हरिवंशपुराण — भाग ४८ योग, काल और युगचक्र
हरिवंशपुराण — भाग ४८ योग, काल और युगचक्र : परिवर्तनशील जगत् के पीछे व्यवस्था की खोज
नारायण के स्वरूप पर विचार के बाद भविष्यपर्व अब योग, काल और युगों की प्रकृति की ओर बढ़ता है। इस प्रसंग में समय केवल घटनाओं को गिनने का साधन नहीं, बल्कि सृष्टि के प्राकट्य, उसके विकास और उसके लय को समझने का आधार बनता है।
योग और काल का संबंध
पिछले प्रसंग में नारायण को समस्त जगत् के मूल के रूप में प्रस्तुत किया गया था। अब प्रश्न यह उठता है कि उस व्यापक सत्ता के संदर्भ में जगत् की विभिन्न अवस्थाएँ किस प्रकार प्रकट होती हैं और उनका क्रम कैसे समझा जाए।
पुराण की विश्वदृष्टि में सृष्टि स्थिर और अपरिवर्तनीय व्यवस्था नहीं है। उसमें उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के चरण आते हैं। प्राणी जन्म लेते हैं, जीवन व्यतीत करते हैं और अंततः शरीर का त्याग करते हैं। इसी प्रकार व्यापक ब्रह्मांडीय स्तर पर भी सृष्टि के प्रकट होने और पुनः अव्यक्त अवस्था में लीन होने की कल्पना की गई है।
योग का उल्लेख इस संदर्भ में केवल शारीरिक अभ्यास या आसन तक सीमित नहीं है। भारतीय धार्मिक और दार्शनिक साहित्य में योग का अर्थ साधना, चित्त के संयमन, ध्यान और उच्चतर तत्त्व के साथ संबंध स्थापित करने की प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए इस प्रसंग को समझते समय योग के व्यापक पारंपरिक अर्थ पर ध्यान देना आवश्यक है।
चार युगों का स्वरूप
वैशम्पायन जनमेजय को बताते हैं कि धर्म की स्थिति के आधार पर चार युगों की प्रकृति अलग-अलग होती है। सत्ययुग में धर्म पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित रहता है; त्रेतायुग में उसमें कमी आती है; द्वापर में यह क्षय और स्पष्ट होता है; और कलियुग में अधर्म का प्रभाव सबसे अधिक बताया गया है।
धर्म को चार पैरों पर खड़े बैल के रूप में समझने की परंपरा इसी विचार को प्रतीकात्मक रूप देती है। सत्ययुग में धर्म के चारों पैर सुरक्षित हैं। त्रेता में एक पैर कम हो जाता है, द्वापर में दो शेष रहते हैं और कलियुग में धर्म केवल एक पैर पर खड़ा दिखाई देता है।
यह प्रतीक किसी वास्तविक पशु का वर्णन नहीं, बल्कि नैतिक व्यवस्था की स्थिरता और दुर्बलता को समझाने का माध्यम है। धर्म के पैर घटने का अर्थ है—सत्य, कर्तव्य, संयम और सदाचार जैसी प्रवृत्तियों का सामाजिक जीवन में कमजोर होना।
इस वर्णन में युगों का अंतर केवल समय की लंबाई से निर्धारित नहीं होता। प्रत्येक युग में मनुष्य के आचरण, धार्मिक प्रवृत्ति और सामाजिक व्यवस्था की स्थिति भी बदलती है।
सत्ययुग को कृतयुग भी कहा जाता है। वैशम्पायन के वर्णन में यह वह काल है जब धर्म के चारों पैर सुरक्षित रहते हैं और सत्य तथा सात्त्विक प्रवृत्ति का प्रभाव व्यापक होता है।
मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। धार्मिक अनुष्ठान और यज्ञ जीवन की व्यवस्था से जुड़े रहते हैं। लोग सदाचारी व्यक्तियों से शिक्षा ग्रहण करते हैं और उनके आचरण का अनुसरण करने का प्रयास करते हैं।
यहाँ सत्ययुग की श्रेष्ठता का आधार केवल बाहरी समृद्धि नहीं है। उसका प्रमुख लक्षण यह है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन कराने के लिए निरंतर भय या दंड की आवश्यकता नहीं पड़ती। धर्म जीवन की सहज प्रवृत्ति के रूप में प्रतिष्ठित रहता है।
इसे एक आदर्श सामाजिक कल्पना के रूप में भी पढ़ा जा सकता है—ऐसा समाज जहाँ सत्य बोलना अपवाद नहीं, सामान्य व्यवहार हो; जहाँ कर्तव्य का पालन बाहरी दबाव से नहीं, आंतरिक निष्ठा से हो।
त्रेतायुग : कर्मफल की इच्छा और धर्म में कमी
त्रेतायुग में धर्म का एक पैर कम हो जाता है। सत्य और सात्त्विकता का प्रभाव बना रहता है, किंतु धार्मिक कर्मों के प्रति मनुष्य की दृष्टि में परिवर्तन आने लगता है।
व्यास-परंपरा के इस वर्णन में लोग धार्मिक कर्मों के फल की इच्छा करने लगते हैं। अर्थात् कर्म का मूल्य केवल कर्तव्य पालन में नहीं, उससे मिलने वाले लाभ में भी देखा जाने लगता है।
यह परिवर्तन विचारणीय है। जब कोई व्यक्ति केवल इसलिए अच्छा कर्म करता है कि उससे उसे कोई लाभ मिलेगा, तब उसके कर्म में स्वार्थ का अंश प्रवेश कर सकता है। कर्म बाहरी रूप से धार्मिक दिखाई दे सकता है, लेकिन उसके पीछे की भावना बदल जाती है।
फिर भी फल की इच्छा और धर्म का पूर्ण अभाव एक ही बात नहीं हैं। ग्रंथ का संकेत क्रमिक परिवर्तन की ओर है—धर्म बना रहता है, पर उसकी सहजता और व्यापकता कम होने लगती है।
द्वापरयुग : धर्म और अधर्म का संघर्ष
द्वापरयुग में धर्म के दो पैर शेष बताए गए हैं। इस युग में रजोगुण, स्वार्थ, छल और अहंकार जैसी प्रवृत्तियों का प्रभाव बढ़ने लगता है।
यहाँ कथा धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व की भी आलोचना करती है। जिन लोगों से ज्ञान, सत्य और सदाचार की अपेक्षा की जाती है, वे भी निजी स्वार्थ में उलझ सकते हैं। इससे धर्म की संस्थाएँ और परंपराएँ कमजोर होती हैं।
इस वर्णन का व्यापक अर्थ यह है कि किसी व्यवस्था का संकट तब अधिक गंभीर हो जाता है जब उसके संरक्षक ही उसके मूल उद्देश्यों से दूर होने लगें। ज्ञान का पद अपने-आप ज्ञान की गारंटी नहीं है और धार्मिक प्रतिष्ठा अपने-आप नैतिक आचरण का प्रमाण नहीं बनती।
द्वापर का यह चित्र धर्म और अधर्म के संघर्ष को सामने रखता है। धर्म पूरी तरह समाप्त नहीं होता, लेकिन उसे बनाए रखने के लिए अधिक विवेक और प्रयत्न की आवश्यकता पड़ती है।
कलियुग : अधर्म का विस्तार
कलियुग में धर्म का केवल एक पैर शेष रहने का वर्णन मिलता है। कामना, तमोगुण, अहंकार और असत्य का प्रभाव बढ़ता है। व्रत, धार्मिक अनुशासन और सत्याचरण का क्षय बताया गया है।
यहाँ एक आवश्यक सावधानी है। ग्रंथ में वर्णित कुछ सामाजिक धारणाएँ प्राचीन वर्णाश्रम व्यवस्था से जुड़ी हुई हैं। उन्हें आधुनिक समाज पर बिना आलोचनात्मक परीक्षण के लागू नहीं करना चाहिए। इस प्रसंग का व्यापक नैतिक पक्ष यह है कि जब व्यक्ति अपने कर्तव्य और संयम से विमुख होता है, तब सामाजिक विश्वास और व्यवस्था कमजोर पड़ते हैं।
कलियुग का वर्णन केवल दूसरों की आलोचना करने के लिए उपयोगी नहीं होना चाहिए। यदि प्रत्येक व्यक्ति यह मान ले कि दोष केवल उसके समय और समाज में है, तो वह अपने आचरण की समीक्षा से बच सकता है।
इसलिए युग-वर्णन का एक उपयोगी पाठ आत्मपरीक्षण भी है—क्या हमारे व्यवहार में सत्य, संयम और उत्तरदायित्व की जगह स्वार्थ तथा अहंकार बढ़ रहे हैं?
युगों की कालगणना
युगों के नैतिक स्वरूप के बाद वैशम्पायन उनकी अवधि बताते हैं। मन्मथनाथ दत्त के अनुवाद में सत्ययुग की मूल अवधि चार हजार वर्ष, त्रेतायुग की तीन हजार, द्वापर की दो हजार और कलियुग की एक हजार वर्ष बताई गई है। प्रत्येक युग के आरंभ और अंत में संधिकाल भी जोड़ा गया है।
इस गणना में संधिकाल सहित चारों युगों का कुल योग बारह हजार दिव्य वर्ष बताया गया है। आगे कहा गया है कि ऐसे इकहत्तर युगों से एक मन्वंतर बनता है और ब्रह्मा का एक दिन एक हजार युगों के बराबर माना गया है।
इस कालगणना का उद्देश्य केवल वर्षों की संख्या बताना नहीं है। यह मानव जीवन की सीमित अवधि को एक विशाल ब्रह्मांडीय समय-चक्र के भीतर रखती है। मनुष्य के लिए जो परिवर्तन असाधारण और अंतिम प्रतीत होता है, वह पुराण की दृष्टि में सृष्टि के बड़े चक्र का एक चरण है।
मन्वंतर और ब्रह्मा का दिन
मन्वंतर की अवधारणा युगों की गणना को और व्यापक बनाती है। एक मन्वंतर में अनेक युगचक्रों का समावेश होता है और उसके साथ मनु के शासन तथा सृष्टि की व्यवस्था का संबंध बताया जाता है।
इसके आगे ब्रह्मा के दिन की कल्पना आती है। ब्रह्मा का दिन सामान्य मानवीय दिन की तरह नहीं है। यह एक विशाल सृष्टि-काल का प्रतीक है, जिसके भीतर अनेक युगचक्र पूरे होते हैं।
दिन के समाप्त होने पर सृष्टि के क्षय और प्रलय का प्रसंग आरंभ होता है। इस प्रकार कालगणना कथा को अगले दार्शनिक चरण तक ले जाती है—यदि सृष्टि का एक दिन समाप्त होता है, तो उस समय जगत् की विविध सत्ताओं का क्या होता है?
प्रलय की ओर : सृष्टि का अंत या एक अवस्था का परिवर्तन?
अध्याय के अंतिम हिस्से में नारायण के प्रलयकारी स्वरूप का वर्णन आरंभ होता है। ब्रह्मा के दिन के समाप्त होने पर चर और अचर जगत् के क्षय की कल्पना की गई है। देवता, दैत्य, दानव, यक्ष, राक्षस, गंधर्व, किन्नर, अप्सराएँ, ऋषि, नाग, पर्वत, नदियाँ, पशु और पक्षी—सृष्टि के विविध रूप इस परिवर्तन के अंतर्गत आते हैं।
नारायण सूर्य, वायु, अग्नि और मेघ जैसे रूपों के माध्यम से जगत् के लय से जुड़े दिखाई देते हैं। सूर्य की उष्णता, वायु का प्रभाव, अग्नि का दाह और मेघों की विपरीत वर्षा—इन सबके माध्यम से विनाश का व्यापक चित्र रचा गया है।
इस विचार का दार्शनिक पक्ष यह है कि सृष्टि को पूर्णतः स्थिर और अपरिवर्तनीय नहीं माना गया। उसका प्राकट्य है, उसका विस्तार है और उसका लय भी है। जो रूप आज दिखाई देता है, वह सदा उसी रूप में बना रहे—ऐसा आवश्यक नहीं।
शोधपरक समीक्षा
इस अध्याय में युगों की कालगणना और धर्म के क्रमिक क्षय को एक ही ढाँचे में रखा गया है। सत्ययुग से कलियुग तक का परिवर्तन केवल समय के बीतने का संकेत नहीं, बल्कि मनुष्य के आचरण और सामाजिक व्यवस्था के परिवर्तन का भी प्रतीक है।
इसके बाद मन्वंतर और ब्रह्मा के दिन की गणना आती है, जो मानवीय समय को विशाल ब्रह्मांडीय काल के भीतर रखती है। अंततः प्रलय का वर्णन इस चक्र को पूर्ण करता है।
इस प्रसंग को पढ़ते समय तीन भेद बनाए रखना उपयोगी है—पुराण की पारंपरिक कालगणना, युगों से जुड़ी नैतिक कल्पना और आधुनिक विज्ञान की समय-संबंधी अवधारणाएँ। इनका आपसी संवाद संभव है, लेकिन इन्हें एक ही प्रकार का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।
इस भाग का सार
भविष्यपर्व में सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग की अवधि तथा उनके नैतिक लक्षण बताए गए हैं। धर्म की स्थिरता से लेकर उसके क्षय तक का क्रम प्रस्तुत किया गया है। युगों की गणना आगे मन्वंतर और ब्रह्मा के दिन तक पहुँचती है, जिसके समाप्त होने पर सृष्टि के प्रलय का वर्णन आरंभ होता है।
अगले भाग में
आगे का प्रसंग प्रलय की प्रक्रिया और नारायण की अवस्था पर केंद्रित होगा। वहाँ प्रश्न यह होगा कि जब सृष्टि के विविध रूप लीन होने लगते हैं, तब परम पुरुष किस अवस्था में स्थित रहते हैं और पुनः सृष्टि के प्राकट्य की संभावना कैसे व्यक्त की जाती है।
मुकेश श्रीवास्तव आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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