हरिवंशपुराण — भाग ४९ - प्रलय का आख्यान

 हरिवंशपुराण — भाग ४९ - प्रलय का आख्यान : सृष्टि का लय और नारायण की अनंत सत्ता

युगचक्र और ब्रह्मा के दिन की चर्चा के बाद भविष्यपर्व अब उस अवस्था का वर्णन करता है, जब सृष्टि के विविध रूप क्रमशः विलीन होने लगते हैं। इस प्रसंग का केंद्र केवल विनाश नहीं, बल्कि यह प्रश्न है कि परिवर्तनशील जगत् के लय के बाद मूल सत्ता की स्थिति किस प्रकार समझी जाती है।

सृष्टि के अंत की ओर

पुराण की ब्रह्मांड-दृष्टि में सृष्टि का प्रकट होना ही उसका अंतिम सत्य नहीं है। जिस जगत् में पर्वत, नदियाँ, वन, जीव-जंतु, देवता और मनुष्य दिखाई देते हैं, वह एक व्यापक कालचक्र के भीतर स्थित है। जब ब्रह्मा का दिन समाप्त होता है, तब इस प्रकट जगत् के क्षय का प्रसंग आरंभ होता है।

यहाँ प्रलय को केवल एक नगर, राज्य या पृथ्वी के किसी भाग के नष्ट होने की घटना के रूप में नहीं देखा गया है। इसका विस्तार समस्त दृश्य जगत् तक है। सृष्टि के विभिन्न रूप अपने परिचित स्वरूप में बने नहीं रहते; वे क्रमशः उस अवस्था की ओर बढ़ते हैं, जिसमें उनकी वर्तमान अभिव्यक्ति समाप्त हो जाती है।

इस वर्णन के माध्यम से पुराण एक मूलभूत अंतर स्थापित करता है—रूप का नष्ट होना और मूल सत्ता का नष्ट हो जाना एक ही बात नहीं है। दृश्य जगत् परिवर्तन के अधीन है, किंतु जिस परम सत्ता को उसका आधार माना गया है, उसे उसी प्रकार नश्वर नहीं बताया गया।

अग्नि और सूर्य का प्रलयकारी रूप

वैशम्पायन के वर्णन में नारायण प्रलय के समय अनेक रूपों में कार्य करते हैं। सूर्य के रूप में वे जीवों की दृष्टि और जीवन की सामान्य स्थितियों को प्रभावित करते हैं; वायु के रूप में प्राणों को हर लेते हैं; अग्नि के रूप में लोकों को भस्म करते हैं और मेघ के रूप में ऐसी वर्षा होती है जो प्रलय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाती है।

यहाँ प्रकृति की शक्तियाँ केवल स्वतंत्र प्राकृतिक घटनाओं के रूप में नहीं आतीं। पुराण की दृष्टि में वे परम सत्ता की व्यापक क्रिया के विभिन्न रूप हैं। सूर्य, वायु, अग्नि और जल—जो सामान्य जीवन में जगत् के पोषण के साधन हैं—प्रलय के समय उसी जगत् के विघटन से जुड़ जाते हैं।

इस वर्णन में एक उल्लेखनीय विरोधाभास है। अग्नि जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन अत्यधिक अग्नि विनाशकारी हो सकती है। जल जीवन का आधार है, किंतु जब वह समस्त भूमि को ढक लेता है, तब परिचित जीवन-व्यवस्था समाप्त हो जाती है। वायु प्राणों के लिए अनिवार्य है, लेकिन प्रलय में वही प्राणों के लय का माध्यम बनती है।

इस प्रकार प्रलय का आख्यान प्रकृति के उन्हीं तत्त्वों को उनके विपरीत प्रभावों के साथ प्रस्तुत करता है, जिन पर सामान्य जीवन निर्भर करता है।

स्थूल और सूक्ष्म शरीर का लय

प्रलय का वर्णन केवल पर्वतों, वृक्षों, नगरों और जीवों के विनाश तक सीमित नहीं रहता। वैशम्पायन स्थूल और सूक्ष्म शरीर के लय का भी उल्लेख करते हैं।

स्थूल शरीर वह दृश्य शारीरिक संरचना है, जिसके माध्यम से जीव संसार में व्यवहार करता है। सूक्ष्म शरीर की अवधारणा भारतीय दार्शनिक परंपराओं में मन, इंद्रियों, प्राण और अनुभव की सूक्ष्म प्रक्रियाओं से संबंधित है। इन दोनों के लय का अर्थ है कि जीव का परिचित शारीरिक और अनुभवगत स्वरूप भी अपनी वर्तमान अवस्था में नहीं रहता।

यहाँ एक सावधानी आवश्यक है। पुराण में स्थूल और सूक्ष्म शरीर की चर्चा धार्मिक-दर्शनात्मक अवधारणाओं के भीतर होती है। इसे आधुनिक शरीर-विज्ञान का प्रत्यक्ष विवरण नहीं माना जाना चाहिए।

कथा का व्यापक संकेत यह है कि प्रलय में केवल बाहरी दृश्य जगत् ही नहीं, बल्कि उस जगत् का अनुभव करने वाले जीवों की वर्तमान संरचनाएँ भी समाप्त हो जाती हैं। इस प्रकार लय की प्रक्रिया बाहरी प्रकृति से आगे बढ़कर जीव के अस्तित्व की पारंपरिक व्याख्या तक पहुँचती है।

इंद्रियों और उनके विषयों का अपने मूल में लौटना

प्रलय के प्रसंग में इंद्रियों और उनके विषयों के क्रमिक लय का भी वर्णन है। गंध और घ्राणेंद्रिय का संबंध पृथ्वी से, रस और रसना का संबंध जल से, रूप और दृष्टि का संबंध तेज से तथा स्पर्श और त्वचा का संबंध वायु से जोड़ा जाता है। प्राण और गति भी वायु से संबंधित बताए जाते हैं।

यह वर्णन भारतीय तत्त्वचिंतन की उस परंपरा से जुड़ा है जिसमें इंद्रियों, उनके विषयों और महाभूतों के बीच विशिष्ट संबंध माना गया है। प्रलय के समय ये संबंध अपनी सामान्य कार्यशीलता खो देते हैं और संबंधित तत्त्व व्यापक मूल सत्ता में लीन होने लगते हैं।

यहाँ लय का अर्थ केवल एक वस्तु का दूसरी वस्तु में भौतिक रूप से बदल जाना नहीं है। यह उस व्यवस्था के विघटन का भी संकेत है जिसके भीतर इंद्रिय, विषय और अनुभव एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।

सामान्य अवस्था में आँख रूप को देखती है, जीभ रस का अनुभव करती है और त्वचा स्पर्श को ग्रहण करती है। प्रलय के वर्णन में इस व्यवस्था का आधार ही समाप्त होने लगता है। अनुभव की परिचित संरचना अब पहले की तरह कार्य नहीं करती।

संवर्तक अग्नि और जगत् का दाह

इसके बाद संवर्तक अग्नि का वर्णन आता है। यह प्रलयकारी अग्नि पर्वतों, वृक्षों, वनों, लताओं, नगरों, आश्रमों, भवनों और अन्य निवास-स्थानों को जला देती है।

यह दृश्य सृष्टि के बाहरी ढाँचे के पूर्ण विघटन का प्रतीक है। पर्वत स्थिरता के, वृक्ष जीवन और विस्तार के, नगर सामाजिक व्यवस्था के और आश्रम तपस्या तथा ज्ञान के केंद्र के रूप में समझे जा सकते हैं। प्रलय के समय ये सभी परिचित रूप नष्ट हो जाते हैं।

लेकिन आख्यान केवल अग्नि के प्रचंड दाह पर समाप्त नहीं होता। अग्नि के बाद जल की भूमिका आती है। हरि कर्म के जल से अग्नि को शांत करते हैं और फिर विशाल मेघ का रूप धारण करके पृथ्वी को जल से भर देते हैं।

इस क्रम में अग्नि और जल विरोधी तत्त्व होते हुए भी एक ही व्यापक प्रक्रिया के अंग बनते हैं। पहले दाह से स्थूल रूपों का विनाश होता है, फिर जल समस्त भूभाग को ढक लेता है। पर्वत और वृक्ष जल में डूब जाते हैं और पृथ्वी एक विस्तृत जलराशि के रूप में वर्णित होती है।

एकार्णव : जब समस्त जगत् जल में स्थित होता है

प्रलय की प्रक्रिया आगे बढ़ने पर पृथ्वी जल से ढक जाती है। पर्वत, वृक्ष और अन्य दृश्य संरचनाएँ जल के नीचे चली जाती हैं। जीवों से रहित यह व्यापक जलराशि पुराण में एकार्णव के रूप में वर्णित है।

एकार्णव का अर्थ है—एक विशाल, अविभाजित जलराशि। इस अवस्था में संसार की सामान्य विविधता दिखाई नहीं देती। पृथ्वी के परिचित प्रदेश, पर्वतों की ऊँचाई, नदियों का अलग-अलग प्रवाह और जीवों की गतिविधियाँ समाप्त हो जाती हैं।

यहाँ जल केवल किसी भूभाग पर आई बाढ़ का वर्णन नहीं है। यह उस अवस्था का प्रतीक है जिसमें सृष्टि के पृथक-पृथक रूप अपनी पहचान खो देते हैं और जगत् एक व्यापक अव्यक्त स्थिति में पहुँच जाता है।

इसलिए एकार्णव को सामान्य प्राकृतिक आपदा के समान पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। यह पुराण की ब्रह्मांडीय कल्पना है, जिसमें समस्त दृश्य जगत् के लय को एक प्रतीकात्मक और धार्मिक रूप दिया गया है।

नारायण की योगनिद्रा

जब समस्त सृष्टि जल में लीन हो जाती है, तब नारायण अकेले शेष रहते हैं। वैशम्पायन उन्हें अनंत बुद्धि वाले, सनातन पुरुष के रूप में वर्णित करते हैं, जो अपनी प्राचीन अवस्था में स्थित रहते हैं।

वे व्यापक जलराशि में योगनिद्रा में स्थित हैं। देवता, मनुष्य, पर्वत, नदियाँ और अन्य सृष्टिगत रूप अब अपनी सामान्य अभिव्यक्ति में दिखाई नहीं देते। महाभूत भी सूक्ष्म अवस्था में लीन हैं।

इस प्रसंग में योगनिद्रा को सामान्य मनुष्य की नींद के समान नहीं समझना चाहिए। यह उस ब्रह्मांडीय अवस्था का वर्णन है जिसमें सृष्टि की सक्रिय अभिव्यक्ति स्थगित है, जबकि नारायण की सत्ता बनी रहती है।

यही इस आख्यान का केंद्रीय दार्शनिक बिंदु है—सृष्टि का प्रकट रूप समाप्त हो सकता है, लेकिन जिस परम सत्ता को उसका मूल माना गया है, वह समाप्त नहीं होती। नारायण की योगनिद्रा सृष्टि की सक्रियता और उसके अव्यक्त रहने के बीच की अवस्था को व्यक्त करती है।

जनमेजय का नया प्रश्न

प्रलय का यह वर्णन सुनकर जनमेजय के मन में कई प्रश्न उठते हैं। वे पूछते हैं कि यह सर्वव्यापी समुद्र क्या है, उस समय स्थित रहने वाला पुरुष कौन है, योग का वास्तविक स्वरूप क्या है और योगी किसे कहा जाता है।

ये प्रश्न कथा को अगले दार्शनिक चरण की ओर ले जाते हैं। अब चर्चा केवल इस बात की नहीं है कि सृष्टि का अंत कैसे होता है। प्रश्न यह है कि प्रलय की अवस्था में नारायण को किस प्रकार समझा जाए और योगनिद्रा का तात्त्विक अर्थ क्या है।

जनमेजय की जिज्ञासा यहाँ महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह आख्यान को वर्णन से विचार की ओर ले जाती है। दृश्य घटनाओं का क्रम सुन लेने के बाद वे उनके पीछे स्थित सिद्धांत को जानना चाहते हैं।

यही पुराण की संवाद-परंपरा की विशेषता है—कथा एक प्रश्न उत्पन्न करती है और वह प्रश्न आगे नए ज्ञान का मार्ग खोलता है।

शोधपरक समीक्षा

इस प्रसंग में प्रलय की प्रक्रिया क्रमशः विकसित होती है। पहले सृष्टि की विविध संरचनाओं का क्षय होता है, फिर सूर्य, वायु, अग्नि और जल जैसी शक्तियों के माध्यम से विनाश का वर्णन आता है। इसके बाद इंद्रियों और उनके विषयों के लय, संवर्तक अग्नि, एकार्णव तथा नारायण की योगनिद्रा का चित्र प्रस्तुत होता है।

इस क्रम को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है।

ब्रह्मांडीय स्तर पर, प्रकट जगत् अपनी वर्तमान संरचना खो देता है।

दार्शनिक स्तर पर, इंद्रियों, विषयों और महाभूतों के संबंधों का लय बताया जाता है।

धार्मिक स्तर पर, नारायण को उस परम सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है जो सृष्टि के प्रकट और अप्रकट दोनों चरणों से संबंधित है।

इन तीनों स्तरों को एक साथ समझने पर स्पष्ट होता है कि प्रलय का आख्यान केवल विनाश की कथा नहीं है। वह सृष्टि के अस्तित्व और उसके मूल कारण के संबंध को समझाने का प्रयास भी है।

यहाँ यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि पुराण का ब्रह्मांड-वर्णन धार्मिक और दार्शनिक विश्वदृष्टि का हिस्सा है। इसे आधुनिक खगोल-विज्ञान के प्रमाणित मॉडल के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। इसका अध्ययन उसके अपने सांस्कृतिक, साहित्यिक और तात्त्विक संदर्भ में करना अधिक उचित है।

इस भाग का सार

ब्रह्मा के दिन की समाप्ति पर नारायण की प्रलयकारी शक्ति सक्रिय होती है। सूर्य, वायु, अग्नि और जल के माध्यम से सृष्टि के दृश्य रूपों का लय होता है। इंद्रियों और उनके विषयों का संबंध भी समाप्त होने लगता है। संवर्तक अग्नि जगत् को भस्म करती है और जल समस्त पृथ्वी को ढक लेता है। अंततः नारायण एकार्णव में योगनिद्रा में स्थित रहते हैं, जबकि सृष्टि अपने अव्यक्त रूप में लीन हो जाती है।

अगले भाग में

अगले भाग में जनमेजय के प्रश्नों के उत्तर में प्रलय के बाद नारायण की अवस्था, योगनिद्रा और परम पुरुष के स्वरूप का विवेचन होगा। इससे यह समझने का अवसर मिलेगा कि हरिवंशपुराण सृष्टि के लय के बाद शेष रहने वाली सत्ता को किस प्रकार व्यक्त करता है।

मुकेश श्रीवास्तव आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

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