हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - भाग–५९ : क्षत्रयुग का स्वरूप — वर्ण, गुण, कर्म और प्रकृति का सम्बन्ध
हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - भाग–५९ : क्षत्रयुग का स्वरूप — वर्ण, गुण, कर्म और प्रकृति का सम्बन्ध
मनुष्य जब अपने आसपास के संसार को देखता है, तो उसे अनेक प्रकार की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। कोई ज्ञान प्राप्त करने में रुचि रखता है, कोई शासन और रक्षा का दायित्व निभाता है, कोई व्यापार तथा उत्पादन में लगा रहता है और कोई अपने श्रम तथा कौशल से समाज की आवश्यकताओं को पूरा करता है। समाज की व्यवस्था में इन विभिन्न भूमिकाओं का क्या स्थान है? क्या मनुष्य की पहचान उसके गुणों से होती है, उसके कर्मों से या उसके जन्म से?
हरिवंशपुराण के भविष्यपर्व में जनमेजय और वैशम्पायन के संवाद के अन्तर्गत क्षत्रयुग का वर्णन आता है। इसमें युग की धार्मिक व्यवस्था, तपस्या, यज्ञ, दान, वर्ण-विभाजन और प्रकृति की सृजन-शक्ति से जुड़े विचार प्रस्तुत किए गए हैं। इस प्रसंग को समझने के लिए आवश्यक है कि हम इसके कथात्मक अर्थ के साथ-साथ इसकी सामाजिक और दार्शनिक मान्यताओं पर भी विचार करें।
जनमेजय की जिज्ञासा
पिछले प्रसंगों में जनमेजय सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्मा की रचना-प्रक्रिया और विभिन्न प्राणी-समूहों के विषय में सुन चुके हैं। अब उनकी जिज्ञासा युगों की व्यवस्था की ओर बढ़ती है।
वे वैशम्पायन से ऐसे युग के विषय में पूछते हैं, जिसमें नियम, यज्ञ, दान और विभिन्न प्राणियों की व्यवस्था का विशेष महत्त्व है। वैशम्पायन इसके उत्तर में क्षत्रयुग की महिमा का वर्णन आरम्भ करते हैं।
यहाँ क्षत्रयुग को केवल किसी ऐतिहासिक काल का नाम मानकर रुक जाना पर्याप्त नहीं है। आख्यान में इसका सम्बन्ध धर्माचरण, सामाजिक कर्तव्यों और सृष्टि के विकास से भी जुड़ता है।
विष्णु और दक्ष की सृष्टि-भूमिका
इस वर्णन में विष्णु का दक्ष के रूप में सृष्टि-कार्य से जुड़ना बताया गया है। दक्ष प्रजापति के रूप में सन्तान और प्राणी-समूहों की उत्पत्ति से सम्बद्ध हैं। उनके माध्यम से सृष्टि का विस्तार और विभिन्न प्रकार की व्यवस्थाओं का निर्माण प्रस्तुत किया गया है।
कथा में ब्रह्मविद्या, इन्द्रिय-संयम और योगाभ्यास में स्थित ब्राह्मणों का उल्लेख भी मिलता है। वे यज्ञ करते हैं, वेदों का अध्ययन करते हैं और आत्मज्ञान की दिशा में साधना करते हैं। उनके जीवन का आदर्श केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मन और इन्द्रियों पर नियन्त्रण भी है।
इस वर्णन में ज्ञान और अनुशासन को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसके साथ ही यह विचार भी सामने आता है कि बाहरी कर्म तभी सार्थक हो सकते हैं, जब मनुष्य के भीतर संयम और आत्मबोध विकसित हों।
गुणों के आधार पर वर्णों का वर्णन
इस प्रसंग में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों को अलग-अलग गुणों तथा प्रतीकात्मक रंगों से सम्बद्ध किया गया है। ब्राह्मणों के साथ सत्त्व, क्षत्रियों के साथ रजस्, वैश्यों के साथ रजस् और तमस् का मिश्रण तथा शूद्रों के साथ तमस् का सम्बन्ध बताया गया है।
सत्त्व, रजस् और तमस् भारतीय दार्शनिक परम्परा में प्रकृति के तीन गुण माने जाते हैं। सामान्य अर्थ में सत्त्व स्पष्टता, संतुलन और ज्ञान की प्रवृत्ति से; रजस् सक्रियता, इच्छा और प्रयास से; तथा तमस् जड़ता, मोह और निष्क्रियता से जोड़ा जाता है।
इन गुणों को मनुष्य के व्यवहार को समझने की एक दार्शनिक भाषा के रूप में देखा जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति में ये प्रवृत्तियाँ अलग-अलग अनुपात में प्रकट हो सकती हैं। कोई व्यक्ति ज्ञान की ओर अधिक झुक सकता है, कोई कर्म और नेतृत्व की ओर, जबकि किसी में आलस्य या मोह की प्रवृत्ति अधिक हो सकती है।
लेकिन यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अन्तर समझना चाहिए। किसी व्यक्ति में किसी गुण की उपस्थिति और किसी सामाजिक वर्ग के सभी लोगों को उसी गुण से परिभाषित कर देना दो अलग बातें हैं। मनुष्य का वास्तविक स्वभाव केवल किसी एक श्रेणी में बाँधकर नहीं समझा जा सकता।
पुराण का यह वर्णन अपने समय की सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं को भी प्रकट करता है। इसलिए इसे पढ़ते समय दार्शनिक अवधारणाओं और सामाजिक वर्गीकरण के बीच अन्तर बनाए रखना आवश्यक है।
वर्ण और कर्तव्य की अवधारणा
ग्रन्थ में चार वर्णों के अलग-अलग कर्तव्यों का उल्लेख मिलता है। ब्राह्मणों का सम्बन्ध अध्ययन, अध्यापन और धार्मिक कर्मों से; क्षत्रियों का शासन और रक्षा से; वैश्यों का उत्पादन तथा व्यापार से; और शूद्रों का सेवा तथा विविध कलाओं से जोड़ा गया है।
इस व्यवस्था के पीछे समाज के विभिन्न कार्यों को अलग-अलग भूमिकाओं में बाँटने की धारणा दिखाई देती है। किसी भी समाज में ज्ञान, सुरक्षा, उत्पादन, निर्माण, सेवा और कौशल की आवश्यकता होती है। कोई भी समाज इन कार्यों में से किसी एक को पूरी तरह छोड़कर व्यवस्थित रूप से नहीं चल सकता।
फिर भी, सामाजिक कार्यों का विभाजन और मनुष्यों के अधिकारों का विभाजन एक ही बात नहीं हैं। किसी व्यक्ति को किसी विशेष कार्य में दक्ष मानना उचित हो सकता है, लेकिन उसके जन्म के कारण ज्ञान, सम्मान या अवसर से वंचित कर देना अलग प्रकार का सामाजिक निर्णय है।
इस प्रसंग में शूद्रों के वेदाध्ययन और वैदिक संस्कारों पर प्रतिबन्ध का उल्लेख मिलता है। यह ग्रन्थ में वर्णित ऐतिहासिक-सामाजिक दृष्टिकोण का हिस्सा है; इसे बिना आलोचनात्मक विचार के सार्वकालिक सत्य मान लेना उचित नहीं होगा।
आज इस प्रसंग का अध्ययन करते समय हमें दो स्तरों को अलग रखना चाहिए—एक, प्राचीन समाज में प्रचलित धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था का ऐतिहासिक विवरण; दूसरा, मनुष्य की गरिमा, शिक्षा और समान अवसरों के बारे में हमारा नैतिक मूल्यांकन।
कर्म, योग और ज्ञान
इस आख्यान में दक्ष के सृष्टि-कार्य को योगशक्ति और ज्ञान से जोड़ा गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि सृजन के लिए केवल शक्ति पर्याप्त नहीं है; उसके साथ विवेक और व्यवस्था की समझ भी आवश्यक है।
मनुष्य के जीवन में भी यही बात दिखाई देती है। कोई व्यक्ति अपने कौशल से बड़ा कार्य कर सकता है, लेकिन यदि उसके पास विवेक नहीं है, तो उसकी शक्ति दूसरों के लिए संकट बन सकती है। इसके विपरीत, ज्ञान जब कर्म से जुड़ता है, तो वह जीवन और समाज दोनों के लिए उपयोगी बन सकता है।
इसलिए योग को केवल शरीर की क्रियाओं या एकान्त साधना तक सीमित नहीं समझना चाहिए। इस प्रसंग के व्यापक अर्थ में योग का सम्बन्ध आत्मसंयम, एकाग्रता और कर्म को उचित दिशा देने से भी है।
पृथ्वी की खोज और दक्ष के पुत्र
कथा का अगला महत्त्वपूर्ण भाग दक्ष के पुत्रों से जुड़ा है। दक्ष अपने पुत्रों से पृथ्वी की व्यापकता और उसकी सीमा का पता लगाने की अपेक्षा करते हैं। वे स्वयं पृथ्वी का अन्त नहीं जान पाते और चाहते हैं कि उनके पुत्र इस विषय में सत्य का अन्वेषण करें।
पृथ्वी को यहाँ सृजन-शक्ति के व्यापक आधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। दक्ष के पुत्र उसे जानना चाहते हैं, लेकिन पृथ्वी स्वयं उनके सामने प्रकट नहीं होती।
इस प्रसंग को प्रतीकात्मक रूप से देखें तो इसमें ज्ञान की सीमा का प्रश्न सामने आता है। मनुष्य किसी वस्तु को जानने की इच्छा कर सकता है, उसके विषय में प्रयास कर सकता है, फिर भी उसका सम्पूर्ण स्वरूप तत्काल उसके सामने नहीं आता।
प्रकृति का विस्तार इतना व्यापक है कि उसे समझने के लिए केवल अधिकार या शक्ति का दावा पर्याप्त नहीं है। जिज्ञासा, निरीक्षण, धैर्य और विवेक की आवश्यकता होती है।
प्रकृति और पुरुष का सम्बन्ध
प्रसंग में कृतयुग की पवित्र अवस्था, प्रकृति और पुरुष के सम्बन्ध तथा जीवों की उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है। प्रकृति को समस्त प्राणियों की माता के रूप में चित्रित किया गया है। वह विभिन्न प्रकार के जीवों को उत्पन्न करती है और उनके विकास तथा क्षय की प्रक्रिया में भूमिका निभाती है।
भारतीय दर्शन में प्रकृति और पुरुष की अवधारणाएँ विशेष रूप से सांख्य-दर्शन में महत्त्वपूर्ण हैं। सांख्य की व्यवस्थित दार्शनिक व्याख्या में प्रकृति को परिवर्तनशील जगत् के मूल आधार और पुरुष को चेतन साक्षी के रूप में समझा जाता है। यहाँ भविष्यपर्व का आख्यान उसी विषय-क्षेत्र की ओर संकेत करता है, यद्यपि पुराण की कथा और सांख्य के दार्शनिक प्रतिपादन को पूरी तरह एक जैसा नहीं मानना चाहिए।
प्रकृति में उत्पत्ति, वृद्धि, परिवर्तन और क्षय का क्रम निरन्तर चलता है। जीव जन्म लेते हैं, विकसित होते हैं और अन्ततः मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इस परिवर्तनशीलता के भीतर जीवन की निरन्तरता बनी रहती है।
इस दृष्टि से पृथ्वी केवल मनुष्य के उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि समस्त जीवन को धारण करने वाला व्यापक आधार है। प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव इसी समझ से विकसित हो सकता है।
क्षत्रयुग का दार्शनिक आशय
क्षत्रयुग के इस वर्णन में धार्मिक कर्तव्य, सामाजिक व्यवस्था, योग, ज्ञान और प्रकृति के प्रश्न एक साथ उपस्थित होते हैं। इसका एक पक्ष समाज के विभिन्न कार्यों की व्यवस्था से जुड़ा है, जबकि दूसरा पक्ष आत्मसंयम और सृष्टि के स्वरूप को समझने से।
इस प्रसंग को पढ़ते हुए कुछ मूल प्रश्न हमारे सामने आते हैं।
क्या शक्ति का उपयोग विवेक के बिना किया जा सकता है? क्या सामाजिक व्यवस्था का उद्देश्य केवल वर्गों को अलग करना है, या समाज के सभी लोगों के जीवन को व्यवस्थित करना भी है? क्या प्रकृति को समझने के लिए केवल अधिकार पर्याप्त है, या उसके प्रति विनम्रता भी आवश्यक है?
ये प्रश्न केवल प्राचीन आख्यान तक सीमित नहीं हैं। आज भी ज्ञान, सत्ता, श्रम और प्रकृति के सम्बन्ध पर विचार करते समय इनकी प्रासंगिकता बनी रहती है।
हरिवंशपुराण के भविष्यपर्व का यह प्रसंग क्षत्रयुग की अवधारणा के माध्यम से सामाजिक कर्तव्यों, गुणों, योग और प्रकृति की सृजन-शक्ति पर विचार प्रस्तुत करता है। दक्ष की सृष्टि-भूमिका, ब्राह्मणों की साधना, वर्णों का वर्गीकरण और पृथ्वी को जानने का प्रयास इस आख्यान के प्रमुख पक्ष हैं।
इस वर्णन का अध्ययन करते समय उसके दार्शनिक संकेतों को समझना चाहिए, साथ ही उसमें दिखाई देने वाली ऐतिहासिक सामाजिक सीमाओं को भी पहचानना चाहिए। प्राचीन ग्रन्थों का गम्भीर अध्ययन न तो उनके प्रत्येक कथन को बिना प्रश्न स्वीकार करने में है, न ही उन्हें वर्तमान मान्यताओं से ही मापकर छोड़ देने में। वास्तविक अध्ययन उनके मूल सन्दर्भ, विचार और प्रभाव को समझने से आगे बढ़ता है।
प्रकृति की व्यापकता, ज्ञान की सीमाएँ और शक्ति के साथ विवेक की आवश्यकता—ये ऐसे विषय हैं जो इस प्रसंग को आज भी विचारणीय बनाते हैं।
पाठ-सम्बन्धी शोध-टिप्पणी
यह भाग मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद में उपलब्ध हरिवंश के भविष्यपर्व के “क्षत्रयुग का वर्णन” शीर्षक वाले अध्याय पर आधारित है। अलग-अलग संस्करणों में अध्याय-क्रम और पाठ में भिन्नता हो सकती है। वर्ण-व्यवस्था से सम्बन्धित कथनों को यहाँ ग्रन्थ में वर्णित मान्यताओं के रूप में प्रस्तुत किया गया है, न कि आधुनिक सामाजिक समानता के स्थान पर किसी नियम के रूप में।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
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