्थानिक और फिर स्वर्गारोहणिक पर्व को रखती है।

इस प्रकार मौसलपर्व का सार किसी एक विनाश में नहीं, बल्कि एक युग के पूर्ण हो जाने में है।

कृष्ण चले गए।

यादव चले गए।

द्वारका चली गई।

अर्जुन का पुराना सामर्थ्य चला गया।

और अब पांडवों के लिए भी समय अपने अंतिम निर्णय की ओर बढ़ रहा था।

मौसलपर्व यहीं पूर्ण होता है।

इसके बाद महाभारत युद्ध की कथा से आगे बढ़कर मनुष्य की अंतिम यात्रा की कथा कहेगा।


मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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