महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग १ : राज्य से महाप्रस्थान तक
महाभारत — महाप्रस्थानिकपर्व - भाग १ : राज्य से महाप्रस्थान तक
मौसलपर्व में एक युग का अंत हो चुका था।
कृष्ण पृथ्वी से विदा हो चुके थे। बलराम का भी प्रस्थान हो चुका था। यादवों का विनाश हो चुका था और समुद्र ने द्वारका को अपने भीतर समेट लिया था। अर्जुन हस्तिनापुर लौटकर व्यास से प्राप्त ज्ञान युधिष्ठिर को सुना चुके थे।
अब पांडवों के सामने कोई बाहरी संकट नहीं था।
लेकिन उनके भीतर एक निर्णय जन्म ले चुका था।
कुरुक्षेत्र के युद्ध को अनेक वर्ष बीत चुके थे। हस्तिनापुर में राज्य व्यवस्थित था। परीक्षित के लिए भविष्य सुरक्षित किया जा सकता था। पांडवों ने अपने जीवन का वह कार्य पूरा कर लिया था जिसके लिए उन्होंने वनवास सहा, अज्ञातवास बिताया और अंततः महायुद्ध लड़ा था।
अब प्रश्न राज्य प्राप्त करने का नहीं था।
प्रश्न था—प्राप्त राज्य से कब और कैसे निवृत्त हुआ जाए।
युधिष्ठिर ने अर्जुन से द्वारका और यादवों के अंत की पूरी कथा सुनी। कृष्ण के प्रस्थान ने उनके भीतर उस सत्य को और स्पष्ट कर दिया जिसे वे पहले से अनुभव कर रहे थे—समय किसी व्यक्ति, वंश या साम्राज्य के लिए स्थिर नहीं रहता।
जिस संसार में कृष्ण जैसे महापुरुष का भी पृथ्वी पर रहना स्थायी नहीं था, उसमें राजसत्ता को स्थायी मानकर बैठे रहना उनके लिए अर्थहीन हो गया था।
उन्होंने भाइयों और द्रौपदी के साथ विचार किया।
निर्णय हुआ कि अब राज्य परीक्षित को सौंप दिया जाए।
परीक्षित केवल उत्तराधिकारी नहीं थे। वे उस वंश की अगली कड़ी थे जिसने कुरुक्षेत्र के महाविनाश के बाद जीवन को आगे बढ़ाना था। पांडवों का दायित्व अब सत्ता को पकड़े रहना नहीं, बल्कि उसे योग्य उत्तराधिकारी को सौंपना था।
राज्याभिषेक की तैयारी हुई। परीक्षित को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया।
यादव वंश की शेष परंपरा के लिए भी व्यवस्था की गई। वज्र को इन्द्रप्रस्थ का अधिपति बनाया गया। इस प्रकार एक ओर कुरुवंश की नई पीढ़ी हस्तिनापुर में स्थापित हुई और दूसरी ओर यादववंश की बची हुई राजपरंपरा को भी संरक्षण मिला।
पांडवों ने अपने राजसी वस्त्र और आभूषण त्याग दिए। अब उनके शरीर पर राजचिह्न नहीं थे।
उनके पास कोई सेना नहीं थी। कोई रथ नहीं था। कोई विजय-अभियान नहीं था।
वे केवल उस यात्रा के लिए तैयार थे जिसका कोई राजनीतिक लक्ष्य नहीं था। द्रौपदी भी उनके साथ थीं।
पांडव हस्तिनापुर से बाहर निकले।
नगर के लोगों के लिए यह दृश्य अत्यंत असाधारण था। जिन पांडवों को उन्होंने कभी युद्धभूमि के विजेताओं के रूप में देखा था, वही अब राजसत्ता का त्याग करके साधारण वेश में आगे बढ़ रहे थे।
यहाँ महाभारत की कथा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है।
कुरुक्षेत्र तक मनुष्य का प्रश्न था— “मुझे क्या करना चाहिए?”
अब प्रश्न हो गया— “जो कुछ कर चुका हूँ, उसे किस प्रकार छोड़ूँ?”
यही महाप्रस्थानिकपर्व की मूल भूमि है।
पांडवों के लिए यह मृत्यु की खोज नहीं थी। यह जीवन के अंतिम दायित्वों से क्रमशः मुक्त होने की यात्रा थी।
वे उत्तर दिशा की ओर बढ़े।
उनके पीछे हस्तिनापुर था—राज्य, वैभव, संबंध और स्मृतियाँ। आगे पर्वत थे—ऊँचे, शांत और मानवीय सत्ता से निरपेक्ष। और उनके पीछे-पीछे एक कुत्ता भी चल पड़ा।
पांडवों ने उसे भगाया नहीं। वह उनके साथ चलता रहा।
महाभारत ने इस छोटे-से प्रसंग को आरम्भ में कोई विशेष व्याख्या नहीं दी। लेकिन आगे चलकर यही कुत्ता इस अंतिम यात्रा के सबसे गहरे प्रतीकों में से एक बनने वाला था।
इस यात्रा में अब कोई कृष्ण नहीं थे जो सारथी बनकर मार्ग दिखाएँ। कोई व्यास तत्काल उत्तर देने के लिए सामने नहीं थे। कोई युद्ध नहीं था जिसमें विजय प्राप्त करनी थी।
अब प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के साथ स्वयं चलना था।
पांडवों की यह यात्रा इसलिए महाभारत के पूर्ववर्ती युद्ध-प्रसंगों से बिल्कुल अलग है।
कुरुक्षेत्र में पाँचों भाई एक उद्देश्य से साथ थे।
अब वे एक ही मार्ग पर चल रहे थे, लेकिन आगे चलकर प्रत्येक को अपने कर्म और अपने जीवन के भार का सामना स्वयं करना होगा।
महाप्रस्थानिकपर्व इसी यात्रा का क्रमिक उद्घाटन है।
राजा पीछे छूट गया। योद्धा पीछे छूट गया। विजेता पीछे छूट गया। अब केवल मनुष्य यात्रा पर था।
और हिमालय की ओर बढ़ते हुए पांडवों के सामने महाभारत का अंतिम प्रश्न धीरे-धीरे आकार लेने लगा—
मनुष्य जब सब कुछ छोड़ देता है, तब अंत में उसके साथ क्या रह जाता है?
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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