हरिवंशपुराण — भाग ७०- भविष्यपर्व — सृष्टि-रचना और पृथ्वी का उद्धार
हरिवंशपुराण — भाग ७०- भविष्यपर्व — सृष्टि-रचना और पृथ्वी का उद्धार
हरिवंशपुराण के भविष्यपर्व में सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन केवल यह बताने के लिए नहीं है कि संसार कैसे बना। इस आख्यान में यह प्रश्न भी उपस्थित होता है कि पृथ्वी, जल, आकाश, पर्वत और जीवों से युक्त संसार किस प्रकार एक व्यवस्थित रूप प्राप्त करता है। पिछले भाग में विष्णु के वराह-अवतार का प्रसंग आया था। इस भाग में उसी आख्यान का अगला पक्ष सामने आता है—सृष्टि की रचना, पृथ्वी पर पर्वतों का भार और भगवान द्वारा पृथ्वी को रसातल से ऊपर उठाना।
ब्रह्माण्ड की रचना
वैशम्पायन जनमेजय को बताते हैं कि वैदिक श्रुति में आरम्भिक ब्रह्माण्ड का वर्णन स्वर्णमय अण्ड के रूप में मिलता है। सृष्टि के आरम्भ में यह अण्ड समस्त जगत् की संभावनाओं को अपने भीतर समेटे हुए था। सृष्टि-कर्ता ने उसे विभाजित किया और उसके विभिन्न भागों से अलग-अलग लोकों तथा तत्त्वों की व्यवस्था बनी।
इस वर्णन में ब्रह्माण्ड का अण्ड अनेक भागों में विभक्त होता है। उसका ऊपरी भाग ब्रह्मलोक से और निचला भाग रसातल से सम्बद्ध किया गया है। अण्ड के भीतर स्थित विभिन्न तत्त्वों और रिक्त स्थानों से आकाश, लोकों तथा अन्य सृष्टिगत संरचनाओं की कल्पना की गई है। उसके द्रव अंश से स्वर्ण और पर्वतों की उत्पत्ति का वर्णन भी आता है।
यहाँ पुराण की सृष्टि-कल्पना एक ऐसे मूल आधार को प्रस्तुत करती है जिससे विविधता का विस्तार होता है। आरम्भ में जो एक समग्र संरचना थी, वह विभाजन और रूपान्तरण के माध्यम से अनेक लोकों तथा पदार्थों में व्यक्त होती है। यह प्राचीन भारतीय ब्रह्माण्ड-चिन्तन की विशिष्ट शैली है। इसे आधुनिक वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान का हूबहू विवरण मानने के बजाय उस समय की धार्मिक और दार्शनिक कल्पना के रूप में समझना अधिक उचित है।
पर्वतों का भार और पृथ्वी का संकट
सृष्टि-विस्तार के क्रम में पृथ्वी पर अनेक पर्वत उत्पन्न हुए। उनके विस्तार और भार से पृथ्वी दबने लगी। आख्यान के अनुसार, नारायण से सम्बद्ध दिव्य जल और ऊर्जा के प्रभाव के कारण पृथ्वी अपनी स्थिति को सँभाल नहीं सकी और रसातल की ओर जाने लगी।
यह प्रसंग सृष्टि की एक महत्त्वपूर्ण समस्या सामने रखता है। संसार का निर्माण हो जाना ही पर्याप्त नहीं है; निर्मित संसार का स्थिर रहना भी आवश्यक है। पृथ्वी पर पर्वत, जल और अन्य तत्त्वों का अस्तित्व सृष्टि की समृद्धि का संकेत है, लेकिन कथा में इन्हीं के असंतुलित भार से पृथ्वी संकट में पड़ जाती है।
पृथ्वी को यहाँ एक चेतन देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह भगवान से अपनी स्थिति कहती है और सहायता माँगती है। वह विष्णु को पुरुषोत्तम, नारायण तथा समस्त तत्त्वों के आधार के रूप में प्रणाम करती है। उसका कथन है कि वह स्वयं उन तत्त्वों को धारण नहीं कर सकती जिन्हें भगवान का आधार प्राप्त नहीं है।
यह कथन कथा के भीतर पृथ्वी और विष्णु के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। पृथ्वी जीवन का प्रत्यक्ष आधार है, लेकिन पौराणिक दृष्टि में स्वयं पृथ्वी भी एक व्यापक दैवी व्यवस्था पर आश्रित है।
पृथ्वी की प्रार्थना और विष्णु का आश्वासन
पृथ्वी भगवान से कहती है कि जब दानवों और राक्षसों के अत्याचार से वह पीड़ित होती है, तब वह उनकी शरण ग्रहण करती है। भय की स्थिति में भी वह उसी शाश्वत सत्ता का स्मरण करती है। भगवान उसे आश्वस्त करते हैं कि उसे भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है और वे उसे उसके उचित स्थान पर स्थापित करेंगे।
इसके बाद विष्णु विचार करते हैं कि पृथ्वी को रसातल से ऊपर उठाने के लिए उन्हें कौन-सा रूप धारण करना चाहिए। वे अपने वराह-रूप का संकल्प करते हैं। इस प्रकार पिछले भाग में वर्णित वराह-अवतार का प्रसंग यहाँ अपने उद्देश्य और कार्य के साथ स्पष्ट होता है।
भगवान का वराह-स्वरूप विशाल, पर्वत के समान शक्तिशाली और मेघ के समान गम्भीर वर्णित है। उनके श्वेत दाँत तेजस्वी हैं और उनकी गर्जना मेघों की गर्जना जैसी है। यह वर्णन केवल शारीरिक विशालता का चित्र नहीं बनाता, बल्कि उस असाधारण शक्ति को व्यक्त करता है जो पृथ्वी को उसके संकट से निकालने में समर्थ है।
यज्ञमय वराह का स्वरूप
इस अध्याय का एक विशिष्ट पक्ष वराह को यज्ञमय स्वरूप में देखना है। भगवान के वराह-रूप के अंगों को वैदिक यज्ञ और श्रुति से जोड़ा गया है। वेद उनके चरण हैं, यज्ञ के यूप उनके दाँत हैं, यज्ञ उनके हाथ हैं, अग्नि उनकी जिह्वा है और कुश उनके रोम हैं। ब्रह्म उनके मस्तक के रूप में वर्णित हैं।
इस रूपक का महत्त्व विशेष है। वराह केवल पृथ्वी को उठाने वाला शक्तिशाली प्राणी नहीं रह जाता; उसका सम्पूर्ण शरीर वैदिक यज्ञ-व्यवस्था का प्रतीक बन जाता है। सृष्टि के उद्धार और यज्ञ का यह सम्बन्ध संकेत करता है कि पुराण की दृष्टि में जगत् की व्यवस्था, धार्मिक कर्तव्य और दैवी संरक्षण परस्पर सम्बद्ध हैं।
भगवान इसी यज्ञमय वराह-रूप में रसातल में प्रवेश करते हैं। वे जल से आच्छादित पृथ्वी को अपने दाँतों पर धारण करते हैं और उसे ऊपर उठाकर उसके उचित स्थान पर स्थापित कर देते हैं। पृथ्वी स्थिर होने पर भगवान को प्रणाम करती है। इसके बाद विष्णु संसार के विभिन्न भागों और लोकों की व्यवस्था करने में प्रवृत्त होते हैं।
आख्यान का दार्शनिक अर्थ
इस कथा में पृथ्वी का उद्धार केवल एक संकट का समाधान नहीं है। यह सृष्टि की स्थिरता और उसके आधार के पुनर्स्थापन का आख्यान है। पृथ्वी स्वयं अनेक जीवों को धारण करती है, लेकिन पौराणिक कल्पना यह भी बताती है कि उसका अस्तित्व एक व्यापक व्यवस्था पर निर्भर है।
वराह का रूप इस विचार को और गहरा करता है कि संरक्षण के लिए किसी एक निश्चित बाहरी रूप की आवश्यकता नहीं होती। विष्णु का दिव्य कार्य उस रूप के माध्यम से सम्पन्न होता है जो परिस्थिति के अनुकूल है। इस कथा में वराह-रूप की महत्ता उसकी आकृति से अधिक उसके कार्य में है—वह पृथ्वी को बचाता है और सृष्टि को पुनः स्थिर करता है।
यज्ञमय वराह का रूप सृष्टि और धर्म के सम्बन्ध को भी सामने लाता है। यहाँ यज्ञ केवल अग्नि में आहुति देने की क्रिया नहीं, बल्कि उस व्यापक व्यवस्था का प्रतीक बन जाता है जिसके भीतर विभिन्न तत्त्व अपना स्थान और कार्य प्राप्त करते हैं।
आधुनिक दृष्टि से इस आख्यान को पढ़ते समय पृथ्वी की स्थिरता, जीवन के आधार और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व जैसे प्रश्नों पर विचार किया जा सकता है। फिर भी इन आधुनिक अर्थों को मूल ग्रंथ का प्रत्यक्ष वैज्ञानिक सिद्धान्त नहीं मानना चाहिए। वे कथा से प्रेरित समकालीन व्याख्याएँ हैं।
शोधपरक निष्कर्ष
भविष्यपर्व का यह अध्याय सृष्टि की उत्पत्ति, पृथ्वी के संकट, उसकी प्रार्थना और विष्णु द्वारा उसके उद्धार को एक क्रम में प्रस्तुत करता है। वराह-अवतार यहाँ केवल असुर-वध का प्रसंग नहीं, बल्कि पृथ्वी को पुनः स्थिर करने और सृष्टि की व्यवस्था स्थापित करने का रूप है। यज्ञमय वराह की कल्पना इस कथा को वैदिक धार्मिक प्रतीकों से भी जोड़ती है।
इस प्रकार भाग ६९ में प्रस्तुत वराह-अवतार का प्रसंग भाग ७० में अपने व्यापक सृष्टिगत अर्थ को प्राप्त करता है।
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