हरिवंशपुराण — भाग ४५ - वपुष्टमा और इन्द्र :
हरिवंशपुराण — भाग ४५ - वपुष्टमा और इन्द्र :
काम, मर्यादा तथा जनमेजय के क्रोध का प्रसंग
भविष्यपर्व का यह प्रसंग कथा को सामाजिक और दार्शनिक विचारों से आगे बढ़ाकर देवताओं, राजधर्म और मानवीय भावनाओं के जटिल संबंधों तक ले जाता है। मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद में यह प्रसंग भविष्यपर्व के पाँचवें अध्याय से जुड़ा है। विभिन्न संस्करणों में अध्याय-संख्या और पाठ-विभाजन अलग मिल सकते हैं।
जनमेजय का यज्ञ और वपुष्टमा का प्रसंग
राजा जनमेजय के अश्वमेध यज्ञ का वर्णन केवल राजकीय वैभव का आख्यान नहीं है। यज्ञ के माध्यम से राजा अपनी प्रतिष्ठा, सामर्थ्य और सार्वभौम सत्ता की पुष्टि करना चाहता है। किंतु इसी राजकीय अनुष्ठान के बीच ऐसा प्रसंग उपस्थित होता है जो राजा के मन में क्रोध और प्रतिशोध की तीव्र भावना जगा देता है।
इस कथा में वपुष्टमा का उल्लेख आता है। वह जनमेजय की पत्नी है। इन्द्र उससे संबंधित प्रसंग में आते हैं और उनकी कामना के कारण ऐसी परिस्थिति बनती है, जो राजा के सम्मान तथा दाम्पत्य-मर्यादा के प्रश्न को सामने लाती है।
इस आख्यान को पढ़ते समय ध्यान रखना चाहिए कि पुराणों में देवताओं का चरित्र हर प्रसंग में एक-सा आदर्श रूप नहीं रखता। कभी वे धर्म की रक्षा करते हैं, तो कभी उनकी इच्छाएँ, दुर्बलताएँ और उनके कर्मों के परिणाम कथा का विषय बनते हैं। इसलिए इन्द्र के देवत्व को उनके प्रत्येक कर्म का स्वतः समर्थन मान लेना उचित नहीं होगा।
यज्ञ में विघ्न और राजा का आक्रोश
जनमेजय ने विधिपूर्वक अश्वमेध यज्ञ आरंभ किया। यज्ञ में पुरोहितों के साथ अनेक विद्वान और राजा उपस्थित थे। वपुष्टमा भी शास्त्रीय विधि के अनुसार यज्ञ के अनुष्ठान में सम्मिलित हुईं।
इसी अवसर पर देवराज इन्द्र ने अपनी माया का प्रयोग किया। कथा के अनुसार, वे मरे हुए यज्ञीय अश्व के शरीर में प्रविष्ट हुए और वपुष्टमा के प्रति आकर्षित हुए। इन्द्र की इस लीला से अश्व के संबंध में ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि जनमेजय को संदेह हुआ कि यज्ञीय अश्व वास्तव में मारा ही नहीं गया है। उन्होंने पुरोहित से उसे फिर से मारने के लिए कहा।
जब पुरोहित को इन्द्र के हस्तक्षेप का पता चला, तो उन्होंने देवराज को शाप दे दिया। यज्ञ में विघ्न पड़ने से जनमेजय भी अत्यंत क्रुद्ध हो उठे।
राजा ने कहा कि यदि तपस्या, प्रजापालन और यज्ञ से प्राप्त उनके पुण्य का कोई महत्त्व है, तो वे घोषणा करते हैं कि अब क्षत्रिय अश्वमेध यज्ञ के माध्यम से चंचलचित्त इन्द्र की उपासना नहीं करेंगे।
यह घोषणा केवल धार्मिक आक्रोश नहीं थी। राजा को लगा कि उनके यज्ञ, प्रतिष्ठा और राजकीय गौरव को जानबूझकर चोट पहुँचाई गई है। इसी भावना में उन्होंने उन पुरोहितों को भी दोषी ठहराया जो यज्ञ संपन्न करा रहे थे। उन्होंने उन्हें अपने राज्य से चले जाने का आदेश दे दिया।
यहाँ कथा एक गंभीर स्थिति प्रस्तुत करती है—जब किसी बड़े अनुष्ठान में विघ्न आता है, तब क्या उसके लिए उत्तरदायी व्यक्ति की जाँच की जाती है, या क्रोध में निर्दोष लोगों को भी दंडित कर दिया जाता है?
जनमेजय का आचरण इस प्रश्न को खुला छोड़ता है, पर आगे आने वाला प्रसंग बताता है कि क्रोध के आवेश में लिया गया निर्णय स्वयं राजा के लिए भी संकट पैदा कर सकता है।
वपुष्टमा को दोषी ठहराना
यज्ञ में विघ्न पड़ने के बाद जनमेजय का क्रोध अपनी पत्नी की ओर मुड़ गया। उन्होंने वपुष्टमा को अपवित्र आचरण का दोषी मान लिया और उन्हें राजमहल से निकाल देने का आदेश दिया।
राजा को प्रतीत हुआ कि उनकी पत्नी के कारण उनकी प्रतिष्ठा नष्ट हुई है। वे अपने अपमान और यज्ञ की विफलता को एक ही घटना के परिणाम के रूप में देखने लगे। उनके मन में यह विचार दृढ़ हो गया कि वपुष्टमा के साथ रहना उनके राजकीय गौरव के अनुकूल नहीं है।
परंतु इस निर्णय में एक बड़ी समस्या थी—राजा ने परिस्थिति का पूरा सत्य जाने बिना अपनी पत्नी को दोषी ठहरा दिया था।
वपुष्टमा की ओर से जानबूझकर कोई अनुचित कर्म किए जाने का प्रमाण कथा में नहीं दिया गया। इसके विपरीत, आगे आने वाला गंधर्व विश्वावसु का कथन स्पष्ट करता है कि वपुष्टमा निर्दोष थीं और इन्द्र ने अपनी माया से यह परिस्थिति उत्पन्न की थी।
इस बिंदु पर कथा का ध्यान इन्द्र के आचरण से हटकर जनमेजय के निर्णय पर जाता है। इन्द्र ने यज्ञ में विघ्न उत्पन्न किया, लेकिन राजा ने अपनी पीड़ा और क्रोध के कारण उस स्त्री को दंडित करना चाहा, जिसका अपराध सिद्ध ही नहीं हुआ था।
किसी घटना से अपमानित अनुभव करना और किसी व्यक्ति का दोषी होना—ये दो अलग बातें हैं। जनमेजय का संकट यही था कि वे इन दोनों के बीच भेद नहीं कर पा रहे थे।
विश्वावसु का आगमन और सत्य का उद्घाटन
जब जनमेजय क्रोध में अपनी पत्नी को त्यागने पर आमादा थे, तब गंधर्व विश्वावसु ने उन्हें समझाया।
विश्वावसु ने राजा को बताया कि वपुष्टमा निर्दोष हैं। वे काशी के राजा की पुत्री हैं और पूर्वजन्म में अप्सरा रम्भा थीं। इन्द्र ने उन्हें रम्भा समझकर अथवा अपनी माया के प्रभाव में यह लीला की थी। इसलिए वपुष्टमा को उस घटना के लिए दंडित करना न्यायसंगत नहीं होगा।
विश्वावसु ने जनमेजय के सामने इस घटना का दूसरा पक्ष रखा। उनके अनुसार, राजा ने अनेक यज्ञ किए थे और उनकी धार्मिक प्रतिष्ठा बढ़ रही थी। इन्द्र को आशंका हुई कि जनमेजय के यज्ञों का फल और उनकी प्रतिष्ठा कहीं देवताओं के राजा के गौरव को चुनौती न देने लगे। इसी ईर्ष्या और भय से प्रेरित होकर इन्द्र ने यज्ञ में बाधा डाली।
यह विश्वावसु की व्याख्या है—कथा के भीतर प्रस्तुत कारण, जिसे उसी रूप में समझना चाहिए। इसका महत्त्व इस बात में है कि वह घटना को केवल दाम्पत्य-विवाद नहीं मानता, बल्कि देवताओं के बीच प्रतिष्ठा और शक्ति की प्रतिस्पर्धा से जोड़ता है।
विश्वावसु ने जनमेजय को समझाया कि इन्द्र जैसे शक्तिशाली देवता ने अपनी माया से यह भ्रम उत्पन्न किया था। राजा ने बिना सत्य जाने पुरोहितों को शाप दिया और उन्हें राज्य से निकाल दिया। अब यदि वे वपुष्टमा को भी त्याग देंगे, तो उनके निर्णयों से निर्दोष लोगों को ही हानि पहुँचेगी।
विश्वावसु की बातों से स्पष्ट होता है कि संकट की घड़ी में केवल क्रोध की तीव्रता पर्याप्त नहीं होती। आवश्यक है कि व्यक्ति घटना के कारणों को समझे, प्रमाणों पर विचार करे और फिर निर्णय ले।
दैव और पुरुषार्थ : क्या भाग्य को बदला नहीं जा सकता?
विश्वावसु जनमेजय को एक और महत्त्वपूर्ण बात समझाते हैं। वे कहते हैं कि दैव या नियति को जीतना अत्यंत कठिन है। प्रतिकूल भाग्य का सामना उस व्यक्ति के समान है जो विपरीत दिशा में बहती धारा को पार करने का प्रयत्न करता है।
इस कथन को भाग्यवाद का सरल समर्थन मान लेना उचित नहीं होगा। कथा का तत्काल उद्देश्य जनमेजय को उस घटना के लिए स्वयं को और निर्दोष लोगों को दोषी ठहराने से रोकना है, जिसका वास्तविक कारण उनकी समझ से बाहर था।
विश्वावसु उन्हें समझाते हैं कि इस घटना में वपुष्टमा का अपराध नहीं है। पुरोहितों ने भी इन्द्र की माया उत्पन्न नहीं की थी। इसलिए राजा को अपने क्रोध में सभी को दोषी ठहराने के बजाय शांत होकर परिस्थिति को स्वीकार करना चाहिए।
यहाँ एक दार्शनिक प्रश्न सामने आता है—जब मनुष्य के नियंत्रण से बाहर कोई घटना घटती है, तब उसे क्या करना चाहिए?
एक दृष्टि कहती है कि प्रत्येक घटना को भाग्य मानकर निष्क्रिय हो जाना चाहिए। दूसरी दृष्टि यह है कि मनुष्य को अपने नियंत्रण में आने वाले कर्मों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए और जो उसके नियंत्रण में नहीं है, उसके प्रति विवेकपूर्ण धैर्य रखना चाहिए।
विश्वावसु का उपदेश तत्कालीन प्रसंग में दूसरी दिशा की ओर संकेत करता है। जनमेजय इन्द्र के आचरण को बदल नहीं सकते थे, लेकिन वे अपनी प्रतिक्रिया बदल सकते थे। वे निर्दोष पत्नी को त्यागने, पुरोहितों को दंडित करने और अपने राज्य में वैमनस्य फैलाने से बच सकते थे।
इस प्रकार नियति की चर्चा राजा को कर्महीन बनाने के लिए नहीं, बल्कि अनियंत्रित क्रोध से बचाने के लिए प्रयुक्त होती है।
निर्दोष स्त्री का सम्मान और दाम्पत्य की मर्यादा
विश्वावसु वपुष्टमा के विषय में स्पष्ट कहते हैं कि राजा को अपनी निर्दोष पत्नी का त्याग नहीं करना चाहिए। वे उन्हें एक मूल्यवान रत्न के समान मानकर सम्मान देने और उनके साथ जीवन बिताने की सलाह देते हैं।
प्राचीन ग्रंथ की भाषा और सामाजिक धारणाएँ अपने समय की हैं। फिर भी इस प्रसंग का एक व्यापक नैतिक पक्ष सामने आता है—यदि किसी स्त्री पर आरोप लगाया गया हो, तो केवल संदेह के आधार पर उसे दोषी ठहराना न्याय नहीं है।
विश्वावसु का तर्क है कि वपुष्टमा का चरित्र दोषपूर्ण नहीं है और वे किसी अपराध की भागी नहीं हैं। इसलिए उनके साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार नहीं होना चाहिए।
यहाँ कथा केवल पति-पत्नी के संबंध की रक्षा नहीं करती, बल्कि निर्णय में प्रमाण और निष्पक्षता की आवश्यकता भी सामने लाती है। राजा का पद उसे अधिक अधिकार देता है, पर उसी के साथ उसके निर्णयों की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।
जनमेजय यदि अपनी शक्ति का प्रयोग केवल क्रोध की पूर्ति के लिए करते हैं, तो राजधर्म की मर्यादा कमजोर पड़ती है। यदि वे सत्य सुनकर अपने निर्णय पर पुनर्विचार करते हैं, तो वही शक्ति न्याय की रक्षा का साधन बन सकती है।
जनमेजय के लिए इस प्रसंग का वास्तविक संदेश
विश्वावसु की बातों में केवल वपुष्टमा की निर्दोषता का समर्थन नहीं है। वे जनमेजय को यह भी दिखाते हैं कि एक घटना के कारण वे कितने लोगों के प्रति अन्याय करने के निकट पहुँच गए थे।
इन्द्र के प्रति क्रोध में उन्होंने यज्ञ की व्यवस्था को दोषी ठहराया। पुरोहितों के प्रति क्रोध में उन्होंने उन्हें राज्य से निकाल दिया। अपनी प्रतिष्ठा को लेकर उत्पन्न पीड़ा में उन्होंने पत्नी को अपमानित करने का निर्णय लिया।
इस प्रकार एक ही घटना ने राजा के विवेक को कई दिशाओं में प्रभावित किया।
विश्वावसु का हस्तक्षेप उन्हें यह समझने का अवसर देता है कि राजा होने का अर्थ केवल दंड देने की शक्ति रखना नहीं, बल्कि अपने निर्णयों को नियंत्रित करना भी है। जो व्यक्ति अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर सकता, उसकी सत्ता दूसरों के लिए भय का कारण बन सकती है।
इस प्रसंग में इन्द्र की माया बाहरी संकट है, लेकिन जनमेजय का अनियंत्रित क्रोध आंतरिक संकट बन जाता है। बाहरी घटना उनके नियंत्रण में नहीं थी; आंतरिक प्रतिक्रिया पर वे काम कर सकते थे।
शोधपरक समीक्षा
हरिवंशपुराण के इस आख्यान को तीन प्रमुख दृष्टियों से समझा जा सकता है।
देवताओं के चरित्र की जटिलता: इन्द्र देवताओं के राजा हैं, किंतु इस प्रसंग में उनका आचरण आदर्श नहीं है। वे अपनी प्रतिष्ठा और यज्ञफल को लेकर आशंकित दिखाई देते हैं। कथा इस प्रकार देवत्व और नैतिक उत्तरदायित्व के बीच प्रश्न उठाती है।
राजधर्म और न्याय: जनमेजय की प्रतिक्रिया बताती है कि क्रोध में लिया गया निर्णय निर्दोष व्यक्ति को दंडित कर सकता है। राजा के लिए आवश्यक है कि वह अपमान या संदेह के आधार पर नहीं, बल्कि सत्य की जाँच करके निर्णय ले।
नियति और आत्मसंयम: विश्वावसु नियति की कठिनाई बताते हुए राजा को धैर्य का उपदेश देते हैं। इस प्रसंग का व्यावहारिक संदेश यह है कि हर परिस्थिति को नियंत्रित करना संभव नहीं, पर अपनी प्रतिक्रिया को संयमित करना मनुष्य के हाथ में हो सकता है।
इस कथा को आधुनिक वैज्ञानिक इतिहास या मनोविज्ञान का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। यह पुराण की धार्मिक आख्यान-परंपरा का हिस्सा है। फिर भी इसके भीतर न्याय, आत्मसंयम, निर्दोष की रक्षा और सत्ता के उत्तरदायित्व जैसे विषयों पर विचार किया जा सकता है।
इस भाग का सार
जनमेजय के अश्वमेध यज्ञ में इन्द्र की माया से विघ्न उत्पन्न होता है। राजा क्रोध में पुरोहितों को दोषी ठहराते हैं और अपनी पत्नी वपुष्टमा को भी त्यागने का निर्णय लेते हैं। गंधर्व विश्वावसु उन्हें बताते हैं कि वपुष्टमा निर्दोष हैं और इन्द्र ने अपनी प्रतिष्ठा की चिंता से यह बाधा उत्पन्न की थी। विश्वावसु का उपदेश जनमेजय को धैर्य, न्याय और आत्मसंयम की ओर लौटने का अवसर देता है।
अगले भाग में
अगले भाग में देखा जाएगा कि विश्वावसु की बातों का जनमेजय पर क्या प्रभाव पड़ता है, राजा किस प्रकार अपना क्रोध त्यागते हैं और वपुष्टमा के साथ उनका जीवन फिर से सामान्य होता है। इसके साथ भविष्यपर्व का यह प्रसंग पूर्णता की ओर बढ़ेगा और कथा आगे ईश्वर-तत्त्व, सृष्टि तथा युगों के स्वरूप से संबंधित दार्शनिक विवेचन की दिशा में प्रवेश करेगी।
मुकेश श्रीवास्तव आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
Comments
Post a Comment