हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - भाग–६१ : प्राणायाम की प्रक्रिया

 हरिवंशपुराण शोधग्रन्थ - भाग–६१ : प्राणायाम की प्रक्रिया — श्वास, मन और आत्मबोध

कभी आपने ध्यान दिया है कि जब मनुष्य क्रोधित होता है, तो उसकी साँस तेज हो जाती है? भय की स्थिति में श्वास का क्रम बदल जाता है और मन शान्त होने पर साँस प्रायः सहज हो जाती है। इससे हमें अपने शरीर और मन के बीच एक सम्बन्ध दिखाई देता है।

श्वास जीवन की सामान्य क्रिया है, लेकिन भारतीय योग-परम्परा में इसे मन की एकाग्रता और आत्मचिन्तन से जोड़कर भी देखा गया है। प्राणायाम इसी सम्बन्ध को समझने और साधने की एक विधि है।

हरिवंशपुराण के भविष्यपर्व में प्राणायाम का वर्णन केवल श्वास लेने और छोड़ने की शारीरिक क्रिया के रूप में नहीं किया गया है। इस प्रसंग में इन्द्रिय-संयम, मन की एकाग्रता, प्राण की गति, यज्ञ की प्रतीकात्मक व्याख्या और ब्रह्मज्ञान को एक-दूसरे से जोड़ा गया है।

पिछले भाग में योग के फल और समाधि की चर्चा हुई थी। इस भाग में हम उसी विषय को आगे बढ़ाते हुए प्राणायाम की प्रक्रिया तथा उसके दार्शनिक आशय को समझेंगे।

प्राणायाम की ओर पहला कदम

भविष्यपर्व के इस अध्याय में वैशम्पायन उन साधकों का वर्णन करते हैं, जो अपनी इन्द्रियों और क्रोध पर नियन्त्रण रखने का प्रयास करते हैं। वे संयमित जीवन जीते हैं और शुद्ध ब्रह्म के ज्ञान के लिए मन को एकाग्र करते हैं।

इस वर्णन में नासिका और भौंहों के बीच के क्षेत्र पर ध्यान केन्द्रित करने का उल्लेख मिलता है। साधक इस क्षेत्र को ध्यान का केन्द्र बनाकर ब्रह्म के साक्षात्कार की दिशा में आगे बढ़ते हैं।

इस विवरण को समझते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि प्राचीन योगग्रन्थ शरीर, प्राण और चेतना के सम्बन्ध को अपनी विशिष्ट पारिभाषिक भाषा में व्यक्त करते हैं। उनके सभी शारीरिक विवरणों को आधुनिक शरीर-विज्ञान के कथनों के समान नहीं माना जा सकता।

इस प्रसंग का मूल आशय साधक के ध्यान, श्वास और आत्मबोध के बीच सम्बन्ध स्थापित करना है।

प्राण क्या है?

भारतीय दर्शन और योग-साहित्य में प्राण शब्द का अर्थ केवल सामान्य वायु नहीं है। इसका सम्बन्ध जीवन की सक्रियता और जीवित शरीर की क्रियाओं से भी है।

सामान्य भाषा में हम कहते हैं कि किसी व्यक्ति में बहुत ऊर्जा है, वह उत्साह से काम करता है या थककर उसकी शक्ति कम हो गई है। ये कथन जीवन की सक्रियता को व्यक्त करते हैं। योग-परम्परा में प्राण की धारणा इससे अधिक व्यापक है और शरीर में जीवन-क्रियाओं के संचालन से जुड़ी मानी जाती है।

प्राणायाम के प्रसंग में श्वास को इस जीवन-शक्ति की अभिव्यक्ति से जोड़कर देखा गया है। साधक श्वास के प्रति सजग होता है और उसके माध्यम से अपने मन को एकाग्र करने का अभ्यास करता है।

यहाँ एक आवश्यक अन्तर है। प्राण भारतीय योग-दर्शन की पारम्परिक अवधारणा है; इसे आधुनिक विज्ञान में मापी जाने वाली ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड या किसी एक शारीरिक प्रक्रिया के बिल्कुल समान नहीं मानना चाहिए।

तीन प्रमुख क्रियाएँ — पूरक, कुम्भक और रेचक

हरिवंशपुराण के इस अध्याय में तीन क्रियाओं का उल्लेख मिलता है—पूरक, कुम्भक और रेचक। ये प्राणायाम की भारतीय परम्परा में प्रचलित प्रमुख संज्ञाएँ हैं।

पूरक का अर्थ है श्वास को भीतर लेना।

कुम्भक का अर्थ है श्वास को रोककर रखना।

रेचक का अर्थ है श्वास को बाहर छोड़ना।

ग्रन्थ इन क्रियाओं को प्राण के नियमन और आत्मज्ञान की साधना से जोड़ता है। इसका आशय यह है कि श्वास की गति पर सजगता साधक के लिए एकाग्रता का आधार बन सकती है।

हालाँकि केवल इन तीन क्रियाओं के नाम जान लेना प्राणायाम की सम्पूर्ण विधि को समझ लेना नहीं है। अलग-अलग योग-परम्पराओं में इनके अभ्यास, अनुपात और उद्देश्य अलग हो सकते हैं। विशेष रूप से श्वास रोकने के अभ्यास को बिना प्रशिक्षण के कठिन या लम्बा करना उचित नहीं है।

प्राण और मन का सम्बन्ध

प्राणायाम के इस आख्यान में शरीर के भीतर प्राण की गति, विभिन्न नाड़ियों और पाँच प्राणों का उल्लेख आता है। यह प्राचीन योग-परम्परा की शरीर और जीवन को समझने वाली अवधारणात्मक भाषा है।

योग-साहित्य में सामान्यतः पाँच प्रमुख प्राणों का वर्णन मिलता है—प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। इनके माध्यम से शरीर की विभिन्न जीवन-क्रियाओं का पारम्परिक विवेचन किया जाता है।

इस व्यवस्था को आधुनिक शरीर-विज्ञान की किसी एक स्थापित शारीरिक संरचना के बराबर मानना सही नहीं होगा। फिर भी यह समझने योग्य है कि प्राचीन साधक शरीर को केवल अंगों का समूह नहीं मानते थे; वे उसकी क्रियाओं, श्वास, मन और चेतना के बीच सम्बन्ध की खोज भी करते थे।

हम अपने दैनिक अनुभव से भी समझ सकते हैं कि मानसिक स्थिति और श्वास में परस्पर सम्बन्ध होता है। तनाव के समय साँस बदल सकती है और शान्त वातावरण में उसका क्रम सहज हो सकता है। लेकिन इस सम्बन्ध से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि श्वास का प्रत्येक परिवर्तन किसी एक निश्चित मानसिक अवस्था का प्रमाण है।

प्राणायाम की साधना में श्वास के प्रति सजगता मनुष्य को अपनी वर्तमान स्थिति पहचानने में सहायता दे सकती है। यही सजगता आगे चलकर आत्मनिरीक्षण का आधार बनती है।

बाहरी यज्ञ और आन्तरिक यज्ञ

इस अध्याय का एक विशेष पक्ष यज्ञ की प्रतीकात्मक व्याख्या है। ग्रन्थ में बाहरी यज्ञ और मानसिक अथवा आध्यात्मिक यज्ञ के बीच अन्तर प्रस्तुत किया गया है।

बाहरी यज्ञ में अग्नि, घृत, अन्न, यज्ञ-पात्र और अन्य सामग्रियों का उपयोग होता है। इसके विपरीत, आन्तरिक यज्ञ में मन की प्रवृत्तियों को साधना और आत्मा की ओर एकाग्र होना महत्त्वपूर्ण माना गया है।

यहाँ यज्ञ को एक व्यापक प्रतीक के रूप में समझा जा सकता है। मनुष्य अपने भीतर अनेक प्रकार की इच्छाएँ, प्रतिक्रियाएँ और आसक्तियाँ लेकर चलता है। साधना का उद्देश्य इन प्रवृत्तियों को समझना और उनके प्रभाव से मुक्त होने का प्रयास करना हो सकता है।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को बार-बार क्रोध आता है। वह क्रोध को उचित ठहराने के बजाय यह देखना शुरू करता है कि उसके भीतर कौन-सी अपेक्षा, भय या अहंकार इस प्रतिक्रिया को बढ़ाता है। वह अपनी प्रतिक्रिया को पहचानकर उसके प्रभाव को कम करने का अभ्यास करता है।

यह आत्मनिरीक्षण की एक प्रक्रिया है। इसे पुराण में वर्णित यज्ञ का आधुनिक प्रतीकात्मक अर्थ समझा जा सकता है, यद्यपि यह ग्रन्थ के मूल अनुष्ठानिक अर्थ का स्थान नहीं लेता।

अहंकार की आहुति

आन्तरिक यज्ञ की व्याख्या करते हुए एक और प्रश्न सामने आता है—मनुष्य साधना में वास्तव में क्या अर्पित करता है?

बाहरी यज्ञ में कोई पदार्थ अग्नि को समर्पित किया जाता है। आन्तरिक साधना में व्यक्ति अपनी आसक्तियों, अहंकार और अनियन्त्रित प्रतिक्रियाओं को पहचानने का प्रयास कर सकता है।

यहाँ अहंकार की आहुति का अर्थ अपने आत्मसम्मान को नष्ट करना नहीं है। इसका आशय उस कठोर आग्रह को समझना है, जिसमें व्यक्ति अपने विचार को ही अन्तिम सत्य मान लेता है और दूसरों के अनुभवों को सुनने से इनकार कर देता है।

यदि कोई व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार नहीं कर सकता, तो उसका ज्ञान भी उसके अहंकार को बढ़ा सकता है। इसके विपरीत, यदि वह अपने विचारों की समीक्षा करने के लिए तैयार है, तो ज्ञान उसके व्यवहार को अधिक विवेकपूर्ण बना सकता है।

इस अर्थ में आन्तरिक यज्ञ ज्ञान और आत्मसंयम की प्रक्रिया है। इसमें मनुष्य अपने भीतर की बाधाओं को पहचानकर अधिक स्पष्ट दृष्टि विकसित करने का प्रयास करता है।

ब्रह्मज्ञान और इन्द्रिय-संयम

अध्याय में ब्रह्मज्ञान को इन्द्रियों और उनके विषयों से उत्पन्न आसक्ति के नियन्त्रण से जोड़ा गया है। इसमें यह विचार सामने आता है कि मनुष्य इन्द्रिय-विषयों के प्रति आकर्षण और अपने पुराने संस्कारों के कारण बार-बार प्रभावित होता है।

इन्द्रियों को पूरी तरह नष्ट कर देना इसका व्यावहारिक अर्थ नहीं है। देखना, सुनना, स्वाद लेना और अन्य इन्द्रिय-अनुभव जीवन का स्वाभाविक भाग हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति हर आकर्षण के सामने विवेक खो देता है।

मान लीजिए, किसी व्यक्ति को प्रशंसा की आदत पड़ गई है। वह अपने प्रत्येक काम का मूल्य दूसरों की स्वीकृति से तय करने लगता है। जब प्रशंसा मिलती है, तो वह प्रसन्न होता है; जब आलोचना होती है, तो वह विचलित हो जाता है।

आत्मनिरीक्षण से वह समझ सकता है कि उसकी प्रसन्नता और दुःख बाहरी प्रतिक्रियाओं पर अत्यधिक निर्भर हो गए हैं। इस समझ के बाद वह अपने कर्म का मूल्य केवल प्रशंसा से नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता, सत्यता और नैतिकता से आँकने का अभ्यास कर सकता है।

इन्द्रिय-संयम का व्यापक अर्थ यही है कि मनुष्य अनुभवों से भागे नहीं, बल्कि उनके प्रभाव को समझते हुए विवेकपूर्ण व्यवहार करे।

सबमें एक आत्मा देखने का विचार

इस प्रसंग के अन्तिम भाग में शरीर और इन्द्रियों को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेने की प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाया गया है। जब मनुष्य केवल बाहरी भेदों के आधार पर एक-दूसरे को अलग और विरोधी मानता है, तब संघर्ष बढ़ सकता है।

ग्रन्थ के अनुसार, एकाग्रता के माध्यम से जब साधक सभी में एक आत्मा का बोध करता है, तब वह अन्य प्राणियों के प्रति मैत्री का भाव विकसित कर सकता है। यह कथन आत्मज्ञान को नैतिक व्यवहार से जोड़ता है।

यदि कोई व्यक्ति कहता है कि उसने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है, लेकिन उसके व्यवहार में घृणा, ईर्ष्या और दूसरों के प्रति निरन्तर तिरस्कार बना रहता है, तो उसके दावे की समीक्षा आवश्यक है।

आत्मज्ञान का आदर्श केवल किसी दार्शनिक विचार को स्वीकार करना नहीं है। उसके साथ मनुष्य के व्यवहार, दृष्टिकोण और सम्बन्धों में भी परिवर्तन अपेक्षित है।

यहाँ से एक व्यापक नैतिक प्रश्न जन्म लेता है—क्या हम दूसरे मनुष्य को केवल उसकी सामाजिक पहचान, स्थिति या बाहरी भिन्नताओं से देखते हैं, अथवा उसके अनुभव और गरिमा को भी समझने का प्रयास करते हैं?

हरिवंश के इस प्रसंग में एकात्मता का विचार साधना को संकीर्ण व्यक्तिगत उपलब्धि से आगे ले जाकर सभी प्राणियों के प्रति दृष्टिकोण से जोड़ता है।

क्रोध और ईर्ष्या से मुक्ति

अध्याय में क्रोध और ईर्ष्या जैसी प्रवृत्तियों का भी उल्लेख है। ये दोनों मनुष्य की ऊर्जा को संघर्ष की दिशा में मोड़ सकती हैं।

क्रोध कभी अन्याय के प्रति प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न हो सकता है, लेकिन जब वह विवेक को ढक लेता है, तो व्यक्ति अपने ही उद्देश्य को हानि पहुँचा सकता है। इसी प्रकार ईर्ष्या दूसरे की सफलता को देखकर अपने जीवन को निरन्तर तुलना में बाँध देती है।

इन भावनाओं को पहचानना और उनके कारणों को समझना आत्मसंयम का महत्त्वपूर्ण भाग है। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अन्याय देखकर मौन रहे या अपनी आवश्यकताओं की उपेक्षा करे। बल्कि इसका अर्थ है कि वह अपनी प्रतिक्रिया को इस प्रकार व्यवस्थित करे कि उसका निर्णय केवल आवेग से संचालित न हो।

ग्रन्थ की दृष्टि में ब्रह्मज्ञान की ओर बढ़ने वाले साधक के लिए मन का संयम आवश्यक है। इस विचार को आधुनिक जीवन में आत्मनिरीक्षण, भावनात्मक सजगता और विवेकपूर्ण निर्णय के अभ्यास के रूप में समझा जा सकता है।

आत्मसन्तुलन की दृष्टि से प्राणायाम

आत्मसन्तुलन के दृष्टिकोण से इस अध्याय के तीन पक्ष विशेष महत्त्व रखते हैं।

पहला, श्वास के प्रति सजगता। श्वास पर ध्यान देने से व्यक्ति कुछ समय के लिए अपने बिखरे हुए ध्यान को वर्तमान क्षण में ला सकता है।

दूसरा, मन की प्रवृत्तियों का निरीक्षण। साधना के दौरान व्यक्ति यह देख सकता है कि उसके भीतर कौन-से विचार और भावनाएँ बार-बार उठती हैं।

तीसरा, आचरण में विवेक। आत्मनिरीक्षण तभी उपयोगी बनता है, जब वह व्यक्ति को अपने व्यवहार की समीक्षा करने और आवश्यक परिवर्तन करने में सहायता देता है।

ये तीनों पक्ष परस्पर जुड़े हुए हैं। केवल श्वास पर ध्यान देने से जीवन की सभी समस्याएँ समाप्त नहीं होतीं, और न ही किसी एक अभ्यास से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति सुनिश्चित होती है। प्राणायाम को एक व्यापक साधना-पथ के हिस्से के रूप में समझना अधिक उचित है।

जो व्यक्ति प्राणायाम का अभ्यास करना चाहता है, उसे सहज और सुरक्षित अभ्यास से शुरुआत करनी चाहिए। श्वास को बलपूर्वक रोकना, अत्यधिक देर तक कुम्भक करना या असुविधा के बावजूद अभ्यास जारी रखना उचित नहीं है। कठिन अभ्यास योग्य प्रशिक्षक के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।

हरिवंशपुराण के भविष्यपर्व का प्राणायाम-विषयक अध्याय श्वास, मन, इन्द्रिय-संयम और आत्मज्ञान के सम्बन्ध को सामने रखता है। इसमें पूरक, कुम्भक और रेचक का उल्लेख है, साथ ही आन्तरिक यज्ञ की प्रतीकात्मक व्याख्या भी मिलती है।

इस प्रसंग का व्यापक आशय यह है कि साधना केवल बाहरी अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। मनुष्य को अपने भीतर की आसक्तियों, क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार को समझने का प्रयास भी करना चाहिए।

प्राणायाम की परम्परा हमें श्वास के प्रति सजगता की ओर ले जाती है, जबकि आत्मचिन्तन उस सजगता को जीवन की समझ से जोड़ता है। जब साधना के साथ विवेक और नैतिक उत्तरदायित्व भी विकसित होते हैं, तभी उसका प्रभाव दैनिक जीवन में दिखाई देने लगता है।

पाठ का मुख्य संकेत यही है कि आत्मज्ञान की खोज में शरीर, श्वास, मन और आचरण को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

पाठ-सम्बन्धी शोध-टिप्पणी

यह लेख मन्मथनाथ दत्त के अंग्रेज़ी अनुवाद में उपलब्ध हरिवंश के भविष्यपर्व के “The Process of Pranayama” शीर्षक वाले अध्याय पर आधारित है। उस अनुवाद के टिप्पणीकार ने इस अध्याय को प्रतीकात्मक माना है और इसके अनेक कथनों की रूपकात्मक व्याख्या की है। इसलिए यहाँ मूल आख्यान, पारम्परिक योग-संज्ञाओं और आधुनिक व्याख्या के बीच अन्तर बनाए रखा गया है।

मुकेश श्रीवास्तव

आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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