हरिवंशपुराण — भाग ५० - प्रलय के बाद नारायण की सत्ता
हरिवंशपुराण — भाग ५० - प्रलय के बाद नारायण की सत्ता : जब समस्त जगत् शुद्ध चेतना में स्थित होता है
सृष्टि के लय के बाद प्रश्न यह नहीं रह जाता कि संसार कहाँ गया; प्रश्न यह होता है कि संसार के अभाव में भी कौन विद्यमान रहता है। भविष्यपर्व का यह प्रसंग उसी अनन्त सत्ता की ओर ले जाता है, जो दृश्य जगत् से परे होते हुए भी उसके अस्तित्व का मूल आधार है।
दृश्य जगत् के पीछे विद्यमान सत्ता
वैशम्पायन जनमेजय को बताते हैं कि जब सम्पूर्ण जगत् एक ही जलराशि में विलीन हो जाता है, तब भगवान् हरि केवल किसी दृश्य शरीर या सीमित रूप में नहीं रहते। वे शुद्ध बुद्धि अथवा शुद्ध चेतना के रूप में विद्यमान रहते हैं। दत्त के अनुवाद में इस अवस्था के लिए pure intelligence पद आया है। नारायण प्रकृति के रजोगुण से परे, अपनी ही चेतना में स्थित होकर योगनिद्रा में रहते हैं। 【turn300121search0】
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक अन्तर सामने आता है। संसार का लय होना और सत्ता का पूर्ण अभाव हो जाना एक ही बात नहीं है। प्रलय में नाम, रूप, शरीर और परिचित जगत् का क्रम समाप्त हो जाता है; लेकिन आख्यान उस मूल सत्ता को शेष मानता है, जिससे सृष्टि प्रकट होती है और जिसमें वह पुनः लीन होती है।
इस कथन को केवल भौतिक महासागर में किसी देवता के सोने का दृश्य मानकर पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। कथा एक ऐसे प्रश्न को भी सामने रखती है—यदि ज्ञात जगत् के सभी रूप मिट जाएँ, तो क्या अस्तित्व का आधार भी मिट जाता है? हरिवंश का उत्तर नारायण की शाश्वत सत्ता के माध्यम से दिया गया है।
विराट् पुरुष और शुद्ध चेतना का अन्तर
इस अध्याय में पुरुष के दो रूपों के बीच भी अन्तर संकेतित होता है। एक पुरुष वह है जिसके सिर, पैर और अन्य अंगों की कल्पना की जा सकती है तथा जिसे योग और यज्ञ के माध्यम से प्राप्त करने की बात कही गई है। इसके आगे महापुरुष का उल्लेख आता है, जो उस सीमित वर्णन से परे है।
इस भेद को समझना आवश्यक है। विराट् पुरुष का रूप सम्पूर्ण जगत् को एक व्यापक देह के रूप में देखने की दृष्टि देता है। इसके विपरीत, शुद्ध चेतना का विचार उस सत्ता की ओर संकेत करता है जिसे केवल अंगों, आकारों और दृश्य विशेषताओं में सीमित नहीं किया जा सकता।
अर्थात्, विराट् रूप सत्ता की व्यापकता को दिखाता है, जबकि शुद्ध चेतना का वर्णन उसके रूपातीत आधार की ओर ले जाता है। यह इस प्रसंग का दार्शनिक पाठ है; इसे किसी एक उत्तरवर्ती वेदान्त-मत का हूबहू प्रतिपादन नहीं मानना चाहिए।
यज्ञ और वैदिक परम्परा का स्थान
नारायण के वर्णन में यज्ञ तथा वैदिक कर्मकाण्ड से जुड़े सोलह प्रकार के ऋत्विजों का उल्लेख मिलता है। ये पुरोहित यज्ञ की अलग-अलग भूमिकाओं का निर्वाह करते हैं। उनके नामों और उत्पत्ति का वर्णन इस कथा को सृष्टि-विज्ञान के साथ वैदिक अनुष्ठान-परम्परा से भी जोड़ता है।
इसका आशय केवल इतना नहीं कि देवता ने पुरोहितों की रचना की। आख्यान वैदिक व्यवस्था को भी उसी व्यापक ब्रह्माण्डीय क्रम के भीतर रखता है, जिसमें देवता, जीव, प्रकृति और यज्ञ परस्पर सम्बद्ध हैं।
यहाँ यज्ञ को नारायण तक पहुँचने के साधनों में गिना गया है। वेद, उपनिषद् और यज्ञ—इन तीनों का उल्लेख इस बात को सामने लाता है कि परम्परा में परम सत्ता की प्राप्ति के लिए कर्म, ज्ञान और आध्यात्मिक अनुशासन के विभिन्न मार्गों को महत्त्व दिया गया है। इन मार्गों के सम्बन्ध को समझने के लिए आगे के प्रसंगों में योग और प्राणायाम का पृथक् विवेचन भी आता है।
मार्कण्डेय ऋषि का अद्भुत अनुभव
अध्याय का सबसे जीवंत आख्यान मार्कण्डेय ऋषि से जुड़ा है। भगवान् के वरदान और अपनी तपस्या के प्रभाव से मार्कण्डेय दीर्घकाल तक जीवित रहते हैं। कथा के अनुसार, वे भगवान् के उदर के भीतर निवास करते हैं, वहाँ तप करते हैं, होम करते हैं और तीर्थों की यात्रा करते हैं। फिर वे भगवान् के मुख से बाहर निकलते हैं, लेकिन ईश्वरीय माया के प्रभाव से अपने अनुभव का वास्तविक स्वरूप नहीं समझ पाते।
बाहर आकर वे एक ऐसे महासागर को देखते हैं, जिसमें परिचित जगत् के चिह्न दिखाई नहीं देते। न सूर्य है, न चन्द्रमा, न वायु, न पर्वत और न पृथ्वी का परिचित विस्तार। इस दृश्य से उनके मन में भय और विस्मय दोनों उत्पन्न होते हैं।
उनका संकट केवल यह नहीं है कि संसार बदल गया है। संकट यह भी है कि जिस संसार को वे सत्य और परिचित मानते थे, उसकी अनुपस्थिति में वे अपने अनुभव की सत्यता को कैसे पहचानें?
वे अपने मन में विचार करते हैं कि कहीं यह स्वप्न तो नहीं, अथवा उनकी बुद्धि भ्रमित तो नहीं हो गई। इस प्रकार कथा एक ऋषि के अलौकिक अनुभव के माध्यम से ज्ञान की समस्या भी प्रस्तुत करती है। जब अनुभव की सामान्य कसौटियाँ ही अनुपस्थित हों, तब वास्तविकता का निर्णय कैसे किया जाए?
यह प्रसंग किसी आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्त का प्रमाण नहीं है। फिर भी, दार्शनिक दृष्टि से यह अनुभव, स्मृति, भ्रम और सत्य के सम्बन्ध पर विचार करने का अवसर देता है।
महासागर में बालक का दर्शन
मार्कण्डेय आगे एक वटवृक्ष की शाखा पर सोए हुए एक तेजस्वी बालक को देखते हैं। चारों ओर जलराशि है और परिचित जीव-जगत् का सामान्य विस्तार दिखाई नहीं देता। बालक का तेज उन्हें आकर्षित करता है, लेकिन वे उसके समीप सहजता से नहीं पहुँच पाते।
तब भगवान् बालक के रूप में उनसे कहते हैं कि वे थके हुए हैं और उनके पास आकर विश्राम करें। मार्कण्डेय इस सम्बोधन पर क्रोधित हो जाते हैं। वे स्वयं को दीर्घायु महर्षि मानते हैं और पूछते हैं कि कौन उन्हें बालक कहने का साहस कर रहा है।
यहीं कथा में एक सूक्ष्म मोड़ आता है। मार्कण्डेय की तपस्या और दीर्घायु वास्तविक हैं, लेकिन उनका अनुभव उन्हें उस सत्ता की सम्पूर्ण पहचान नहीं दे पाया है, जिसके प्रभाव में वे विचरण कर रहे हैं। वे अपने अर्जित ज्ञान और प्रतिष्ठा के आधार पर उस बालक को समझना चाहते हैं, जबकि बालक का वास्तविक स्वरूप उनकी सामान्य धारणाओं से परे है।
जब भगवान् उन्हें बताते हैं कि वे ही उनके पिता, गुरु और प्राचीन पुरुष हैं, जिन्होंने उन्हें दीर्घायु होने का वरदान दिया था, तब मार्कण्डेय का क्रोध आश्चर्य में बदलने लगता है। वे हाथ जोड़कर उस सत्ता के वास्तविक स्वरूप और उसकी माया के विषय में प्रश्न करते हैं।
नारायण का विराट् परिचय
मार्कण्डेय के प्रश्न के उत्तर में भगवान् अपना परिचय देते हैं। वे कहते हैं कि वे नारायण हैं, ब्रह्मा हैं और समस्त प्राणियों की उत्पत्ति के कारण हैं। वे तत्त्वों की सृष्टि और संहार करने वाले हैं; वे प्रकृति और पुरुष, कालचक्र और प्राणिजगत्, अग्नि और समुद्र, पृथ्वी और आकाश—सभी से अपना सम्बन्ध बताते हैं।
इस विराट् परिचय का मूल सूत्र यह है कि नारायण को केवल सृष्टि के किसी एक विभाग का अधिपति नहीं माना गया है। वे सृष्टि के आरम्भ, उसकी निरन्तरता और उसके अन्त—तीनों से सम्बद्ध हैं। वे प्रकट रूपों में भी हैं और अप्रकट अवस्था में भी।
भगवान् यह भी कहते हैं कि जो कुछ इस संसार में देखा, सुना और अनुभव किया जाता है, वह उनसे अभिन्न है। इस कथन में कथा अपनी सृष्टि-दृष्टि को व्यापकतम रूप देती है। नारायण केवल जगत् के बाहर बैठकर उसे संचालित करने वाले देवता नहीं रह जाते; समस्त जगत् का अस्तित्व भी उन्हीं पर आश्रित बताया जाता है।
इस कथन की दार्शनिक व्याख्या करते समय सावधानी आवश्यक है। इसे एक ओर पुराण की सर्वव्यापक ईश्वर-दृष्टि के रूप में समझा जा सकता है; दूसरी ओर, वेदान्त की कुछ परम्पराएँ ऐसे कथनों को ब्रह्म और जगत् के सम्बन्ध की चर्चा में उद्धृत करती हैं। फिर भी, अलग-अलग दर्शनों में इस अभिन्नता का अर्थ समान नहीं है। अतः पुराण के कथन को किसी एक दार्शनिक सम्प्रदाय की पूर्ण सिद्धान्त-व्यवस्था के बराबर नहीं मानना चाहिए।
प्रलय का रहस्य और माया की भूमिका
मार्कण्डेय का अनुभव इस अध्याय में एक और प्रश्न खोलता है—क्या किसी वस्तु को देख लेना ही उसे पूरी तरह जान लेना है?
ऋषि भगवान् के उदर के भीतर भी संसार-जैसे विस्तार का अनुभव करते हैं और बाहर निकलकर भी एक अन्य स्थिति देखते हैं। वे यात्रा करते हैं, तप करते हैं और अपने अनुभवों को वास्तविक मानते हैं; फिर भी उन्हें उस सत्ता की माया का बोध नहीं होता, जिसके भीतर ये सभी अवस्थाएँ घट रही हैं।
इस आख्यान में माया केवल किसी वस्तु को छिपा देने वाली शक्ति नहीं है। वह अनुभव और उसकी व्याख्या के बीच का अन्तर भी सामने लाती है। मनुष्य किसी दृश्य को देख सकता है, उसका वर्णन कर सकता है और उसके आधार पर निष्कर्ष भी निकाल सकता है; फिर भी उस दृश्य का सम्पूर्ण अर्थ उसकी पकड़ से बाहर रह सकता है।
मार्कण्डेय का प्रसंग इसी सीमा का आख्यानात्मक रूप है। यहाँ ऋषि का महत्त्व कम नहीं होता, लेकिन उनकी तपस्या और दीर्घायु को सर्वज्ञता के बराबर भी नहीं रखा जाता। आध्यात्मिक अनुभव की गहराई के साथ अपनी ज्ञान-सीमा को पहचानना भी आवश्यक दिखाई देता है।
इस प्रसंग का दार्शनिक निष्कर्ष
भविष्यपर्व के इस अध्याय में तीन विचार एक साथ सामने आते हैं।
पहला, सृष्टि का लय और परम सत्ता का अभाव एक ही बात नहीं हैं। नारायण प्रलय के बाद भी शुद्ध चेतना के रूप में विद्यमान बताए गए हैं।
दूसरा, विराट् रूप और रूपातीत सत्ता का वर्णन अलग-अलग स्तरों पर कार्य करता है। जगत् को ईश्वर के विराट् स्वरूप में देखना और ईश्वर को केवल दृश्य आकारों में सीमित न मानना—दोनों दृष्टियाँ इस आख्यान में उपस्थित हैं।
तीसरा, अनुभव की व्यापकता अपने आप में पूर्ण ज्ञान की गारंटी नहीं है। मार्कण्डेय की यात्रा इस बात को कथा के रूप में सामने रखती है कि परिचित जगत्, स्मृति और सामान्य बौद्धिक धारणाएँ बदल जाने पर वास्तविकता को समझने के लिए नई दृष्टि की आवश्यकता होती है।
इस प्रकार प्रलय के बाद नारायण का वर्णन केवल सृष्टि-विनाश का अगला दृश्य नहीं है। यह उस सत्ता, अनुभव और ज्ञान के सम्बन्ध पर विचार करने का प्रसंग है, जिसे पुराण अपनी कथा-भाषा में प्रस्तुत करता है।
अगले भाग में कथा सृष्टि की पुनः अभिव्यक्ति की ओर बढ़ेगी—प्रलय के बाद कमल की उत्पत्ति और उससे जुड़ी सृष्टि-प्रक्रिया का विवेचन होगा। वहाँ प्रश्न होगा कि जब समस्त जगत् लीन हो चुका है, तब सृष्टि का नया क्रम किस प्रकार आरम्भ होता है।
मुकेश श्रीवास्तव आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र (इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
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