भाग ५६ — परम ब्रह्म का स्वरूप : सृष्टि, जीव और मोक्ष का सम्बन्ध

 भाग ५६ — परम ब्रह्म का स्वरूप : सृष्टि, जीव और मोक्ष का सम्बन्ध

जनमेजय की जिज्ञासा के उत्तर में ब्रह्मज्ञान का विवेचन

जनमेजय ने जब ब्रह्मज्ञान का सार जानने की इच्छा प्रकट की, तब महर्षि वैशम्पायन ने उन्हें परम तत्त्व के स्वरूप, सृष्टि की उत्पत्ति, जीव की स्थिति और मुक्ति के मार्ग का वर्णन सुनाया। इस विवेचन का उद्देश्य केवल यह बताना नहीं था कि संसार कैसे उत्पन्न हुआ, बल्कि यह समझाना भी था कि मनुष्य संसार के बन्धन से मुक्त होकर परम सत्य को किस प्रकार जान सकता है।

महर्षि वैशम्पायन जनमेजय से कहते हैं कि मनुष्य को अपनी पाँचों इन्द्रियों को संयमित करके, निर्मल मन और एकाग्र चित्त से इस ज्ञान को सुनना चाहिए। ब्रह्मज्ञान केवल शब्दों को सुन लेने से प्राप्त नहीं होता; उसके लिए मन की शुद्धता, इन्द्रिय-संयम और गम्भीर चिन्तन आवश्यक हैं।

निष्कल पुरुष : व्यक्त और अव्यक्त से परे परम तत्त्व

महर्षि उस परम सत्ता को निष्कल पुरुष कहते हैं। निष्कल का अर्थ है—जो कलाओं, विभागों अथवा सीमित अंशों में विभाजित नहीं है। वह सामान्य कर्मों के द्वारा सहज रूप से प्राप्त नहीं होता, बल्कि ब्रह्मज्ञान से युक्त साधकों के अनुभव का विषय है। वह कर्मों में आसक्त नहीं है, समस्त जगत् का अव्यक्त कारण है और नित्य है। उसका वर्णन साकार तथा निराकार—दोनों प्रकार से किया गया है।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है। परम तत्त्व को केवल किसी दृश्य रूप में सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह अव्यक्त कारण भी है; फिर भी सृष्टि में उसके प्रकट रूपों का वर्णन किया जा सकता है। इस प्रकार ग्रन्थ परम सत्ता के उस स्वरूप की ओर संकेत करता है जो दृश्य जगत् से परे होते हुए भी उससे सर्वथा असम्बद्ध नहीं है।

महर्षि आगे बताते हैं कि यह पुरुष सर्वत्र व्याप्त है। उसका सिर, मुख, दृष्टि और श्रवण किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हैं। वह सबको जानने वाला, सबमें व्याप्त और समस्त दिशाओं में उपस्थित है। वह कारणों का भी कारण है तथा व्यक्त और अव्यक्त—दोनों अवस्थाओं से सम्बन्ध रखता है।

इस वर्णन में परम सत्ता की सर्वव्यापकता पर बल दिया गया है। मनुष्य अपनी इन्द्रियों से किसी वस्तु को एक निश्चित स्थान पर देखता है, लेकिन यहाँ जिस तत्त्व का वर्णन है, उसे किसी एक स्थान अथवा आकार में बाँधकर नहीं समझा जा सकता।

काल, युग और सृष्टि के साथ परम सत्ता का सम्बन्ध

अध्याय में परम पुरुष को अतीत, वर्तमान और भविष्य से सम्बद्ध बताया गया है। वह युगों का मूल है और काल के विभिन्न रूपों में उसकी व्यापकता का वर्णन मिलता है। वह स्वयं जन्म से बँधा हुआ नहीं है, फिर भी सृष्टि की उत्पत्ति और विस्तार में उसका सम्बन्ध बताया गया है।

महर्षि वैशम्पायन यह भी स्पष्ट करते हैं कि वह निराकार और चिन्तन की सामान्य सीमा से परे होने पर भी विभिन्न रूपों में प्रकट हो सकता है। जैसे लकड़ी में अग्नि अप्रकट रूप से विद्यमान रहती है और उपयुक्त परिस्थिति में प्रकट होती है, वैसे ही अव्यक्त सत्ता के व्यक्त होने की कल्पना की गई है।

यह उपमा अव्यक्त और व्यक्त के सम्बन्ध को समझने में सहायक है। अग्नि लकड़ी में सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देती, लेकिन इससे उसकी सम्भावना का निषेध नहीं होता। इसी प्रकार ग्रन्थ उस परम तत्त्व को जगत् का ऐसा आधार मानता है जो कभी अव्यक्त रहता है और कभी प्रकट रूपों में अनुभव किया जाता है।

अहंकार और सृष्टि का आरम्भ

अध्याय में अहंकार की उत्पत्ति का उल्लेख भी मिलता है। नारायण से सम्बद्ध अविद्या के कारण अहंकार का प्रादुर्भाव बताया गया है। आगे प्रकृति से अहंकार की उत्पत्ति और उसके माध्यम से जगत् के प्रकट होने का वर्णन आता है। यहाँ ब्रह्मा का नाम सृष्टि के व्यक्त रूप और उसके विस्तार के साथ जुड़ता है।

इस वर्णन को समझने के लिए अहंकार के दो अर्थों में अन्तर करना उपयोगी है। सामान्य जीवन में अहंकार का अर्थ अपने व्यक्तित्व का अभिमान हो सकता है, जबकि दार्शनिक प्रसंग में यह वह तत्त्व है जिसके माध्यम से ‘मैं’ और ‘अन्य’ का भेद अनुभव में आता है। सृष्टि-वर्णन में अहंकार को इसी व्यापक दार्शनिक अर्थ में समझना अधिक उचित है।

ग्रन्थ के अनुसार परम सत्ता स्वयं गुणों और सीमित रूपों से परे रहते हुए भी सृष्टि के व्यक्त रूपों का आधार है। ब्रह्मा के माध्यम से जगत् की रचना का वर्णन इस बात को सामने लाता है कि मूल कारण और सृष्टि के प्रत्यक्ष विस्तार को आख्यान में अलग-अलग स्तरों पर समझाया गया है।

जल, वायु और पृथ्वी की उत्पत्ति

सृष्टि के क्रम में जल की रचना का उल्लेख आता है। इसके बाद वायु की उत्पत्ति तथा जगत् के जल में निमग्न होने का वर्णन किया गया है। आगे पृथ्वी को ठोस रूप प्राप्त होने और उसके प्रकट होने की कथा आती है।

इस प्रसंग में पृथ्वी को केवल निर्जीव पदार्थ के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया। पृथ्वी को ऐसा आधार बताया गया है जो समस्त प्राणियों के निवास और जीवन के लिए स्थान प्रदान करती है। वह अपनी स्थिति और अस्तित्व की रक्षा के लिए सहायता की अपेक्षा करती है।

तब हरि वराह का रूप धारण करके महासागर में प्रवेश करते हैं और पृथ्वी को जल से ऊपर उठाते हैं। इस कार्य के बाद वे समाधि में स्थित हो जाते हैं। अध्याय में वराह-रूप में पृथ्वी को उठाने वाले हरि को दिव्य तेज और ब्रह्म के व्यापक स्वरूप से सम्बद्ध किया गया है।

यह प्रसंग हरिवंश की उस परम्परा को सामने लाता है जिसमें विष्णु अथवा हरि सृष्टि की रक्षा और व्यवस्था की पुनर्स्थापना करने वाले देवता के रूप में प्रकट होते हैं। यहाँ वराह-रूप का महत्त्व पृथ्वी को ऊपर उठाने की घटना में है—अर्थात् जीवन के आधार को पुनः व्यवस्थित करना।

आगे पृथ्वी को धारण करने वाली दिव्य शक्ति का वर्णन सर्प और कच्छप के रूपों से भी जोड़ा गया है। यह विवरण पुराण की सृष्टि-कल्पना का हिस्सा है। इसे आधुनिक भूविज्ञान का प्रत्यक्ष विवरण मानने के बजाय उस धार्मिक-दार्शनिक भाषा में समझना चाहिए, जिसके माध्यम से प्राचीन ग्रन्थ पृथ्वी की स्थिरता और संरक्षण का विचार व्यक्त करते हैं।

सूर्य, चन्द्र और प्राण का वर्णन

पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद अध्याय में सूर्य, चन्द्र और वायु के प्रकट होने का वर्णन मिलता है। सूर्य को तेज से, चन्द्र को जल-सम्बन्धी गुणों से और वायु को प्राण तथा जीवन की गति से जोड़ा गया है। वायु के प्रसंग में वेदों के ज्ञान और घटनाओं के कारणों को समझने की बात भी आती है।

इन वर्णनों में प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों को परस्पर सम्बद्ध माना गया है। प्रकाश, जल और वायु जीवन की व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। पुराण उन्हें केवल अलग-अलग प्राकृतिक तत्त्वों के रूप में नहीं देखता, बल्कि एक व्यापक सृष्टि-क्रम के हिस्से के रूप में प्रस्तुत करता है।

चन्द्र के साथ सोम और ब्रह्मविद्या से सम्बन्धित व्याख्या भी इस अध्याय में आती है। इस प्रकार प्राकृतिक जगत् का वर्णन धार्मिक और दार्शनिक अर्थों से जुड़ जाता है।

महत् तत्त्व और जीव की स्थिति

अध्याय आगे महत् तत्त्व तथा पंचमहाभूतों से सम्बन्धित वर्णन करता है। महत् तत्त्व को ब्रह्म से उत्पन्न होने वाला और सृष्टि के विकास में भूमिका निभाने वाला तत्त्व बताया गया है। शरीर, वायु और पाँच महाभूतों के सम्बन्ध का उल्लेख करते हुए ग्रन्थ स्थूल जगत् और उसके भीतर सक्रिय जीवन-तत्त्वों के बीच सम्बन्ध स्थापित करता है।

जीव के विषय में कहा गया है कि वह बुद्धि में ज्ञान के रूप में स्थित रहता है और उसके वास्तविक स्वरूप को परमेश्वर ही पूर्णतः जानता है। शरीर में विद्यमान आत्मतत्त्व को सूर्य तथा परमात्मा से सम्बद्ध करके भी समझाया गया है।

इन कथनों में शरीर और आत्मा को एक ही स्तर पर नहीं रखा गया है। शरीर पंचमहाभूतों से सम्बद्ध है, जबकि जीव के वास्तविक स्वरूप का सम्बन्ध ज्ञान और आत्मतत्त्व से है। इस भेद के कारण मनुष्य को अपने अस्तित्व को केवल शरीर तक सीमित मानने के बजाय उसके भीतर विद्यमान चेतना पर भी विचार करने की प्रेरणा मिलती है।

कर्म, जन्म-मरण और संसार का बन्धन

महर्षि वैशम्पायन जीव के कर्मों के परिणाम का वर्णन करते हैं। पूर्वकर्मों के कारण मनुष्य को सुख अथवा दुःख का अनुभव होता है और उसके जीवन की दिशा प्रभावित होती है। इन्द्रियों में आसक्त तथा ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप से अनभिज्ञ व्यक्ति कर्मों के कारण जन्म-मरण के चक्र में पड़ता है।

ग्रन्थ के अनुसार जब तक मनुष्य परम ब्रह्म के साथ अपने सम्बन्ध का यथार्थ ज्ञान प्राप्त नहीं करता, तब तक वह संसार में बार-बार जन्म लेता है। यहाँ अज्ञान और आसक्ति को बन्धन के महत्त्वपूर्ण कारणों के रूप में सामने रखा गया है।

इसका आशय यह नहीं कि संसार के प्रत्येक सुख-दुःख को देखकर किसी व्यक्ति के पूर्वकर्मों का निश्चित निर्णय कर लिया जाए। इस अध्याय का विषय कर्म और पुनर्जन्म का धार्मिक-दार्शनिक सिद्धान्त है। उसका उद्देश्य मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सावधान करना और ज्ञान की आवश्यकता समझाना है।

कर्म का फल केवल तत्काल दिखाई देने वाली घटना तक सीमित नहीं माना गया। ग्रन्थ जीवन को एक विस्तृत नैतिक और आध्यात्मिक क्रम में रखता है, जिसमें कर्म, अज्ञान, जन्म-मरण और मुक्ति एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं।

योग, इन्द्रिय-संयम और ब्रह्म की प्राप्ति

अध्याय में मुक्ति के लिए योग का विशेष महत्त्व बताया गया है। जो साधक योग के द्वारा अपनी इन्द्रियों पर अधिकार प्राप्त कर लेता है, वह ब्रह्म के साथ एकत्व का अनुभव करता है और वास्तविक सुख को प्राप्त होता है।

यहाँ योग का आशय केवल किसी शारीरिक अभ्यास से नहीं है। इसका सम्बन्ध चित्त के अनुशासन, इन्द्रिय-संयम और परम तत्त्व पर केन्द्रित साधना से है। जब मनुष्य की चेतना निरन्तर विषयों की ओर भागती रहती है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप को समझने में कठिनाई अनुभव करता है। योग उस चंचलता को संयमित करने का मार्ग प्रस्तुत करता है।

ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने वाला साधक क्रोध और अन्य विकारों के अधीन नहीं रहता तथा इन्द्रिय-विषयों के प्रति उसकी आसक्ति कम होती जाती है। वह संसार की परिवर्तनशीलता को समझते हुए अपने अस्तित्व के गहरे आधार की खोज करता है।

ग्रन्थ के अनुसार ऐसा साधक तत्त्वों के उदय और विनाश को समझने की क्षमता प्राप्त करता है। वह मुक्ति के साधनों तथा कर्मों के व्यापक परिणामों के विषय में ज्ञान प्राप्त करता है। यहाँ ज्ञान का फल केवल जानकारी का विस्तार नहीं, बल्कि जीवन के प्रति दृष्टि में परिवर्तन है।

मन पर विजय और ज्ञान की दृष्टि

अध्याय में मन को वश में करने का विशेष उल्लेख है। मनुष्य की अनेक इच्छाएँ और मानसिक प्रवृत्तियाँ उसे विचलित करती हैं। जिस प्रकार वायु समुद्र में तरंगें उत्पन्न करती है, उसी प्रकार इच्छाएँ मन को अस्थिर करती हैं।

ज्ञान के माध्यम से उन इच्छाओं पर विजय प्राप्त करने वाला साधक शरीर और संसार के बन्धनों से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ता है। यहाँ ज्ञान का अर्थ केवल शास्त्रों का पाठ नहीं है; यह उस समझ से जुड़ा है जो मनुष्य को अपनी आसक्तियों, प्रवृत्तियों और वास्तविक स्वरूप का बोध कराती है।

अध्याय में योगी की असाधारण शक्तियों का भी वर्णन आता है। सूक्ष्म शरीर और आध्यात्मिक विज्ञान के माध्यम से लोकों की रचना अथवा विनाश जैसी क्षमताओं का उल्लेख पुराण की योग-परम्परा के अनुरूप है। इन कथनों को साधारण अनुभव की सीमा से परे प्रस्तुत किया गया है। इसलिए इन्हें अध्याय के आध्यात्मिक आख्यान के रूप में समझना चाहिए, न कि बिना परीक्षण के आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य के रूप में।

यह भी कहा गया है कि परमात्मा में मन को स्थिर करने वाला साधक अपने पूर्वकर्मों के कारण निम्न अवस्था में जन्म लेने वालों के उद्धार में समर्थ हो सकता है। इस कथन में आध्यात्मिक सिद्धि का सम्बन्ध केवल निजी उपलब्धि से नहीं, बल्कि दूसरों के कल्याण से भी जोड़ा गया है।

कर्म और मुक्ति का सम्बन्ध

अध्याय के अन्तिम विचारों में कर्म और मुक्ति के सम्बन्ध को स्पष्ट किया गया है। कर्म मनुष्य को भोग की ओर भी ले जा सकता है और मुक्ति के मार्ग में सहायक भी हो सकता है। किन्तु जो साधक ब्रह्म में स्थिर हो जाता है, उसके लिए सांसारिक भोग की आकांक्षा से प्रेरित कर्म का प्रभाव समाप्त होने लगता है।

यहाँ कर्म का महत्त्व उसके उद्देश्य और साधक की आन्तरिक स्थिति से जुड़ा हुआ है। केवल बाहरी क्रिया से मुक्ति सुनिश्चित नहीं होती। जब कर्म आसक्ति, अहंकार और भोग की इच्छा से संचालित होता है, तब वह संसार के बन्धन को बनाए रख सकता है। इसके विपरीत, विवेक, संयम और आत्मज्ञान से युक्त साधना मनुष्य को उस बन्धन से ऊपर उठने की दिशा देती है।

इस प्रकार ग्रन्थ कर्म का निषेध करने के बजाय उसके आध्यात्मिक परिणाम पर विचार करता है। अन्ततः लक्ष्य उस स्थिति को प्राप्त करना है जहाँ मनुष्य अपने अस्तित्व को केवल क्षणभंगुर भोगों और बदलती परिस्थितियों से परिभाषित न करे, बल्कि परम सत्य के ज्ञान में स्थिर हो।

प्रसंग का निष्कर्ष

जनमेजय की जिज्ञासा के उत्तर में महर्षि वैशम्पायन का यह विवेचन सृष्टि और मुक्ति को एक ही आध्यात्मिक दृष्टि के दो पक्षों के रूप में प्रस्तुत करता है। निष्कल पुरुष जगत् का अव्यक्त आधार है; अहंकार और प्रकृति के माध्यम से सृष्टि का विस्तार होता है; जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र और वायु जगत् की व्यवस्था में प्रकट होते हैं; जीव कर्मों के कारण जन्म-मरण का अनुभव करता है; और योग तथा ब्रह्मज्ञान उसे मुक्ति की दिशा प्रदान करते हैं।

इस अध्याय का मुख्य सन्देश यह है कि संसार की उत्पत्ति का ज्ञान तभी पूर्ण अर्थ प्राप्त करता है, जब मनुष्य अपने स्वयं के अस्तित्व, कर्म और मुक्ति के प्रश्न पर भी विचार करे। सृष्टि का वर्णन बाहरी जगत् को समझने का मार्ग है, जबकि ब्रह्मज्ञान उस व्यापक तत्त्व की खोज है जिसके साथ जीव का सम्बन्ध बताया गया है।

इस प्रकार भाग ५६ जनमेजय की ब्रह्मज्ञान-विषयक जिज्ञासा के उत्तर में परम पुरुष, सृष्टि, जीव, कर्म और मोक्ष का विवेचन प्रस्तुत करता है। इसके बाद भविष्यपर्व का अगला अध्याय नदियों की उत्पत्ति का वर्णन करता है, जो सृष्टि-विस्तार की एक अलग कड़ी है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

सृष्टि-क्रम को क्रमबद्ध करके लिखिएदोहराए गए दार्शनिक विवेचन घटाइए

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