हरिवंशपुराण — भाग ५४ - ब्रह्मा की सृष्टि

 हरिवंशपुराण — भाग ५४ - ब्रह्मा की सृष्टि : मानसपुत्रों से देवों, ऋषियों और विविध प्राणी-वंशों तक

मधु और कैटभ के प्रसंग के बाद भविष्यपर्व की कथा अब सृष्टि के विस्तार पर केन्द्रित होती है। ब्रह्मा कमल पर स्थित होकर तप करते हैं और सृष्टि-कार्य को आगे बढ़ाते हैं। इस वर्णन में सृष्टि का अर्थ केवल जीवों की उत्पत्ति नहीं है; इसमें लोकों की रचना, ज्ञान-परम्परा का प्राकट्य, ऋषियों की उत्पत्ति और विभिन्न प्राणी-वंशों का विस्तार भी सम्मिलित है।

इस अध्याय की विशेषता यह है कि जगत् की विविधता को एक वंश-परम्परा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। देवता, दैत्य, दानव, नाग, गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष और अन्य प्राणी अलग-अलग समूहों में वर्णित हैं, किन्तु उनकी उत्पत्ति-कथा उन्हें एक व्यापक सृष्टि-व्यवस्था से जोड़ती है।

ब्रह्मा का तप और नारायण का मार्गदर्शन

वैशम्पायन बताते हैं कि कमल पर स्थित ब्रह्मा ने कठोर तप किया। उनका तेज सहस्र किरणों वाले सूर्य के समान प्रकाशित था। वे केवल सृष्टिकर्ता के रूप में ही नहीं, बल्कि योग और ब्रह्मविद्या से सम्बद्ध सत्ता के रूप में भी चित्रित किए गए हैं।

इसके बाद नारायण योगाचार्य और कपिल के रूप में ब्रह्मा के समीप आते हैं। कपिल का सम्बन्ध यहाँ सांख्य-दर्शन से जोड़ा गया है। वे ब्रह्मा को स्मरण कराते हैं कि वे समस्त प्राणियों के अधिपति, जगत् के आधार और लोक के आचार्य हैं।

यह प्रसंग सृष्टि-कार्य और ज्ञान के सम्बन्ध को सामने लाता है। ब्रह्मा को सृजन का दायित्व प्राप्त है, लेकिन उनकी भूमिका को योग और ब्रह्मविद्या से अलग नहीं किया गया। सृष्टि की व्यवस्था के साथ उसके मूल तत्त्व को जानने का प्रश्न भी उपस्थित रहता है।

तीन लोकों की रचना और मानसपुत्र

नारायण तथा कपिल के उपदेश के बाद ब्रह्मा श्रुति में सुने गए ब्रह्मज्ञान-सम्बन्धी मन्त्रों का स्मरण करते हैं और तीन लोकों की रचना करते हैं। इसके बाद उनके मानसपुत्रों का वर्णन आता है। मानसपुत्र का अर्थ है—ऐसी सन्तान जिसका जन्म सामान्य शारीरिक प्रक्रिया के बजाय मन या संकल्प से माना गया हो।

कथा में मानसपुत्र अपने पिता से पूछता है कि वह उनकी सेवा किस प्रकार करे। ब्रह्मा उसे नारायण और कपिल के निर्देशों का अनुसरण करने के लिए कहते हैं। पुत्र के मन में यह प्रश्न भी उठता है कि उसके पिता से श्रेष्ठ कौन हो सकता है। उसे उत्तर मिलता है कि उसे अविनाशी ब्रह्म के स्वरूपों का स्मरण कर ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।

इस प्रसंग में सृष्टि और ज्ञान दो अलग दिशाएँ नहीं हैं। मानसपुत्र का जन्म सृष्टि का विस्तार है, जबकि उसका ज्ञान-प्राप्ति के लिए प्रस्थान आध्यात्मिक उन्नति का संकेत है। कथा में लोकों की रचना के साथ साधना और ब्रह्मज्ञान की सम्भावना भी जुड़ी हुई है।

ब्रह्मा की सहचरी और प्रजापतियों की उत्पत्ति

नारायण और कपिल के अपने धाम लौट जाने के बाद ब्रह्मा पुनः तप में प्रवृत्त होते हैं। कथा के अनुसार, वे अपने शरीर के आधे भाग से एक सुन्दर स्त्री की रचना करते हैं। वह तप, तेज और आत्मसंयम में उनके समान बताई गई है। उसके साथ सृष्टि-कार्य में प्रवृत्त होकर ब्रह्मा प्रजापतियों, समुद्रों, नदियों, गायत्री और चारों वेदों की उत्पत्ति से जुड़े कार्य सम्पन्न करते हैं।

इस वर्णन में सृष्टि की दो दिशाएँ दिखाई देती हैं। एक ओर प्रजापतियों के माध्यम से जीव-वंशों का विस्तार होता है, दूसरी ओर गायत्री और वेदों के उल्लेख से ज्ञान तथा धार्मिक परम्परा को भी सृष्टि की व्यवस्था में स्थान मिलता है।

ब्रह्मा के शरीर के आधे भाग से स्त्री की उत्पत्ति को इस पुराणिक आख्यान के सन्दर्भ में ही समझना चाहिए। यह सामान्य जैविक जन्म का विवरण नहीं, बल्कि सृष्टि की उत्पत्ति को दिव्य रूपक और वंश-परम्परा के माध्यम से व्यक्त करने की शैली है।

प्रजापति और महर्षियों की परम्परा

ब्रह्मा पहले विश्वेश और धर्म नामक पुत्रों की रचना करते हैं। इसके बाद अनेक महर्षियों का प्राकट्य होता है। इनमें दक्ष, मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, गौतम, भृगु और अंगिरा प्रमुख हैं। ये ऋषि केवल तपस्वी व्यक्तित्व नहीं हैं; कथा में इन्हें आगे चलकर अनेक वंशों और सृष्टिगत वर्गों के विस्तार का आधार बनाया गया है।

इन ऋषियों के माध्यम से सृष्टि का वर्णन वंशावली का रूप ग्रहण करता है। अलग-अलग ऋषियों से उत्पन्न वंश आगे चलकर देवों, असुरों और अन्य प्राणियों से सम्बद्ध होते हैं। इस प्रकार सृष्टि की विविधता को एक क्रमबद्ध परम्परा के रूप में समझाया गया है।

यहाँ ऋषि-परम्परा का महत्त्व दोहरा है। एक ओर वे प्रजा के विस्तार से जुड़े हैं, दूसरी ओर ज्ञान, तप और धार्मिक आचरण की परम्परा के वाहक हैं। पुराणिक विश्व में वंश और विद्या परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सांस्कृतिक व्यवस्था के पूरक पक्ष हैं।

दक्ष की कन्याएँ और कश्यप का वंश

इस अध्याय में दक्ष की कन्याओं का उल्लेख विशेष महत्त्व रखता है। अदिति, दिति, दनु, काला, अतायु, सिंहिका, मुनि, प्रधा, सुरसा, क्रोधा, विनता और कद्रू के नाम आते हैं। इनके माध्यम से आगे देवताओं, दैत्यों, दानवों, पक्षियों, नागों तथा अन्य प्राणियों के वंशों का वर्णन किया जाता है।

मरीचि के पुत्र कश्यप को तप के प्रभाव से शक्तिशाली बताया गया है। दक्ष अपनी कन्याओं का विवाह कश्यप से करते हैं। इस विवाह-सम्बन्ध के माध्यम से अनेक सृष्टिगत वंशों की उत्पत्ति का आख्यान आगे बढ़ता है। दक्ष द्वारा रोहिणी आदि नक्षत्रों को सोम से सम्बद्ध किए जाने का उल्लेख भी आता है।

इस वंश-वर्णन में विवाह केवल पारिवारिक घटना नहीं है। वह विभिन्न प्राणी-समूहों की उत्पत्ति को जोड़ने वाला कथात्मक माध्यम है। एक ही ऋषि-वंश से अनेक प्रकार के जीवों और दिव्य शक्तियों का सम्बन्ध स्थापित करके पुराण सृष्टि की विविधता को एक साझा वंश-व्यवस्था में रखता है।

धर्म, सुरभि और रुद्रों की उत्पत्ति

ब्रह्मा धर्म को लक्ष्मी, कीर्ति, साध्या, विश्वा और मरुत्वती नामक पाँच कन्याएँ प्रदान करते हैं। इसके बाद कथा ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न स्त्री के सुरभि—गौ के दिव्य स्वरूप—में प्रकट होने का वर्णन करती है।

सुरभि से गौवंश तथा अन्य जीवों और प्राकृतिक उपादानों के सम्बन्ध का वर्णन मिलता है। इसी प्रसंग में ग्यारह रुद्रों की उत्पत्ति का उल्लेख है। उनके नाम निरृति, सर्प, अज, एकपाद, मृगव्याध, पिनाकी, दहन, ईश्वर, अहिर्बुध्न्य, कपाली और सेनानी दिए गए हैं।

इन रुद्रों का वर्णन प्रचण्ड तेज और विशाल सामर्थ्य से युक्त रूपों में किया गया है। उनके नामों और स्वरूपों में उग्रता, शक्ति तथा प्रकृति के प्रभावशाली पक्षों की छाया दिखाई देती है। फिर भी इन्हें केवल विनाशकारी शक्तियों तक सीमित करना उचित नहीं होगा, क्योंकि रुद्र-परम्परा भारतीय धार्मिक साहित्य में अनेक स्तरों पर विकसित हुई है।

सुरभि से बैलों, औषधियों, वनस्पतियों और अन्य प्राकृतिक वस्तुओं के सम्बन्ध का उल्लेख भी इस कथा को व्यापक बनाता है। गौ का स्वरूप यहाँ केवल पशु-वंश की उत्पत्ति से सम्बद्ध नहीं है; वह पोषण, कृषि और जीवनोपयोगी संसाधनों के प्रतीकात्मक विस्तार से भी जुड़ता है।

देव, दैत्य, दानव और अन्य प्राणी-समूह

कश्यप और अदिति से आदित्यों की उत्पत्ति बताई गई है। इस अध्याय में इन्द्र, विष्णु, भग, त्वष्टा, वरुण, अंश, अर्यमन्, रवि, पूषा, मित्र तथा मनु आदि नाम आते हैं। पाठ में आदित्यों की सूची में कुछ नामों की पुनरावृत्ति अथवा पाठान्तर की सम्भावना दिखाई देती है; इसलिए इसे किसी अन्य पुराण की सूची से चुपचाप बदलने के बजाय इसी संस्करण के पाठ-सन्दर्भ में पढ़ना चाहिए।

दिति और दनु से दैत्य तथा दानव उत्पन्न होते हैं। सिंहिका से ग्रहों से सम्बद्ध वंश का वर्णन आता है; प्रधा से अप्सराएँ, क्रोधा से भूत, पिशाच, यक्ष और गुह्यक, विनता से अरुण और गरुड़ तथा कद्रू से नागों की उत्पत्ति कही गई है। सुरभि को चौपायों की जननी के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है।

इन वंशावलियों में प्रत्येक समूह की एक विशिष्ट उत्पत्ति बताई गई है। देव और असुर, पक्षी और नाग, गन्धर्व और अप्सराएँ—सभी को सृष्टि के व्यापक परिवार में स्थान मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि पुराण की सृष्टि-दृष्टि केवल मानव-केंद्रित नहीं है। वह मनुष्य के अतिरिक्त अनेक प्रकार के प्राणियों और दिव्य शक्तियों को भी विश्व-व्यवस्था का अंग मानती है।

इस अध्याय की सूचियों को आधुनिक जीव-विज्ञान की वर्गीकरण-प्रणाली समझना ठीक नहीं होगा। ये धार्मिक आख्यान, प्रतीकात्मक सम्बन्ध और वंश-परम्पराएँ हैं। इनका उद्देश्य प्राणियों की उत्पत्ति को सांस्कृतिक और दार्शनिक अर्थ देना है, न कि आधुनिक वैज्ञानिक वर्गीकरण प्रस्तुत करना।

सृष्टि-वर्णन का व्यापक अर्थ

ब्रह्मा की सृष्टि का यह प्रसंग दिखाता है कि पुराण में जगत् का निर्माण कई स्तरों पर समझा गया है। लोकों की रचना से उसका स्थानिक विस्तार होता है; मानसपुत्रों और ऋषियों से ज्ञान तथा वंश की परम्परा बनती है; प्रजापतियों और उनके वंशजों से देवों, असुरों और अन्य प्राणियों की विविधता सामने आती है।

इस व्यवस्था में सृष्टि का अर्थ केवल जीवन की संख्या बढ़ना नहीं है। उसके साथ सम्बन्ध, उत्तरदायित्व, ज्ञान, कर्म और विभिन्न शक्तियों के परस्पर प्रभाव का विचार भी जुड़ा है। अलग-अलग वंशों के माध्यम से कथा यह दिखाती है कि विविधता के बावजूद सभी प्राणी एक व्यापक सृष्टि-क्रम में स्थित हैं।

इस प्रसंग को पढ़ते समय पाठ-परम्पराओं के भेद को भी ध्यान में रखना चाहिए। विभिन्न पुराणों में नामों, वंशावलियों और घटनाओं के क्रम में अन्तर मिल सकता है। इसलिए हरिवंशपुराण के इस विवरण को अन्य ग्रन्थों की कथाओं से मिलाकर एक ही सूची बना देना उचित नहीं होगा।

इस प्रकार ब्रह्मा की सृष्टि का वर्णन लोक-रचना से आगे बढ़कर ऋषियों, प्रजापतियों और विविध प्राणी-वंशों के विस्तार तक पहुँचता है। अगला प्रसंग जनमेजय के प्रश्नों के माध्यम से इसी सृष्टि-विचार के कुछ गूढ़ पक्षों की ओर कथा को ले जाएगा।

मुकेश श्रीवास्तव आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

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