मेरी तड़पती रूह पाओगे इन ख़लाओं में,
मेरी तड़पती रूह पाओगे इन ख़लाओं में,
सुनोगे सिसकते साज़ तुम हर दिशाओं में
झुलस जाओगे जो निकलोगे घर से, तुम
घुल गया है, तेज़ाब शहर की फ़ज़ाओं में
मुकेश इलाहाबादी -------------------------
स्वागत है "एक बोर आदमी" में। यह केवल एक ब्लॉग नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रही उस यात्रा का दस्तावेज़ है जहाँ वह स्वयं से प्रश्न करता है — मैं कौन हूँ? जीवन का अर्थ क्या है? चेतना क्या है? और इस विशाल अस्तित्व में मनुष्य की भूमिका क्या है? इस मंच पर साहित्य, दर्शन, वेदांत, ज्योतिष, मनोविज्ञान और जीवन अनुभवों के माध्यम से उन प्रश्नों को समझने का प्रयास किया गया है जो हर संवेदनशील मनुष्य के भीतर कभी न कभी उठते हैं। — मुकेश इलाहाबादी
Comments
Post a Comment