हरिवंशपुराण — भाग ५२ - पृथ्वी का स्वरूप

 हरिवंशपुराण — भाग ५२ - पृथ्वी का स्वरूप : सृष्टि के विस्तार में जगत् का आधार

पिछले भाग में प्रलय के पश्चात् सृष्टि के पुनः आरम्भ, पंचमहाभूतों के प्राकट्य और भगवान् हरि की नाभि से उत्पन्न कमल का वर्णन किया गया था। अब कथा पृथ्वी के स्वरूप की ओर बढ़ती है। सृष्टि-वर्णन में यह एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन है—तत्त्वों की उत्पत्ति से आगे बढ़कर उस जगत् की संरचना को समझना, जिसमें जीवों का निवास, कर्मों का सम्पादन और जीवन की विविध अवस्थाएँ सम्भव होती हैं।

हरिवंशपुराण के भविष्यपर्व में पृथ्वी का वर्णन केवल किसी भौगोलिक भूभाग के रूप में नहीं आता। यह उस व्यापक जगत् की संरचना से जुड़ा है, जिसे पुराण अपनी पारम्परिक विश्व-दृष्टि के अनुसार समझाता है। इस वर्णन में प्रकृति, लोक-व्यवस्था और जीवों के निवास का विचार एक-दूसरे से जुड़ता है।

कमल के भीतर पृथ्वी और पर्वतों की कल्पना

वैशम्पायन के वर्णन में भगवान् हरि उस स्वर्णमय कमल पर ब्रह्मा को स्थापित करते हैं। यह कमल अनेक योजन तक विस्तृत, तेजस्वी और पृथ्वी के गुणों तथा चिह्नों से युक्त बताया गया है। पुराणविद् ऋषि इसे नारायण से उत्पन्न और पृथ्वी को धारण करने वाला मानते हैं।

इस वर्णन का विशेष पक्ष यह है कि पृथ्वी को कमल के आधार और उसके विभिन्न अंगों से जोड़कर समझाया गया है। कमल की दृढ़ जड़ें दिव्य पर्वतों के समान हैं। हिमवान्, मेरु, नील, निषध, कैलास, क्रौञ्च, गन्धमादन, त्रिशृंग, मन्दर, उदय, कन्दर, विन्ध्य और अस्त जैसे पर्वतों का उल्लेख आता है। इन पर्वतों को देवताओं, सिद्धों और तपस्वियों के आश्रमों से सम्बद्ध बताया गया है।

यहाँ पर्वत केवल ऊँची प्राकृतिक संरचनाएँ नहीं हैं। वे स्थिरता, विस्तार और विविध जीवन-क्षेत्रों के आधार के रूप में भी प्रस्तुत होते हैं। पर्वतों के बीच फैला भूभाग जीवों के निवास और धार्मिक कर्मों का क्षेत्र बनता है। इस प्रकार पृथ्वी का वर्णन प्राकृतिक विशेषताओं और सांस्कृतिक जीवन—दोनों को एक ही चित्र में समेटता है।

जम्बूद्वीप और यज्ञ की भूमि

पर्वतों से विभक्त भूभाग को इस प्रसंग में जम्बूद्वीप कहा गया है। यहीं यज्ञ करने वाले लोग अपने धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करते हैं। यज्ञ से सम्बन्धित जलधाराओं और पवित्र नदियों का वर्णन पृथ्वी की पवित्रता को और विस्तृत करता है।

इस चित्र में पृथ्वी का महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि वह जीवों को रहने के लिए स्थान देती है। वह कर्म करने, तपस्या करने, यज्ञ सम्पन्न करने और पवित्र स्थलों तक पहुँचने की भूमि भी है। इसलिए भूगोल और धर्म यहाँ एक-दूसरे से अलग विषय नहीं बनते।

कमल के रेशों को खनिजों से युक्त पर्वतों के रूप में समझाया गया है। यह रूपक पृथ्वी की आन्तरिक विविधता की ओर ध्यान खींचता है। कमल का कोई अंग पर्वतों से, कोई भूभाग से और कोई खनिज-संपन्न संरचनाओं से जोड़ा जाता है। एक ही रूपक के भीतर पृथ्वी के अलग-अलग पक्षों को समाहित कर दिया गया है।

इसे आधुनिक भूविज्ञान का शाब्दिक विवरण मानना उचित नहीं होगा। यह पुराण की प्रतीकात्मक विश्व-रचना है, जिसमें प्रकृति के अनेक रूपों को एक व्यापक दिव्य संरचना के अंगों की तरह देखा गया है।

कमल की ऊपरी और निचली पंखुड़ियाँ

इस अध्याय में कमल की पंखुड़ियों के माध्यम से विभिन्न भूभागों और लोकों की कल्पना भी की गई है। ऊपरी पंखुड़ियों को दुर्गम तथा पर्वतीय म्लेच्छ-प्रदेशों से जोड़ा गया है। निचली पंखुड़ियों को दैत्य और उरगों के निवास-क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इनके नीचे उदक नामक क्षेत्र का उल्लेख है, जिसे दुःख और दुष्कर्मों के परिणामों से सम्बद्ध किया गया है।

यह विवरण पुराण की उस विश्व-दृष्टि को प्रकट करता है जिसमें जगत् केवल मनुष्यों के अनुभव में आने वाली पृथ्वी तक सीमित नहीं है। इसमें विभिन्न प्रकार के प्राणियों के क्षेत्र, लोकों की परिकल्पना और कर्म के परिणामों का विचार भी सम्मिलित है।

इन वर्णनों को आज के मानचित्र पर सीधे अंकित किए जा सकने वाले भूभागों के रूप में प्रस्तुत करना सावधानीहीन होगा। कथा का अपना धार्मिक और सांकेतिक संदर्भ है। इसका उद्देश्य दृश्य जगत्, अदृश्य लोकों और कर्मफल की मान्यता को एक समग्र विश्व-चित्र में रखना है।

समुद्र और पुष्कर नाम का महत्त्व

कमल के चारों ओर विस्तृत जलराशि को समुद्र कहा गया है। इसी कमल का नाम पुष्कर बताया गया है, क्योंकि उसका सम्बन्ध नारायण के हृदय से है। इस कारण कमल का रूप केवल पृथ्वी की संरचना समझाने का साधन नहीं रहता; वह सृष्टि के दिव्य आधार की ओर भी संकेत करता है।

अध्याय में यह भी कहा गया है कि कमल की उत्पत्ति को जानने वाले प्राचीन ऋषि यज्ञभूमि में कमलाकार वेदी बनाते हैं। इस प्रकार ब्रह्माण्ड की कल्पना और यज्ञ की वेदी के बीच एक प्रतीकात्मक सम्बन्ध स्थापित होता है। जिस कमल में पर्वत, नदियाँ, देवता और अन्य सृष्टिगत रूप समाहित हैं, उसी के आकार को यज्ञस्थल में पुनः रचा जाता है।

यहाँ एक उल्लेखनीय विचार सामने आता है—धार्मिक अनुष्ठान में प्रयुक्त आकृति केवल सजावट नहीं, बल्कि व्यापक विश्व-व्यवस्था का स्मरण भी हो सकती है। यज्ञवेदी का आकार उस विश्व-रचना की ओर संकेत करता है जिसे पुराण नारायण से उत्पन्न मानता है।

इस प्रसंग का दार्शनिक आशय

इस अध्याय में पृथ्वी को एक ऐसी समग्र संरचना के रूप में चित्रित किया गया है जिसमें पर्वत, भूभाग, खनिज, नदियाँ, समुद्र, जीवों के निवास और धार्मिक कर्म परस्पर जुड़े हुए हैं। कमल इस सम्पूर्णता को व्यक्त करने वाला केंद्रीय रूपक है।

इसकी दार्शनिक व्याख्या करते समय तीन बातें ध्यान में रखनी चाहिए। पहली, पुराण सृष्टि को अव्यवस्थित वस्तुओं के समूह के रूप में नहीं, बल्कि परस्पर सम्बन्धित व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करता है। दूसरी, प्रकृति और मनुष्य के धार्मिक जीवन को अलग-अलग संसार नहीं माना गया है। तीसरी, दृश्य भूगोल के साथ अदृश्य लोकों और कर्मफल की मान्यताओं को भी इसी विश्व-चित्र में स्थान मिलता है।

इस प्रकार पृथ्वी का वर्णन सृष्टि-कथा को एक ठोस विस्तार देता है। अब कथा केवल यह नहीं बताती कि जगत् किस दिव्य आधार से उत्पन्न हुआ; वह यह भी दिखाती है कि उस जगत् की कल्पित संरचना में विभिन्न प्रदेश, पर्वत, नदियाँ और जीवों के क्षेत्र किस प्रकार व्यवस्थित हैं।

अगले प्रसंग में सृष्टि-कथा एक नया मोड़ लेती है। मधु और कैटभ के जन्म का वर्णन सामने आता है, जिसके माध्यम से सृजन-व्यवस्था के भीतर उत्पन्न होने वाले संघर्ष की भूमिका तैयार होती है।

मुकेश श्रीवास्तव आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

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