हरिवंशपुराण — भाग ३९- वरुण की दिव्य गौएँ

 हरिवंशपुराण — भाग ३९- वरुण की दिव्य गौएँ : संघर्ष का समाधान और द्वारका की ओर प्रस्थान

वरुण का निवेदन और युद्ध की समाप्ति

वरुण ने स्पष्ट किया कि दिव्य गौएँ बाणासुर से सम्बन्धित थीं और उनके संरक्षण का दायित्व उनके पास था। श्रीकृष्ण के साथ संघर्ष के बीच वरुण ने अपने वचन और दायित्व का स्मरण कराया। अन्ततः संवाद के बाद युद्ध समाप्त हुआ और श्रीकृष्ण ने वरुण के प्रति सम्मान प्रकट किया।

इस प्रसंग में गौओं की प्राप्ति से अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या किसी मूल्यवान वस्तु को पाने की इच्छा किसी दूसरे के अधिकार और पूर्व-निर्धारित दायित्व से ऊपर हो सकती है। आख्यान इसका आधुनिक कानूनी उत्तर नहीं देता, लेकिन वरुण के निवेदन के माध्यम से इच्छा, अधिकार और मर्यादा के बीच तनाव अवश्य सामने रखता है।

द्वारका की ओर वापसी

वरुण-प्रसंग समाप्त होने के बाद श्रीकृष्ण अपने साथियों सहित द्वारका लौटने की ओर बढ़ते हैं। अनिरुद्ध और उषा का मिलन, बाणासुर के साथ संघर्ष और विवाह के बाद यह यात्रा कथा को फिर यादवों के पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन की ओर ले जाती है।

कथानक की दृष्टि से यह संकट के बाद व्यवस्था की ओर वापसी है। अनिरुद्ध मुक्त हो चुके हैं, उषा को अपने प्रिय के साथ जीवन का अवसर मिला है और बाणासुर के साथ संघर्ष का समाधान हो चुका है। वरुण का प्रसंग इस कथा-क्रम में एक नया प्रश्न जोड़ता है—सामर्थ्य होने पर भी क्या मनुष्य या देवता को अपनी इच्छा की सीमा पहचाननी चाहिए?

प्रसंग की समीक्षा

इस प्रसंग में तीन विचार सामने आते हैं—सम्पदा के साथ अधिकार का प्रश्न, वचन निभाने का दायित्व और इच्छा पर मर्यादा का नियन्त्रण। वरुण अपने संरक्षण-दायित्व का पक्ष रखते हैं; श्रीकृष्ण के साथ उनका संवाद युद्ध को समाप्त करने की दिशा बनता है।

इसे केवल विजय-गाथा मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी ध्यान देना चाहिए कि गौओं को प्राप्त करने के प्रयास में संघर्ष क्यों उत्पन्न हुआ और क्या उस संघर्ष से बचा जा सकता था। मूल आख्यान इस प्रश्न का विस्तृत आधुनिक विवेचन नहीं करता; यह हमारी आलोचनात्मक समीक्षा का विषय है।

भाग ३९ का सार

वरुण की दिव्य गौओं को लेकर उत्पन्न संघर्ष संवाद के बाद समाप्त होता है और श्रीकृष्ण द्वारका की ओर लौटते हैं। कथा में शक्ति, अधिकार, वचन और मर्यादा के प्रश्न उभरते हैं। अगले भाग में विष्णुपर्व के शेष कथा-क्रम और उसके समापन की स्थिति को मूल पाठ-परम्पराओं के सन्दर्भ में स्पष्ट किया जाएगा।


मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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