हरिवंशपुराण — भाग ७१ - भविष्यपर्व — पर्वतों और नदियों की उत्पत्ति

 हरिवंशपुराण — भाग ७१ - भविष्यपर्व — पर्वतों और नदियों की उत्पत्ति : पृथ्वी पर जीवन का विस्तार

पृथ्वी के उद्धार के बाद सृष्टि की व्यवस्था का अगला पक्ष सामने आता है—उस भूमि का स्वरूप, जिस पर जीवों का जीवन विकसित होता है। पर्वत, नदियाँ, वन और जलस्रोत पृथ्वी को केवल भौगोलिक संरचना नहीं देते, बल्कि जीवन के विस्तार के आधार भी बनते हैं। भारतीय पुराण-परंपरा में इन प्राकृतिक तत्त्वों की उत्पत्ति को प्रायः देवशक्तियों, ऋषियों और सृष्टि-नियामक तत्त्वों से जोड़कर समझाया गया है।

भविष्यपर्व के पिछले प्रसंग में विष्णु के वराह-रूप द्वारा पृथ्वी को जल से ऊपर उठाने और उसे स्थिर करने का वर्णन आया। इस कथा का स्वाभाविक विस्तार पृथ्वी पर स्थित विभिन्न तत्त्वों और लोक-व्यवस्था की चर्चा में दिखाई देता है। पर्वतों और नदियों के आख्यान इसी व्यापक सृष्टि-वर्णन का हिस्सा हैं।

पर्वतों का महत्त्व

भारतीय धार्मिक साहित्य में पर्वत केवल ऊँची भूमि नहीं हैं। वे तपस्या, ज्ञान, देवताओं के निवास और प्राकृतिक शक्ति के प्रतीक भी हैं। हिमालय को देवात्मा पर्वत कहा गया है। मेरु को ब्रह्माण्ड की धुरी के रूप में कल्पित किया गया है, जिसके आसपास विभिन्न लोकों और दिशाओं की व्यवस्था का वर्णन मिलता है।

पुराणों में पर्वतों के नाम, उनकी उत्पत्ति और उनके स्थान के सम्बन्ध में अनेक विवरण मिलते हैं। कुछ पर्वत भौगोलिक स्थलों से जुड़े हैं, जबकि कुछ ब्रह्माण्डीय कल्पना का हिस्सा हैं। इसलिए सभी पर्वत-वर्णनों को आधुनिक मानचित्र पर स्थित भौतिक पर्वतों की सूची मानना उचित नहीं होगा। इन आख्यानों में भौगोलिक स्मृति, धार्मिक कल्पना और प्रतीकात्मक अर्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

पर्वतों का एक प्रमुख कार्य जल के स्रोतों और नदियों के उद्गम से सम्बन्धित है। पर्वतीय क्षेत्रों से निकलने वाली नदियाँ मैदानों को सींचती हैं और मानव सभ्यताओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पुराण इस जीवनदायी सम्बन्ध को धार्मिक भाषा में व्यक्त करते हैं।

नदियों की पवित्रता और जीवनदायिनी भूमिका

भारतीय परंपरा में नदियों को मातृस्वरूप माना गया है। गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा और गोदावरी जैसी नदियाँ धार्मिक आख्यानों, तीर्थ-परंपराओं और जनजीवन में विशेष स्थान रखती हैं। इनके जल को केवल उपयोगी प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि पवित्रता और जीवन के प्रतीक के रूप में भी देखा गया है।

नदियों की उत्पत्ति के विषय में पुराणों में विभिन्न आख्यान हैं। गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण, भागीरथ की तपस्या और शिव द्वारा गंगा को अपनी जटाओं में धारण करना इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। इस कथा में एक ओर जल की विराट शक्ति है, तो दूसरी ओर उस शक्ति को नियंत्रित करके पृथ्वी के लिए उपयोगी बनाने का विचार भी है।

यहाँ ध्यान देना चाहिए कि नदियों से संबंधित सभी प्रसिद्ध कथाएँ हरिवंशपुराण के इसी अध्याय में हों, यह आवश्यक नहीं है। अलग-अलग पुराणों और महाकाव्यों में इनके स्वतंत्र प्रसंग हैं। अतः किसी विशिष्ट नदी की उत्पत्ति को इस भाग में मूल भविष्यपर्व का कथन तभी माना जाना चाहिए, जब उसका प्रमाण संबंधित संस्कृत पाठ में उपलब्ध हो।

पर्वत, नदी और मनुष्य का सम्बन्ध

पर्वतों और नदियों को साथ रखकर देखने पर प्रकृति की परस्पर निर्भरता का विचार उभरता है। पर्वतीय क्षेत्र जल को संचित करने और नदियों के प्रवाह को जन्म देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नदियाँ उस जल को दूर-दूर तक पहुँचाकर कृषि, पेयजल और अन्य जीवनोपयोगी गतिविधियों का आधार बनती हैं।

पुराण इस सम्बन्ध को आधुनिक जलविज्ञान की भाषा में नहीं समझाते, लेकिन उनके प्राकृतिक आख्यानों में जल और भूमि के महत्त्व की गहरी अनुभूति मिलती है। पर्वतों को देवताओं का निवास और नदियों को देवियों का रूप देने से प्रकृति के प्रति श्रद्धा और उत्तरदायित्व की भावना उत्पन्न होती है।

हालाँकि केवल पवित्र मान लेना किसी नदी या पर्वत की रक्षा की गारंटी नहीं है। आधुनिक समय में प्रदूषण, अनियंत्रित निर्माण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से इनका अस्तित्व प्रभावित होता है। इसलिए पुराणों से प्रेरित प्रकृति-सम्मान को व्यावहारिक संरक्षण से जोड़ना आवश्यक है।

शोधपरक निष्कर्ष

पर्वतों और नदियों के आख्यान भारतीय सृष्टि-चिन्तन में प्रकृति को जीवन की सक्रिय आधार-व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करते हैं। पर्वत स्थिरता और ऊर्ध्वता के प्रतीक हैं, जबकि नदियाँ प्रवाह, पोषण और निरंतरता का बोध कराती हैं।

पाठ-संबंधी सावधानी: इस भाग में पर्वतों और नदियों के विषय का सामान्य पौराणिक एवं दार्शनिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इसे भविष्यपर्व के किसी विशिष्ट अध्याय का शब्दशः सार तभी माना जाना चाहिए, जब मूल संस्कृत पाठ से उसके प्रसंगों और क्रम का मिलान कर लिया जाए।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

हरिवंश पुराण - तृतीय खंड — भाग 26 - द्वारका का विस्तार

हरिवंश पुराण - भाग ३० — बाणासुर :